Dehradun सरकारें सचमुच बहरी हो चुकी हैं? | Divyang Students | Protest | CM Dhami | Uttarakhand News

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दोस्तो दिल्ली और झारखंड में युवाओं के आंदोलनों की चर्चा खूब हो रही है, लेकिन देहरादून में चल रहे इस आंदोलन की कहानी भी कम चौंकाने वाली नहीं है। महज 10 दिनों के प्रदर्शन ने ऐसा क्या कर दिया कि सरकार तक को जवाब देना पड़ा? आखिर वो कौन-सी मांग है, जिसे लेकर आंदोलन लगातार बढ़ता जा रहा है? क्या सच में सरकारें इनकी आवाज सुन नहीं रही हैं या फिर सुनकर भी अनसुना कर रही हैं? देखिए देहरादून के इस आंदोलन की पूरी कहानी। दोस्तो लोकतंत्र के सबसे बड़े मंदिर के दावों को देखना हो, तो ज़रा देश की सड़कों पर उतरिए! उत्तराखंड की खूबसूरत वादियों में बसा देहरादून इस वक्त न्याय की भीख मांग रहे उन छात्रों की गूंज से दहल रहा है, जिन्हें कुदरत ने आंखें नहीं दीं, लेकिन अफ़सोस आंखें तो सरकार के पास भी नहीं हैं! देहरादून के राष्ट्रीय दृष्टि दिव्यांगजन संस्थान में 10 दिन पार कर चुका है छात्र अपनी बुनियादी सुविधाओं के लिए, स्कॉलरशिप के लिए, और एक अदद लैपटॉप के लिए धरने पर बैठे हैं। पहले देहरादून के इस दर्द को समझिए। जो छात्र देख नहीं सकते, वे व्यवस्था की सड़ांध को महसूस कर रहे हैं। तीन साल से स्कॉलरशिप बंद है, हॉस्टल का खाना जानवरों से बदतर है, और पढ़ने के लिए ब्रेल किताबें तक मयस्सर नहीं हैं। कमाल देखिए, प्रशासन कहता है कि ₹48 लाख का लैपटॉप बजट पास हो गया है, लेकिन मिलेगा कब? नवंबर में! यानी जब आधा सत्र बीत जाएगा। हद तो तब हो गई जब स्कॉलरशिप बहाल करने के नाम पर ऐसी शर्त थोप दी गई, जो इनके हक पर डाका डालने जैसी है। बिना स्थायी निदेशक के चल रहा यह संस्थान आज उस प्रशासनिक अहंकार का प्रतीक बन चुका है, जहां दिव्यांगों की चीखें बंद कमरों में बैठे अफ़सरों के कानों तक नहीं पहुंचतीं। और पहुंचती हैं तो मंत्री जी पहुंचते हैं भागे भागे।

दोस्तो अब अपनी नज़रें घुमाइए देश की राजधानी दिल्ली काजंतर-मंतर दिखाई देगा और आपको दिखाई देगा झारखंड में जेएसएससी (JSSC) और रोज़गार के लिए प्रदर्शन करते युवा, पुलिसिया बर्बरता। दोस्तो झारखंड से लेकर उत्तराखंड तक, सरकारों का चरित्र एक जैसा हो चुका है। जब युवा अपने हक की बात करता है, तो उसे अपराधी की तरह ट्रीट किया जाता है m झारखंड में युवाओं पर लाठियां बरसाई जाती हैं, दिल्ली में उन्हें घसीटा जाता है, और देहरादून में दिव्यांगों को उनकी बुनियादी ज़रूरतों के लिए तरसाया जाता है। यह तुलना साबित करती है कि सूबा भले बदल जाए, सरकार का रंग भले बदल जाए, लेकिन युवाओं को लेकर सिस्टम का रवैया हमेशा दमनकारी रहता है और देरहादून में ये आंदोलन चलता जा रहा है यहां छात्र बिना दुनिया देखे। तमाम तामझाम को आइना दिखा रहे हैं और इस देश प्रदेश की सरकार में बैठे लोगों को दिन में तारे दिखाने का काम कर रहे हैं। दोस्तो ये देश के भविष्य की वो धुंधली तस्वीर है जिसे कोई भी सरकार अपनी पीठ थपथपाते वक्त दिखाना नहीं चाहती। देहरादून के ये दृष्टि दिव्यांग छात्र आज सिर्फ अपने लिए नहीं लड़ रहे, ये उस बहरे सिस्टम को जगाने के लिए लड़ रहे हैं जो सिर्फ चुनावों के वक्त जागता है। जंतर-मंतर से लेकर झारखंड की सड़कों तक बिखरा युवाओं का आक्रोश इस बात का गवाह है कि गंभीर इंसाफ अब दफ्तरों की फाइलों में दफन हो चुका है। सवाल बड़ा है—अगर देश का युवा, देश का खिलाड़ी, देश का दिव्यांग सड़क पर भूखा सोने को मजबूर है, तो फिर डिजिटल इंडिया और महाशक्ति बनने के खोखले वादे किसके लिए हैं? जवाब सरकारों को देना होगा, क्योंकि ये आक्रोश अब थमने वाला नहीं है। खास कर ये देरहादून वाला गुस्सा