दोस्तो, पिथौरागढ़ में GDS भर्ती के नतीजों ने आखिर इतने बड़े सवाल क्यों खड़े कर दिए हैं? 65 पदों में से 60 पर हरियाणा के युवाओं के चयन का दावा, और कई उम्मीदवारों के हाईस्कूल में 100 प्रतिशत अंक—लेकिन हिंदी की कोचिंग की जरूरत क्यों पड़ रही है? क्या भर्ती प्रक्रिया में कोई गड़बड़ी हुई है, या पूरे मामले के पीछे कुछ और है? अब उठ रही है उच्चस्तरीय जांच की मांग! देखिए, पूरा मामला। दोस्तो देवभूमि उत्तराखंड के सीमांत जिले पिथौरागढ़ से रोजगार व्यवस्था और भर्ती प्रणाली को शर्मसार कर देने वाली एक ऐसी कड़वी हकीकत सामने आई है, जिसने पूरे प्रदेश के शिक्षित बेरोजगारों के घावों पर तेजाब छिड़कने का काम किया है! भारतीय डाक विभाग की ग्रामीण डाक सेवक यानी GDS भर्ती के नतीजों ने एक बार फिर बड़े घोटाले की ओर इशारा किया है। दोस्तो पिथौरागढ़ जिले में GDS के 65 पदों में से 60 पदों पर भर्ती की सूची जारी हुई, और हैरान करने वाली बात देखिए— ये सभी के सभी 60 चयनित उम्मीदवार उत्तराखंड के नहीं, बल्कि हरियाणा के हैं! और उससे भी बड़ा चमत्कार देखिए कि इनमें से 50 उम्मीदवारों के दसवीं बोर्ड परीक्षा में पूरे 100 फीसदी नंबर हैं! नियम कहता है कि भर्ती सिर्फ 10वीं के नंबरों के आधार पर होगी, लेकिन हकीकत यह है कि इन 100% नंबर लाने वाले ‘महाज्ञानी’ टॉपरों को साधारण हिंदी लिखना और पढ़ना तक नहीं आ रहा है! पिथौरागढ़ डाक विभाग को इनके लिए बकायदा हिंदी की कोचिंग क्लास लगानी पड़ रही है! आखिर पहाड़ के युवाओं के हक पर ये कैसा डाका डाला जा रहा है?
दोस्तो क्या उत्तराखंड की धरती सिर्फ बाहरी राज्यों के उन कथित ‘टॉपरों’ के लिए चारागाह बन चुकी है, जो कागजों पर तो 100 फीसदी नंबर लाते हैं, लेकिन धरातल पर उनकी योग्यता शून्य है? पिथौरागढ़ जिले के डाकघर अधीक्षक अशोक कुमार पाठक के मुताबिक, नियम के तहत जिसके हाईस्कूल में ज्यादा नंबर होंगे, वो बाजी मारेगा; और इसी मेरिट के खेल में हरियाणा के उम्मीदवार उत्तराखंड के युवाओं को पछाड़कर आगे निकल गए, लेकिन यह मेरिट कितनी असली है और कितनी नकली, इसकी पोल तब खुली जब ये तथाकथित ‘टॉपर’ ज्वाइन करने पिथौरागढ़ पहुंचे। जिन युवाओं के सर्टिफिकेट में हिंदी विषय में 100 में से 100 नंबर दर्ज हैं, वे एक साधारण सी एप्लीकेशन यानी प्रार्थना पत्र तक नहीं लिख पा रहे हैं! स्थिति इतनी हास्यास्पद और शर्मनाक हो चुकी है कि डाक विभाग को इन दामादों के लिए विभाग के भीतर हिंदी सिखाने की कोचिंग का इंतजाम करना पड़ रहा है। दोस्तो उत्तराखंड में GDS भर्ती के नाम पर चल रहा यह खेल नया नहीं है। हर साल पहाड़ के युवाओं को इसी तरह ठेंगा दिखाया जाता है, साल 2024 का रिकॉर्ड उत्तराखंड में चुने गए 400 से अधिक डाक सेवकों ने अंत में ज्वाइन करने से ही मना कर दिया था, क्योंकि उनके दस्तावेज फर्जी पाए जाने का डर था। पूरे राज्य में बमुश्किल 10 फीसदी स्थानीय युवाओं का चयन हुआ था।
