हिमालय की गोद में होने वाला मां नंदा का ये महापर्व आखिर इतना खास क्यों है?क्यों ‘बड़ी जात’ और ‘लोक जात’ के जरिए होती है मां नंदा की विदाई और क्या है इस परंपरा के पीछे छिपा सदियों पुराना रहस्य? बताउंगा आपको पूरी खबर। दोस्तो, जहां का कण-कण शंकर है और हर घाट पर मां भगवती का वास है। इसी पावन धरती पर दुनिया की सबसे लंबी और सबसे कठिन पैदल धार्मिक यात्रा आयोजित होती है, जिसे हम ‘नंदा देवी राजजात यात्रा’ के नाम से जानते हैं, इसे हिमालय का महाकुंभ भी कहा जाता है, लेकिन अक्सर लोगों के मन में एक बहुत बड़ा कन्फ्यूजन रहता है कि आखिर ये ‘राजजात’ क्या है? ‘बड़ी जात’ किसे कहते हैं? और हर साल होने वाली ‘लोक जात’ क्या है? क्यों मां नंदा की विदाई की ये महायात्रा दो हिस्सों में बंटी हुई है? और क्यों एक चार सींगों वाला मेढ़ा बिना किसी के चलाए, अकेले ही हिमालय के बर्फीले शिखरों की ओर बढ़ जाता है? आज बताउंगा आपको इस अलौकिक यात्रा के कई अनसुने रहस्य! दोस्तो सबसे पहले बात करते हैं उस महायात्रा की, जिसका इंतजार पूरी दुनिया करती है। इसे ही ‘नंदा राजजात’ या ‘बड़ी जात’ कहा जाता है। यह कोई आम यात्रा नहीं है, बल्कि हर 12 साल में एक बार आयोजित होने वाला एक वैश्विक महाकुंभ है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मां नंदा (पार्वती) जब अपने मायके (नौटी गांव, चमोली) से अपने ससुराल (कैलाश पर्वत) के लिए विदा होती हैं, तो उनके सम्मान में इस महायात्रा का आयोजन किया जाता है। दोस्तो चमोली के कासुआ गांव के कुंवर (राजवंश के वंशज) इस भव्य यात्रा की अगुवाई करते हैं। नौटी गांव से शुरू होकर रूपकुंड और रहस्यमयी होमकुंड तक जाने वाली यह यात्रा करीब 280 किलोमीटर की बेहद कठिन पैदल दूरी तय करती है, जहां रास्ते में घने जंगल, खड़ी चढ़ाई और हाड़ कंपा देने वाली बर्फ मिलती है।
दोस्तो अब समझिए उस पहलू को, जो हर साल श्रद्धालुओं को असमंजस में डालता है—यानी ‘लोक जात’। जहां ‘बड़ी जात’ या राजजात 12 साल में एक बार होती है, वहीं ‘लोक जात’ हर साल आयोजित की जाती है. इसे ‘नंदा देवजात’ भी कहा जाता है। दोस्तो क्योंकि मां नंदा उत्तराखंड के कण-कण में रची-बसी हैं, इसलिए हर साल भाद्रपद (भादों) के महीने में कुरुड़ के नंदा देवी मंदिर से मां की डोली वेदनी बुग्याल और अन्य ऊंचे शिखरों की यात्रा पर निकलती है। ‘लोक जात’ में राजा या राजघराने की औपचारिकताएं नहीं होतीं, ये विशुद्ध रूप से स्थानीय लोकमानस, ग्रामीणों और आम भक्तों की अगाध श्रद्धा का प्रतीक है। यानी सीधे शब्दों में कहें, तो 12 साल में होने वाला भव्य आयोजन ‘राजजात’ है और हर साल होने वाली स्थानीय यात्रा ‘लोक जात’ है। दोस्तो दोस्तो राजजात और लोक जात दोनों का मूल भाव मां की विदाई ही है। राजजात जहां पूरे विश्व को जोड़ती है और 12 साल के अंतराल पर होती है, वहीं लोक जात हर साल स्थानीय भक्तों की मां के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का जरिया है, लेकिन दोस्तो सवाल यह उठता है कि यह हिमालयी महाकुंभ दो हिस्सों या दो विचारधाराओं में क्यों बंटा दिखाई देता है? इतिहासकारों और जानकारों की मानें तो इसके पीछे ‘राजशाही परंपरा’ और ‘लोक परंपरा’ का एक सुंदर संतुलन है। राजजात (बड़ी जात) का संचालन कासुआ के कुंवरों और नौटी के पुजारियों के दिशा-निर्देश में होता है, जो पूरी तरह शास्त्रोक्त और प्राचीन राजशाही नियमों से बंधी है। वहीं दूसरी तरफ, कुरुड़ और दशोली क्षेत्र से निकलने वाली लोक जात पूरी तरह जन-सामान्य की भावनाओं पर आधारित है। दोस्तो समय के साथ भले ही इन यात्राओं के नाम और संचालन के तरीके अलग दिखते हों, लेकिन जब ये दोनों यात्राएं हिमालय के ऊंचे बुग्यालों में जाकर एक-दूसरे से मिलती हैं, तो पूरा हिमालय ‘जय मां नंदा’ के जयकारों से गूंज उठता है। दोनों धाराएं मिलकर एक अखंड आस्था का समंदर बन जाती हैं। और दोस्तो इस महायात्रा का सबसे बड़ा और अलौकिक रहस्य है—चौसिंग्या खाडू। यानी चार सींगों वाला वो मेढ़ा, जो राजजात के समय रहस्यमयी तरीके से पैदा होता है। होमकुंड पहुंचने के बाद, मां नंदा की विदाई की सामग्री पीठ पर लादे यह मूक पशु अकेले ही आगे बर्फीले पहाड़ों की ओर निकल जाता है और कभी वापस नहीं लौटता। विज्ञान आज भी इस आस्था के आगे नतमस्तक है, तो अब आपका कन्फ्यूजन दूर हो गया होगा—12 साल का महाकुंभ यानी राजजात (बड़ी जात) और हर साल होने वाली श्रद्धा की यात्रा यानी लोक जात देवभूमि की इस अनूठी और पावन परंपरा पर आपको हमारी ये रिपोर्ट कैसी लगी, हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं। इस वीडियो को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ताकि हर शिव-नंदा भक्त का भ्रम दूर हो सके।