जी हां दोस्तो विधायक जी, आपकी तबीयत खराब हुई तो आप चार्टर्ड प्लेन पकड़कर या वीआईपी ट्रीटमेंट के लिए सीधे मुंबई के बड़े अस्पतालों में चले गए! लेकिन पहाड़ों की इस पथरीली जमीन पर कड़कती ठंड और बीमारियों से जूझ रही हमारी गरीब जनता जब तड़पती है, तो वो कहाँ जाए? दोस्तो उत्तराखंड में साल 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट आते ही नेताओं के वादों की पोल खुलनी शुरू हो गई है। पौड़ी गढ़वाल के सुप्रसिद्ध पर्यटक स्थल लैंसडाउन विधानसभा सीट से इस वक्त की सबसे बड़ी और जन-आक्रोश से भरी खबर सामने आ रही है!पिछले 15 वर्षों से लगातार इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहे विधायक के खिलाफ स्थानीय जनता ने सड़कों पर उतरकर मोर्चा खोल दिया है। जनता का सवाल सीधा और तीखा है कि इन 15 सालों में लैंसडाउन को कंक्रीट के होटलों के अलावा क्या मिला? प्रदर्शन के दौरान ग्रामीणों ने विधायक के मुंबई में चल रहे इलाज को लेकर जो तंज कसा है, उसने पहाड़ों की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था को सरेआम नंगा कर दिया है! आखिर क्यों 15 साल राज करने के बाद भी विधायक जी को खुद इलाज के लिए मुंबई भागना पड़ा? और पीछे छूटी इस बेबस जनता का दर्द सुनने वाला कौन है? दोस्तो पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी अब चुप बैठने वाली नहीं है। साल दर साल विकास के खोखले वादे सुन-सुन कर थक चुकी लैंसडाउन विधानसभा की जनता ने अब आर-पार की जंग का ऐलान कर दिया है। 20 अक्टूबर 2026 को लैंसडाउन के गांवों से निकलकर सैकड़ों युवा, महिलाएं और बुजुर्ग सड़कों पर उतर आए। उनका गुस्सा किसी बाहरी पार्टी के खिलाफ नहीं, बल्कि पिछले 15 सालों से लगातार क्षेत्र पर राज कर रहे उनके अपने विधायक के खिलाफ है। जनता ने सीधा सवाल दागा है कि तीन बार विधायक चुनने के बाद भी आज उनका क्षेत्र बुनियादी सुविधाओं के लिए वेंटिलेटर पर क्यों पड़ा है? दोस्तो इस पूरे प्रदर्शन के दौरान जनता का वो तीखा और दर्दनाक तंज सोशल मीडिया पर जंगल की आग की तरह फैल रहा है, जो सीधे तौर पर पहाड़ों की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था पर एक करारा तमाचा है। ग्रामीणों ने गरजते हुए कहा कि— “विधायक जी, जब आपकी तबीयत खराब हुई, जब आपको कोई बड़ा मेडिकल क्राइसिस आया, तो आपके पास पैसा था, रसूख था, आप इलाज के लिए तुरंत आर्थिक राजधानी मुंबई के बड़े और आलीशान कॉरपोरेट अस्पतालों में चले गए! लेकिन हमारी, हमारे बच्चों की और हमारे घर के बुजुर्गों की तबीयत जब आधी रात को खराब होती है, तो हम कहाँ जाएं? क्या हम इन टूटी हुई सड़कों पर तड़प-तड़प कर दम तोड़ने के लिए मजबूर हैं?
दोस्तो अब चलिए इस क्षेत्र की कड़वी हकीकत को समझते हैं। लैंसडाउन का यह पूरा इलाका चारों तरफ से टाइगर रिजर्व पार्क और घने जंगलों से घिरा हुआ है। यहाँ आए दिन गुलदार और बाघों का आतंक बना रहता है। ऐसे संवेदनशील और भौगोलिक रूप से कठिन क्षेत्र में एक अत्याधुनिक ट्रॉमा सेंटर या मल्टी-स्पेशलिटी अस्पताल होना अनिवार्य था। दोस्तो स्थानीय बुजुर्गों का कहना है कि एक दौर था जब जनरल टी.पी.एस. रावत इस क्षेत्र की कमान संभालते थे, तब जनता दरबार त्वरित समाधान और जनता के भरोसे का मुख्य माध्यम हुआ करते थे। लेकिन आज, सालों तक जिला पंचायत अध्यक्ष से लेकर विधायक तक की मलाई काटने वाले नेताओं के राज में भी, अगर खुद विधायक को इलाज के लिए मुंबई भागना पड़ रहा है, तो इससे बड़ा प्रमाण और क्या होगा कि उन्होंने खुद अपने क्षेत्र में स्वास्थ्य का कोई ढांचा खड़ा ही नहीं किया! दोस्तो उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 के मुहाने पर खड़े हैं। ऐसे समय में लैंसडाउन का यह भारी जनाक्रोश भारतीय जनता पार्टी के रणनीतिकारों के लिए खतरे की बहुत बड़ी घंटी है। जनता अब सिर्फ आश्वासनों की घुट्टी पीने को तैयार नहीं है; वो 15 साल की एक-एक पाई और विकास कार्यों का लिखित हिसाब मांग रही है। दोस्तो रोजगार की कमी की वजह से यहाँ के युवा लगातार पलायन कर रहे हैं और अब स्वास्थ्य सुविधाओं के इस भयंकर अभाव ने ग्रामीणों के सब्र का बांध तोड़ दिया है।
अगर विधायक दिलीप सिंह रावत के खिलाफ उपजा यह गुस्सा शांत नहीं हुआ, तो आगामी चुनावों में यहाँ बीजेपी के लिए अपना यह मजबूत किला बचाना लोहे के चने चबाने जैसा होने वाला है। दोस्तो ‘विधायक जी मुंबई पर जनता कहाँ जाए’ का यह नारा सिर्फ लैंसडाउन का नहीं, बल्कि उत्तराखंड के हर उस पहाड़ी गांव की चीख है जो आज भी एक अदद अच्छे डॉक्टर और अस्पताल के लिए तरस रहा है। अब देखना यह होगा कि इस भारी प्रदर्शन के बाद देहरादून के नीति-नियंताओं की नींद टूटती है या पहाड़ का यह आंसुओं भरा दर्द यूं ही वादियों में खो जाता है। दोस्तो वाकई, यह सवाल किसी भी संवेदनशील नागरिक की आत्मा को झकझोरने के लिए काफी है। जब जनता द्वारा चुने गए माननीयों को खुद सरकारी तंत्र पर भरोसा नहीं होता और वे इलाज के लिए मुंबई या दिल्ली भागते हैं, तो पीछे छूटी उस गरीब और लाचार जनता के साथ यह सबसे बड़ा विश्वासघात है जिसने उन्हें वोट देकर इस कुर्सी पर बिठाया था। हमारी मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जी से सीधी मांग है कि पर्वतीय क्षेत्रों में केवल कागजी अस्पतालों के बजाय असल में डॉक्टरों और आधुनिक चिकित्सा उपकरणों की तैनाती की जाए, ताकि पहाड़ की जनता को इलाज के लिए भटकना न पड़े।