उफनती नदी बच्चों का सफर! गुहार सुन लो सरकार | Bageshwar | Bridgeissue | CM Dhami | Uttarakhand News

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दोस्तों, सोशल मीडिया पर इन्फ्लुएंसर्स की गुहार सुनकर सरकार हरकत में आती है, लेकिन बागेश्वर के इन मासूमों की पुकार आखिर कब सुनी जाएगी?बागेश्वर से सामने आई ये तस्वीरें सिस्टम के उन दावों पर बड़ा सवाल खड़ा करती हैं, जो पहाड़ों में तेज विकास की बात करते हैं।एक तरफ सोशल मीडिया पर इन्फ्लुएंसर्स की गुहार सुनी जाती है, तो दूसरी तरफ छटिया और स्याली गांव के मासूम बच्चे आज भी उफनती घांघली नदी को पार कर स्कूल जाने को मजबूर हैं।हाथ में बस्ता है। सामने उफनती नदी है और हर कदम पर खतरा!25 साल से पुल का इंतजार कर रहे इन ग्रामीणों का अब कहना है—अगर पुल नहीं बना, तो चुनाव का बहिष्कार करेंगे। सवाल है, आखिर इन बच्चों की पुकार कब सुनेगी सरकार? क्या देवभूमि उत्तराखंड में विकास सिर्फ रील्स और बड़े इन्फ्लुएंसर्स के वीडियो तक सीमित रह गया है? कुछ समय पहले जब सोशल मीडिया के बड़े चेहरों ने सरकार से गुहार लगाई, तो प्रशासन ने बिजली की रफ्तार से उनकी सुन ली। लेकिन बागेश्वर जिले के गरुड़ विकासखंड के छटिया और स्याली गांव के इन मासूम बच्चों की चीख आखिर देहरादून के आलीशान दफ्तरों तक क्यों नहीं पहुँच पा रही? हाथ में स्कूल का बस्ता, पैरों में चप्पल और सामने उफनती हुई काल बनकर बहती घांघली नदी! अपनी जान को हथेली पर रखकर हर रोज ये नौनिहाल नदी पार करने को मजबूर हैं।

ये बच्चे आज मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से सिर्फ एक छोटा सा पैदल पुल मांग रहे हैं ताकि वो जिंदा रहकर पढ़ाई कर सकें! आज इस व्यवस्था की धज्जियां उड़ाने वाली ज़मीनी हकीकत आपके सामने रखने जा रहे हैं। दोस्तो, दोस्तो देख रहे हैं आप डिजिटल इंडिया और ‘अपणो उत्तराखंड-चमकदो उत्तराखंड’ के दावों के बीच, यह बागेश्वर जिले के गरुड़ विकासखंड के छटिया और स्याली गांव की वो डरावनी हकीकत है, जो दावों का मखौल उड़ाती है। कब सुनेगी सकार? पिछले 25 से 30 सालों से यहाँ के ग्रामीण सिर्फ एक पैदल पुल के लिए गिड़गिड़ा रहे हैं, लेकिन बदला कुछ भी नहीं।यह मार्ग कोई मामूली रास्ता नहीं है; कब सुनेगी सकार? यह इलाके के 5 से 6 गांवों को मुख्य धारा से जोड़ने वाली एकमात्र लाइफलाइन है। इसी रास्ते से मासूम बच्चे स्कूल जाते हैं, इसी उफनती नदी को पार करके महिलाएं खेतीबाड़ी के लिए निकलती हैं और स्थानीय लोग अपनी रोजमर्रा की जरूरतों और राशन के लिए रोज इसी खौफ का सामना करते हैं। दोस्तो बरसात के दिनों में जब घांघली नदी अपना रौद्र रूप दिखाती है, तब मंजर और भी भयावह हो जाता है। कई बार तो छोटे-छोटे बच्चे नदी के इस खौफनाक और तेज बहाव को देखकर सहम जाते हैं और उन्हें स्कूल पहुँचने के लिए 3 किलोमीटर का अतिरिक्त और पथरीला चक्कर काटना पड़ता है! स्याली गांव के ग्राम प्रधान चंदन फर्स्वाण का कहना है कि कई बार बच्चे नदी पार करते वक्त संतुलन खोकर पत्थरों पर गिर चुके हैं और चोटिल हो चुके हैं।

क्षेत्र पंचायत सदस्य प्रमोद जोशी ने चेतावनी दी है कि सिस्टम के इन खोखले आश्वासनों का घड़ा अब भर चुका है। दोस्तो हैरानी की बात देखिए, कुछ समय पहले उत्तराखंड के कुछ बड़े सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स ने उत्तराखंड सरकार के सामने कुछ डिजिटल मांगें रखीं, तो सीएम पुष्कर सिंह धामी के निर्देश पर तुरंत एक्शन हो गया। लेकिन जब धरातल से, पहाड़ के इन सुदूर गांवों से ये मासूम बच्चे वीडियो बनाकर गुहार लगा रहे हैं, तो क्या इन बच्चों की कोई रीच नहीं है? क्या इनका कोई डिजिटल वजूद नहीं है? ग्रामीण इतने गुस्से में हैं कि उन्होंने साफ कह दिया है—’अगर विधानसभा चुनाव से पहले पुल का निर्माण शुरू नहीं हुआ, तो पूरा इलाका चुनाव का पूर्ण बहिष्कार करेगा और उग्र आंदोलन की राह पकड़ेगा.. दोस्तो क्या हमारी सरकारें सिर्फ चुनाव के वक्त वोट मांगने पहाड़ों की पगडंडियों पर आएंगी? या फिर इन बच्चों को सुरक्षित स्कूल भेजने के लिए घांघली नदी पर एक पुल भी नसीब होगा? मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी जी, पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी पहाड़ के काम आए न आए, कम से कम पहाड़ के इन बच्चों का बचपन तो उफनती नदियों में बहने से बचा लीजिए! इस वीडियो को इतना शेयर कीजिए कि यह बागेश्वर के जिलाधिकारी कार्यालय से लेकर सीधे मुख्यमंत्री आवास तक गूंज उठे। इन बच्चों के हक के लिए कमेंट बॉक्स में अपनी आवाज जरूर उठाइए