पौड़ी गढ़वाल का सच, पौड़ी में ज्वाइन करने आए एक हरियाणा के युवक से जब अधिकारियों ने ‘डाकघर’ लिखने को कहा, तो हिंदी में 95 फीसदी नंबर लाने वाला वह युवक ‘डाकघर’ की सही स्पेलिंग तक नहीं लिख सका। धारचूला की लापरवाही, इसी साल जून में धारचूला के एक गांव में ग्रामीणों की शिकायत पर जब जांच हुई, तो पता चला कि वहां तैनात बाहरी राज्य के GDS ने महीनों से डाक ही नहीं बांटी थी,50 से 60 आधार कार्ड और जरूरी सरकारी दस्तावेज धूल फांकते मिले, जिसके बाद उसे वहां से हटाना पड़ा। दोस्तो इस मुद्दे का सबसे संवेदनशील और गंभीर पहलू यह है कि पहाड़ों में एक ग्रामीण डाक सेवक का काम सिर्फ चिट्ठी पहुंचाना नहीं होता। उत्तराखंड के दुर्गम गांवों में जहां बैंक नहीं हैं, वहां यही डाक सेवक बुजुर्गों की वृद्धावस्था पेंशन, उनके जीवनभर की सेविंग्स और उनके आधार कार्ड के संचालन की मुख्य रीढ़ होते हैं। दोस्तो जब काउंटर के पीछे बैठा शख्स स्थानीय भाषा ‘कुमाऊंनी’ या बुनियादी ‘हिंदी’ तक नहीं समझ पाएगा, तो वो उन अनपढ़ और सीधे-साधे पहाड़ी बुजुर्गों की मदद कैसे करेगा? जब डाकिया ही हफ्तों तक डाक नहीं बांटेगा, तो दूरदराज के गांवों में जी रहे लोगों का संपर्क पूरी दुनिया से कट जाएगा। यह सीधे तौर पर पहाड़ के जनजीवन और सुरक्षा के साथ एक खिलवाड़ है।
दोस्तो इस पूरे मामले को लेकर सीमांत जनपद पिथौरागढ़ में सामाजिक और राजनीतिक संगठनों का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। पूर्व दायित्वधारी महेंद्र लुंठी और होटल एसोसिएशन के अध्यक्ष राजेंद्र भट्ट ने केंद्र और राज्य सरकार से इस पूरी भर्ती प्रक्रिया पर तत्काल रोक लगाकर एक उच्च स्तरीय जांच (Probe) की मांग की है। उनका तीखा सवाल है कि— आखिर हरियाणा के एक ही विशेष बेल्ट से इतने सारे छात्रों के 100% मार्क्स कैसे आ रहे हैं? और अगर वे वाकई इतने बड़े वैज्ञानिक और टॉपर हैं, तो वे केंद्रीय सेवाओं या सिविल सर्विसेज की तैयारी करने के बजाय पहाड़ों में आकर मात्र 15 से 20 हजार रुपये की GDS की नौकरी के लिए क्यों मरे जा रहे हैं? दोस्तो युवाओं का आरोप है कि इसके पीछे एक बहुत बड़ा संगठित फर्जी मार्कशीट गिरोह काम कर रहा है, जिसकी जांच होना देशहित में बेहद जरूरी है। दोस्तो भारत का हर युवा देश के किसी भी कोने में नौकरी करने का हकदार है, लेकिन जब चयन का आधार ही संदिग्ध हो और स्थानीय भाषा जानने की अनिवार्य शर्त को हवा में उड़ा दिया जाए, तो सवाल उठना लाजिमी है। अब देखना यह होगा कि उत्तराखंड के युवाओं के इस चीखते हुए दर्द पर मुख्यमंत्री धामी और केंद्र का डाक मंत्रालय क्या संज्ञान लेता है। दोस्तो मार्कशीट पर 100 फीसदी नंबर और दिमाग में बुनियादी भाषा का ज्ञान भी नहीं, वाकई यह मेरिट सिस्टम का सबसे बड़ा और भद्दा मजाक है। जब तक डाक विभाग GDS भर्ती के लिए केवल १०वीं के नंबरों के बजाय एक बुनियादी लिखित परीक्षा और स्थानीय भाषा का व्यावहारिक टेस्ट अनिवार्य नहीं करता, तब तक उत्तराखंड के काबिल और ईमानदार युवाओं के साथ ऐसा ही अन्याय होता रहेगा। पिथौरागढ़ से उठी यह जांच की मांग क्या दिल्ली के डाक भवन तक पहुंचेगी?