‘मंच पर कन्फ्यूज्ड थे Daler Mehndi!’। Sona Mohapatra। Subodhu Uniyal। Rajpal Yadav। Uttarakhand News

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दोस्तो, उत्तराखंड के एक मंच से शुरू हुआ दलेर मेहंदी विवाद अब बॉलीवुड से लेकर सियासत तक पहुंच गया है! राजपाल यादव ने मंत्री सुबोध उनियाल को नसीहत दी, आम आदमी पार्टी के विधायक जरनैल सिंह ने विवाद में पगड़ी और सियासत का एंगल जोड़ दिया, तो मशहूर गायिका सोना मोहपात्रा ने भी अपने पुराने अनुभव का जिक्र कर नई बहस छेड़ दी! आखिर यह लड़ाई कलाकार के सम्मान की है या दर्शकों के पैसे और लाइव परफॉर्मेंस की जवाबदेही की? क्या किसी बड़े कलाकार की शोहरत सवालों से ऊपर हो सकती है? और इस पूरे विवाद में किसका पक्ष कितना मजबूत है? आइये आज इस पर बात करते हैं। दोस्तो देवभूमि उत्तराखंड के एक सांस्कृतिक मंच से शुरू हुई ‘सुरों और रसूख’ की जंग अब सिर्फ एक मंत्री और एक सिंगर के बीच की लड़ाई नहीं रह गई है। यह विवाद अब एक ऐसे बारूद के ढेर में तब्दील हो चुका है, जिसमें बॉलीवुड से लेकर सियासत तक के बड़े-बड़े दिग्गजों ने एंट्री मार दी है! एक तरफ जहां फिल्म अभिनेता राजपाल यादव ने मंत्री जी को सीधे नसीहत दे डाली है, वहीं पंजाब चुनाव के ठीक पहले इस मुद्दे में ‘पगड़ी’ और ‘सियासी नफरत’ का एंगल भी जुड़ गया है। लेकिन इन सब के बीच, संगीत इंडस्ट्री के अंदर से ही एक ऐसी आवाज उठी है जिसने दलेर मेहंदी की पेशेवर जवाबदेही पर ही सबसे बड़ा बम फोड़ दिया है! मशहूर सिंगर सोना मोहपात्रा ने एक ऐसा पुराना सच उजागर किया है, जिसने हर किसी को हैरान कर दिया है। दोस्तो आखिर क्या कोई बड़ा कलाकार अपनी विरासत की आड़ में पेशेवर लापरवाही कर सकता है? क्या कला को सचमुच खरीदा नहीं जा सकता या फिर दर्शकों के टिकट के पैसों की कोई कीमत नहीं है?

दोस्तो ये वो एक वीडियो है इसने पूरे देश में आग लगा रखी है सियासी और सिनेमाई जगत में उत्तराखंड के कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल और पंजाबी पॉप किंग दलेर मेहंदी का मंच पर हुआ टकराव अब एक राष्ट्रीय मुद्दा बन चुका है। मनोरंजन जगत से लेकर राजनीतिक गलियारों तक, इस विवाद की आंच दूर तक पहुंच चुकी है। जहां एक तरफ कलाकार के सम्मान की दुहाई दी जा रही है, वहीं दूसरी तरफ पंजाब में होने वाले आगामी चुनावों के मद्देनजर इस पूरे मामले ने अब एक बेहद संवेदनशील और सियासी रूप अख्तियार कर लिया है। दोस्तो इस पूरे विवाद में दलेर मेहंदी के पक्ष में बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता राजपाल यादव खुलकर सामने आ गए हैं। राजपाल यादव ने उत्तराखंड के कैबिनेट मंत्री सुबोध उनियाल को सीधे नसीहत देते हुए कहा है कि ‘कला को कभी खरीदा नहीं जा सकता।’ उन्होंने साफ किया कि एक कलाकार की कला अनमोल होती है और मंच पर उसका सम्मान सर्वोपरि होना चाहिए। राजपाल यादव के इस बयान ने इस लड़ाई को अब ‘कलाकार बनाम राजनेता’ की शक्ल दे दी है। दोस्तो लेकिन बात सिर्फ बॉलीवुड तक नहीं थमी। पंजाब चुनाव नजदीक आते ही इस मामले में सीधे राजनीति की एंट्री हो चुकी है। आम आदमी पार्टी के विधायक जरनैल सिंह ने इस विवाद को एक नया और तीखा मोड़ दे दिया है। जरनैल सिंह ने दलेर मेहंदी के साथ हुए व्यवहार को बेहद खराब बताते हुए मांग की है कि उत्तराखंड के मंत्री सुबोध उनियाल को दलेर मेहंदी से तुरंत माफी मांगनी चाहिए। इतना ही नहीं, उन्होंने एक बेहद गंभीर आरोप लगाते हुए यहां तक कह दिया कि ‘सारे भाजपाई पगड़ी वालों से नफरत करते हैं।’ इस बयान के बाद अब यह पूरा विवाद पूरी तरह से राजनीतिक ध्रुवीकरण की ओर बढ़ता दिख रहा है।

