आफत की बारिश से फिर बढ़ा खतरा! देखिए रिपोर्ट | Heavy Rain | Flash Flood | Uttarakhand News

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क्या उत्तराखंड के पहाड़ों पर रहने की सजा सिर्फ और सिर्फ मौत है? क्या देवभूमि के मासूम लोग हर साल सिर्फ इसलिए अपनी जान गंवाते हैं ताकि फाइलों में बंद रहने वाले हमारा सिस्टम अपनी नाकामी छुपा सके? कल का मंगलवार उत्तराखंड के इतिहास में एक ऐसा काला और अमंगल दिन साबित हुआ, जिसने एक बार फिर ये साबित कर दिया कि यहाँ के पर्वतीय जिलों में रहने वाले लोग कभी कुदरत की आपदा की बलि चढ़ते हैं, तो कभी गूंगे-बहरे सिस्टम की! महज 24 घंटे की बारिश और 11 लाशें! तीन मासूम बच्चों की चीखें पहाड़ के सन्नाटे को चीर गईं। आखिर कब तक? कब तक पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी इस तरह मलबे में दफन होती रहेगी? दोस्तो कल का दिन राज्य के लिए महा-अमंगल साबित हुआ। बादलों ने ऐसा कहर बरपाया कि देखते ही देखते 11 जिंदगी मलबे का ढेर बन गईं। अखबारों के पन्ने चीख-चीख कर गवाही दे रहे हैं कि कल उत्तराखंड में कुदरत ने तांडव मचाया है। देहरादून से लेकर पिथौरागढ़ और चमोली तक, सिर्फ तबाही की तस्वीरें हैं। केदारनाथ मार्ग हो या बदरीनाथ हाईवे, हर तरफ पहाड़ ताश के पत्तों की तरह ढह रहे हैं। लेकिन सवाल ये है कि क्या ये सिर्फ कुदरती आपदा है? नहीं! ये उस सिस्टम का कत्लखाना है जो हर साल मॉनसून आने से पहले ‘ऑल इज वेल’ का दावा करता है और पहली ही बारिश में ताश के महल की तरह ढह जाता है! दोस्तो जरा गौर से देखिए इन तस्वीरों को। 180 से ज्यादा सड़कें बंद पड़ी हैं पहाड़ के गांवों का संपर्क देश-दुनिया से पूरी तरह कट चुका है। कोई बीमार है तो वो अस्पताल नहीं पहुंच सकता, किसी गर्भवती महिला को प्रसव होना है तो उसे मलबे के बीच पैदल चलना पड़ रहा है। ये विकास का वो खोखला मॉडल है जिसे हमारे हुक्मरानों ने पहाड़ों पर थोप दिया है।

करोड़ों-अरबों रुपये के टेंडर पास होते हैं, बड़ी-बड़ी बैठकें होती हैं, लेकिन जब धरातल पर आपदा आती है, तो पहाड़ का आम आदमी बिल्कुल अकेला, बेबस और लाचार छोड़ दिया जाता है। पहाड़ों को खोदकर सड़कें तो बना दी गईं, लेकिन ब्लास्टिंग के नाम पर पूरे पहाड़ को भीतर से खोखला कर दिया गया। आज उसी लापरवाही की सजा यहाँ की आम जनता अपनी जान देकर भुगत रही है। दोस्तो मौसम विभाग ने एक बार फिर से भारी बारिश का अलर्ट जारी किया है। नदियां उफान पर हैं, जलस्तर लगातार बढ़ रहा है। लेकिन इस अलर्ट के बाद भी प्रशासन की तैयारियां सिर्फ कागजों तक सीमित हैं। पर्वतीय जिलों में आज भी लोग डर के साए में जीने को मजबूर हैं। रात को जब बारिश होती है, तो लोग अपने घरों में सो नहीं पाते, क्योंकि उन्हें डर है कि कहीं सोते समय कोई पहाड़ उनके घर पर न जमींदोज हो जाए। क्या यही है पहाड़ों का सुरक्षित भविष्य? क्या इसी दिन के लिए उत्तराखंड को अलग राज्य बनाया गया था कि यहाँ की जनता हर साल सिर्फ मौत का शिकार बनती रहे? दोस्तो 11 मौतों का जिम्मेदार कौन है? क्या कुदरत पर सारा दोष मढ़कर सरकारें और अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेंगे? आज उत्तराखंड का एक-एक नागरिक इस भ्रष्ट और सुस्त व्यवस्था से जवाब मांग रहा है। आपदा को रोका नहीं जा सकता, ये सच है। लेकिन आपदा के प्रबंधन में जो घोर लापरवाही बरती जाती है, उस पर चुप रहना भी एक अपराध है। अगर अब भी हमारा सिस्टम अपनी कुंभकरणी नींद से नहीं जागा, तो देवभूमि की ये खूबसूरत वादियां हर साल इसी तरह श्मशान बनती रहेंगी। जवाब देना ही होगा, क्योंकि अब पानी सिर से ऊपर जा चुका है!”