दोस्तो, लद्दाख के पर्यावरण और संवैधानिक मुद्दों को लेकर सोनम वांगचुक का अनशन फिर चर्चा में है, तो वहीं दूसरी ओर देश को प्रोफेसर जी.डी. अग्रवाल की याद आ रही है? क्या आपको उस IIT प्रोफेसर की याद है, जिसने न सत्ता मांगी, न कोई पद, बल्कि अपनी आखिरी सांस तक सिर्फ एक नदी के लिए लड़ता रहा? क्या आपको याद है वह शख्स, जिसने गंगा को बचाने की मांग करते-करते अपना जीवन ही दांव पर लगा दिया? दोस्तो लद्दाख के सोनम वांगचुक को आज देश जानता है। परीक्षा में गड़बड़ी और NEET पेपर लीक के खिलाफ सोनम वांगचुक की अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल का एक दिन कर आगे चलती जा रही है। ऐसा कुछ जीडी अग्रवाल ने भी किया था, आखिर कौन थे जी.डी. अग्रवाल? एक प्रतिष्ठित IIT प्रोफेसर या फिर गंगा के ऐसे प्रहरी, जिन्होंने अपने सिद्धांतों से कभी समझौता नहीं किया? उन्होंने ऐसा क्या देखा कि प्रयोगशालाओं और विश्वविद्यालयों की दुनिया छोड़कर गंगा बचाने की लड़ाई को अपनी जिंदगी का मिशन बना लिया? और आखिर वह कौन-सा संघर्ष था, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया? लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक के जंतर-मंतर पर अनशन के बीच एक बार फिर पर्यावरणविद् और गंगा संरक्षण के लिए अपना जीवन समर्पित करने वाले प्रोफेसर जीडी अग्रवाल की चर्चा तेज हो गई है। सोशल मीडिया पर लोग उनके संघर्ष को याद कर रहे हैं। प्रोफेसर जीडी अग्रवाल, जिन्हें संन्यास लेने के बाद स्वामी ज्ञानस्वरूप सानंद के नाम से जाना गया, उन चुनिंदा वैज्ञानिकों में थे जिन्होंने प्रयोगशालाओं और विश्वविद्यालयों की सीमाओं से बाहर निकलकर पर्यावरण संरक्षण को अपना जीवन लक्ष्य बना लिया। गंगा को अविरल और निर्मल बनाए रखने की मांग को लेकर उन्होंने कई बार अनशन किया और आखिरकार 2018 में 111 दिनों के आमरण अनशन के दौरान उनका निधन हो गया।
दोस्तो प्रोफेसर जीडी अग्रवाल ने पहली बार 2008 में गंगा संरक्षण को लेकर अनशन किया। इसके बाद उन्होंने कई बार सरकारों के सामने अपनी मांगें रखीं। उनका मानना था कि गंगा केवल एक नदी नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक धरोहर है, जिसकी अविरल धारा को बनाए रखना जरूरी है और दोस्तो साल 2010 में भागीरथी नदी पर प्रस्तावित लोहारी नागपाला जल विद्युत परियोजना के खिलाफ उन्होंने 38 दिनों तक अनशन किया। उनके आंदोलन के बाद तत्कालीन यूपीए सरकार ने इस परियोजना पर रोक लगाने का फैसला किया। इसे उनकी सबसे बड़ी पर्यावरणीय जीत माना जाता है। दोस्तो आज जैसे लद्दाख के सोनम वानचुक कई मुद्दों को लेकर लड़ाई लड़ रहे हैं। वैसे कुछ कभी जीडी अग्रवाल ने गंगा को बचाने के लिए किया। ऐसे में उनका 2018 का 111 दिन का अनशन भी याद आता है और उनकी वो प्रमुख मांगे भी 22 जून 2018 से प्रोफेसर जीडी अग्रवाल ने आमरण अनशन शुरू किया। उनकी प्रमुख मांगें थीं। गंगा सुरक्षा अधिनियम लागू किया जाए। गंगा पर बन रही और प्रस्तावित जल विद्युत परियोजनाओं पर रोक लगे। गंगा में बालू खनन पूरी तरह बंद किया जाए। गंगा संरक्षण के लिए स्वतंत्र और प्रभावी परिषद का गठन किया जाए।
साथ ही दोस्तो जीडी अग्रवाल ने सरकार को कई पत्र भी लिखे, जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संबोधित पत्र शामिल थे। उनका कहना था कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो वे अपना अनशन जारी रखेंगे। दोस्तो यहां मै आपको बता दूं कि लगातार अनशन के दौरान उन्होंने अक्टूबर 2018 में पानी पीना भी बंद कर दिया। तब हरिद्वार प्रशासन ने उन्हें मातृ सदन से एम्स ऋषिकेश में भर्ती कराया। स्वास्थ्य लगातार बिगड़ने के बाद 11 अक्टूबर 2018 को उनका निधन हो गया, उनकी मृत्यु ने देशभर में गंगा संरक्षण और पर्यावरण नीति को लेकर नई बहस छेड़ दी, लेकिन दोस्तो आप सोच रहे होंगे कि आज में जीडी अग्रवाल की चर्चा क्यों कर रहा हूं। वो इसलिए दोस्तो क्योंकि देश देख रहा है और मै भी कि सोनम वांगचुक के जंतर-मंतर पर अनशन और पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर चल रही बहस के बीच सोशल मीडिया पर लोग जीडी अग्रवाल के संघर्ष को याद कर रहे हैं। समर्थकों का कहना है कि उन्होंने वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आध्यात्मिक आस्था को जोड़ते हुए गंगा संरक्षण को राष्ट्रीय मुद्दा बनाया। वहीं, आलोचकों का मानना है कि उनकी कई मांगों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया। यही वजह है कि उनका नाम आज भी गंगा संरक्षण के सबसे बड़े आंदोलनों में गिना जाता है, लेकिन आप क्या कहेंगे इस खबर को लेकर अपनी राय जरुर दीजिएगा।