Babita Pandey पहाड़ों में गहराता रहस्य!| Uttarkashi | Dayara Bugyal | Missingcase | Uttarakhand News

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उत्तराखंड के पहाड़ों से एक ऐसी रहस्यमयी कहानी सामने आ रही है, जिसने हर किसी को चौंका दिया है और सवालों में उलझा दिया है। बबीता पांडे, जो पिछले 38 दिनों से लापता हैं, लेकिन आज तक उनका कोई सुराग नहीं मिल पाया है। दोस्तो पुलिस या जांच ऐजेंसिया एसी कौन सी जांच और पड़ताल कर रही है कि हाथ खाली हैं। दोस्तो अब सवाल बबीता पांडे की गुमशुदगी से ज्यादा ये बड़ा हो चला है कि हमारी जांच टीमों, रेस्क्यू का सामर्थ कठघरे में है। दोस्तो अब सीधे कहूं तो बबीता पांडे को खोजनिकालने की बात हमारे पुलिस और सिस्टम के बस से बाहर की बात हो चुकी है। क्यों कोई सुराग नहीं खोज पा रही एजेंसियां और दोस्तो दूसरी तरफ कहा जा रहा है कि यह मामला सिर्फ एक गुमशुदगी नहीं, बल्कि “परियों के देश” से जुड़ी उस रहस्यमयी कहानी की ओर भी इशारा करता है, जिसने इस पूरे घटनाक्रम को और भी रहस्यमय बना दिया है।सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर इतने लंबे सर्च ऑपरेशन के बाद भी बबीता पांडे कहां हैं? क्या यह सिर्फ एक गुमशुदगी का मामला है या फिर पहाड़ों में कोई ऐसी परछाई छिपी है, जो अब तक सामने नहीं आ पाई। दोस्तो, 24 वर्षीय नैनीताल की एमबीए छात्रा बबीता पांडे 29मई को उत्तराखंड के प्रसिद्ध हिल स्टेशन दयारा बुग्याल में आखिरी बार देखी गई थी, उसके बाद से उनका कोई सुराग नहीं मिल पाया है।

दोस्तो दयारा बुग्याल उत्तरकाशी जनपद में पड़ता है। बबीता पांडे दो पुरुष साथियों के साथ दयारा बुग्याल में ट्रेकिंग के लिए गई थी और पहाड़ियों में रहस्यमयी तरीके से गुम हो गईं। बबीता पांडे की खोज के लिए सरकार ने पुलिस, एसडीआरएफ, डॉग स्क्वायड और आर्मी तक लगा दी। ड्रोन कैमरों से लेकर हेलीकॉप्टर से सर्च ऑपरेशन चलाया, लेकिन बबीता छोड़िए, 39-40 दिनों से उनसे जुड़ा कोई सुराग तक हाथ नहीं लगा है। लापता बबीता पांडे को लेकर सोशल मीडिया पर तमाम तरह की अफवाहें चल रही हैं। इसमें प्रमुख रूप से ‘परियों के देश’ वाले खैट पर्वत से जुड़ी कहानी काफी वायरल है। बबीता पांडे को लेकर अफवाह है कि उन्हें परियां कथित तौर पर अपने साथ ले गईं। स्थानीय भाषा में परियों को वन देवी या आंछरी कहा जाता है। लोगों में आज भी ऐसी मान्यताएं हैं कि चैत्र के महीने (मार्च और अप्रैल के बीच) में आंछरी बुग्याल या घने जंगलों में दिखाई देती हैं। रुद्रप्रयाग, चमोली और टिहरी जिलों के कई गांवों में आज भी लोग आंछरियों को शांत रखने के लिए चैत्र माह में उनकी पूजा करते हैं, ताकि गांवों में किसी के साथ कोई अनहोनी न हो। इनमें कितनी सच्चाई है? इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ये कहानियां सिर्फ मुंह-जुबानी चलती आई हैं। इन्हें किसी ने कभी प्रत्यक्ष रूप से देखा नहीं। परियों के देश वाली कहानी का बबीता पांडे से क्या कनेक्शन है? दोस्तो खैट पर्वत को स्थानीय लोग ‘परियों का देश’ कहते हैं। यहां बोर्ड पर भी यह अंकित है।

स्थानीय लोगों में मान्यता है कि रात के वक्त खैट पर्वत में चमकदार रोशनी दिखाई देती है और अगर कोई अकेला जंगल में चला जाए तो परियां उसे वश में कर लेती हैं और कथित तौर पर गायब कर देती हैं। हालांकि दोस्तो खैट पर्वत चौन्दाणा गांव से 5 किलोमीटर दूर है और टिहरी गढ़वाल में आता है। खैट पर्वत से उत्तरकाशी की दूरी 100 किलोमीटर से ज्यादा है। उत्तरकाशी अलग जिला है और वो अलग जिले मे आता है, जहां दयारा बुग्याल से बबीता पांडे रहस्यमयी तरीके से लापता हुई। दोस्तो बबीता के केस को थोड़ा पीछे जाकर समझे तो बबीता पांडे अपने दो साथियों उधमसिंह नगर जिले के हरमनपाल सिंह और उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर निवासी हरमनप्रीत सिंह के साथ उत्तरकाशी गई थी। जहां हर्षिल, गंगोत्री और आसपास के पर्यटन स्थल घूमने के बाद 28 मई को वे रैथल गांव में रूके। सीसीटीवी कैमरों में बबीता को इन दोनों मित्रों के साथ आखिरी बार रैथल गांव में देखा गया।

यहां दोस्तो आपको ये बता दूं कि बबीता पांडे अपने दो साथियों उधमसिंह नगर जिले के हरमनपाल सिंह और उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर निवासी हरमनप्रीत सिंह के साथ उत्तरकाशी गई थी। जहां हर्षिल, गंगोत्री और आसपास के पर्यटन स्थल घूमने के बाद 28 मई को वे रैथल गांव में रूके। और सीसीटीवी कैमरों में बबीता को इन दोनों मित्रों के साथ आखिरी बार रैथल गांव में देखा गया। 29 मई को तीनों मित्रों ने रेथल से दयारा बुग्याल के लिए अपनी ट्रेकिंग शुरू की और रात में गोई बेस कैंप पर रुके। इसी कैंप से 29 मई की आधी रात को बबीता पांडे रहस्यमय परिस्थितियों में लापता हो गईं थी। 38-39 दिनों बाद भी बबीता का कोई सुराग नहीं लग पाया है। दोस्तो बबीता मिसिंग केस की जांच के दौरान खुलासा हुआ कि पर्यटन विभाग के आधिकारिक पोर्टल ‘एक्सप्लोर उत्तरकाशी’ पर बबीता पांडे या उनके साथियों के नाम का कोई वैध डिजिटल परमिट नहीं था। उत्तरकाशी के जिला पर्यटन अधिकारी केके जोशी का कहना है कि जिस ट्रेकिंग एजेंसी के माध्यम से ये लोग गए थे, उसने सरकार के राजस्व और निर्धारित 150 ट्रेकर्स प्रतिदिन की अनुमति के नियम को दरकिनार करने के लिए एक पुराने फिजिकल परमिट पर बबिता और उसके दोस्तों के नाम चिपका दिए। चेकपोस्ट पर जब उसका क्यूआर कोड स्कैन किया गया, तो वह पुराने ट्रेकर्स का डेटा दिखा रहा था।