दोस्तो एक तरफ जहां दलेर मेहंदी को चौतरफा समर्थन मिल रहा है, वहीं दूसरी तरफ संगीत इंडस्ट्री से ही उठी एक बेबाक आवाज ने इस पूरे विवाद का रुख मोड़ दिया है। मशहूर और बेबाक गायिका सोना मोहपात्रा ने सोशल मीडिया पर दलेर मेहंदी को लेकर अपना एक चौंकाने वाला अनुभव साझा किया है। सोना ने बताया कि दिल्ली के ‘सूफी हेरिटेज फेस्टिवल’ के दौरान दलेर मेहंदी मंच पर बेहद कन्फ्यूज्ड नजर आ रहे थे और वे लगातार एक ही म्यूजिकल फ्रेज (सुर की लाइन) को बार-बार दोहरा रहे थे। उनके इस सोसल मीडिया पोस्ट से अलग खलबली है, सवाल भी तमाम है। दोस्तो सोना मोहपात्रा ने सम्मान के चलते पहले तो चुप्पी साधे रखी, लेकिन कुंजापुरी मेले की घटना के बाद उनका बोलना जरूरी हो गया। आगे वो लिखती हैं कि उन्होंने सीधे तौर पर प्रोडक्शन की क्वालिटी और दर्शकों के पैसे के प्रति आयोजकों की जवाबदेही पर बड़े सवाल उठाए हैं। सोना ने बेहद कड़ा सवाल पूछते हुए कहा कि, “अगर कलाकार परफॉर्म करने की सही स्थिति में नहीं थे, तो कार्यक्रम को रद्द क्यों नहीं किया गया?” और दोस्तो अभिनेत्री साफ किया कि किसी ‘लेजेंड’ यानी महान कलाकार का सम्मान अपनी जगह है, लेकिन इसकी आड़ में पेशेवर जवाबदेही और प्रोफेशलिज्म को खत्म नहीं किया जा सकता। अब दोस्तो यह विवाद एक बेहद गंभीर बहस में तब्दील हो चुका है। एक तरफ राजपाल यादव और जरनैल सिंह जैसे चेहरे हैं जो इसे कलाकार के सम्मान और पहचान की लड़ाई बता रहे हैं, तो वहीं दूसरी तरफ सुबोध उनियाल और सोना मोहपात्रा जैसे लोग हैं जो दर्शकों के पैसे, वक्त और पेशेवर ईमानदारी की बात कर रहे हैं। सवाल अब भी वही है—क्या उम्र और बड़ी विरासत किसी भी कलाकार को मंच पर लापरवाही बरतने की छूट दे देती है? देवभूमि से भड़की यह चिंगारी अब मनोरंजन और राजनीति के किस-किस खेमे को झुलसाएगी, यह देखना बाकी है। दोस्तो कलाकार का सम्मान अपनी जगह बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन जब बात जनता की उम्मीदों और पेशेवर जवाबदेही की आती है, तो रेखा कहां खींची जानी चाहिए? आम आदमी पार्टी ने इसे पंजाब चुनाव और पगड़ी के सम्मान से जोड़ दिया है, तो वहीं संगीत जगत के भीतर से उठी सोना मोहपात्रा की आवाज ने इस बहस को एक तार्किक मोड़ दे दिया है। इस बेहद संवेदनशील और बड़े विवाद पर आपकी क्या राय है।