Dehradun दिव्यांग छात्रों के आगे घुटनों पर आया सिस्टम! | Student Protest | Uttarakhand News

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दोस्तो क्या कोई सोच सकता था कि जो छात्र देख नहीं सकते, वो बंद कमरों में बैठी भ्रष्ट व्यवस्था की आंखें खोल देंगे? जी हां, देहरादून में यही चमत्कार हुआ है! दिव्यांग छात्रों के महा-आक्रोश से दहल उठा है पूरा सिस्टम। पिछले कई दिनों से चल रही ये जंग अब अपने अंजाम पर पहुँच चुकी है, जहाँ प्रशासन को झुकना ही पड़ा। वार्डन और प्रिंसिपल पर गिरी है गाज, और छात्रों ने दिखा दिया है कि जब हौसला फौलादी हो, तो बड़ी से बड़ी हुकूमत को भी घुटनों पर आना पड़ता है। आखिर क्या हुआ उस बंद कमरे की मीटिंग में? बताउंगा आपको पूरी खबर। दोस्तो बीते 10 -11 दिन से देहरादून की ये तस्वीर देश में चर्चा में हैं। जी हां दोस्तो दिव्यांग छात्रों का ये महा-आक्रोश और घुटनों पर आया सिस्टम! देहरादून के सबसे बड़े संस्थान में वो हो गया, जिसकी कल्पना अधिकारियों ने सपने में भी नहीं की थी। छात्रों की जिद के आगे आखिरकार झुकना ही पड़ा प्रशासन को, तक बने रहिए! दोस्तो ये गुस्सा एक या दो दिन का नहीं था।, देहरादून के राष्ट्रीय दृष्टि दिव्यांगजन सशक्तिकरण संस्थान (NIEPVD) में पिछले 10 -11 दिन से ये छात्र दिन-रात, धूप-बारिश की परवाह किए बिना धरने पर बैठे थे, वजह? बुनियादी हक! वो हक, जिसके लिए सरकारें करोड़ों का बजट पास करती हैं, लेकिन वो बजट छात्रों तक पहुँचने से पहले ही सिस्टम की फाइलों में दफन हो जाता है।

दोस्तो उच्च शिक्षा के लिए मिलने वाली स्कॉलरशिप पिछले 3 साल से बंद थी। कक्षा 9वीं से 12वीं तक के छात्रों से डिजिटल इंडिया के नाम पर जो लैपटॉप देने का वादा किया गया था, उसे दबाकर अधिकारी बैठे थे। हॉस्टल के मेस में कीड़े वाला और घटिया खाना परोसा जा रहा था, और हद तो तब हो गई जब छात्राओं ने डिस्पेंसरी में दुर्व्यवहार और डिसेबल बच्चों के साथ मारपीट के गंभीर आरोप लगाए। जब छात्रों ने आवाज उठाई, तो बदले में उन्हें मिली सिर्फ और सिर्फ अनदेखी! दोस्तो छात्रों ने साफ चेतावनी दे दी कि अगर मांगें पूरी नहीं हुईं, तो वे सामूहिक भूख हड़ताल पर बैठ जाएंगे। इस अल्टीमेटम ने दिल्ली से लेकर देहरादून तक के प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा दिया और दोस्तो आखिरकार, आखिर कार वो खबर भी आई कि जो सिस्टम पिछले एक हफ्ते से अंधा और बहरा बना बैठा था, उसे आधी रात को झुकना ही पड़ा! छात्रों के इस महा-आक्रोश के आगे घुटने टेकते हुए प्रशासन ने लिखित आश्वासन जारी किया। पहला बड़ा एक्शन ये कि वर्तमान व्यवस्था और अनुशासन को पटरी पर लाने के लिए हॉस्टल वार्डन और प्रशासनिक वार्डन को तत्काल प्रभाव से हटा दिया गया है। दूसरा बड़ा एक्शन ये कि लैपटॉप वितरण के लिए ₹48 लाख की भारी-भरकम राशि तुरंत स्वीकृत कर दी गई है, जिसे नवंबर तक हर हाल में बांटा जाएगा।

इसके अलावा, दोस्तो स्कॉलरशिप की बहाली पर सहमति बनी है, महिला स्पोर्ट्स ट्रेनर की मांग मान ली गई है और सुरक्षा के लिए सीसीटीवी कैमरों को अपग्रेड करने का लिखित वादा किया गया है। छात्रों के आक्रोश ने वो कर दिखाया जो महीनों की कागजी अर्जियां नहीं कर पाई थीं। लेकिन दोस्तो कहानी यहीं खत्म नहीं होती। सवाल है कि आगे क्या होने वाला है? भले ही प्रशासन ने लिखित में अपनी हार मान ली हो और वार्डन से लेकर अधिकारियों पर गाज गिरा दी हो, लेकिन आंदोलनकारी छात्र अभी भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं। छात्र इस वक्त प्रशासन के इस लिखित ड्रॉफ्ट का एक-एक बिंदु बारीकी से जांच रहे हैं। छात्रों का कहना है कि वे इस आंदोलन को तब तक पूरी तरह खत्म नहीं करेंगे, जब तक कि स्कॉलरशिप की शर्तों को पूरी तरह उनके पक्ष में नहीं बदला जाता और संस्थान को एक स्थायी फुल-टाइम डायरेक्टर नहीं मिल जाता। इस आंदोलन ने साफ कर दिया है कि अगर देश का युवा अपने अधिकारों के लिए सड़कों पर उतर आए, तो बड़ी से बड़ी सत्ता और कुर्सियों पर बैठे अधिकारियों को अपनी जिद छोड़नी ही पड़ती है। देहरादून की इस खबर पर आपकी क्या राय है? क्या आपको लगता है कि सिर्फ अधिकारियों को हटा देने से इस बड़े संस्थान की सड़ी हुई व्यवस्था सुधर जाएगी? कमेंट बॉक्स में अपनी राय जरूर दें।