13 ग्लेशियरों से खतरा! उत्तराखंड पर मंडराया संकट? | Uttarakhand News

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दोस्तो, तिब्बत से लेकर नेपाल तक ग्लेशियर और बाढ़ की तस्वीरों ने पूरे हिमालय की चिंता बढ़ा दी है, लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल उत्तराखंड को लेकर उठ रहा है। क्या देवभूमि के पहाड़ भी किसी बड़े खतरे की आहट दे रहे हैं? उत्तराखंड में मौजूद 13 ग्लेशियरों को लेकर विशेषज्ञों की चेतावनी आखिर क्या कहती है?क्या ग्लेशियरों के तेजी से बदलते हालात भविष्य में बड़ी आपदा का कारण बन सकते हैं?और अगर खतरा है, तो क्या हमारी तैयारियां उस खतरे से निपटने के लिए पर्याप्त हैं? आज मै आपको दिखाउंगा इन ग्लेशियरों से जुड़ी पूरी तस्वीर और समझेंगे कि उत्तराखंड के लिए असली चिंता क्या है। दोस्तो एक्सपर्ट्स की खौफनाक रिपोर्ट, 13 ग्लेशियरों से बड़ा खतरा! नेपाल जैसी तबाही का अलर्ट! क्यों पिघल रहे हैं देवभूमि के पहाड़? सच रोंगटे खड़े कर देगा! देखिए.. पूरी खबर। दोस्तो तिब्बत में आसमान फटा, नेपाल में एक हजार लोग बाढ़ में बह गए, हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स मलबे में मिल गए, लेकिन क्या आपको पता है। इस तबाही का असली खौफनाक सिग्नल उत्तराखंड के लिए है! दोस्तो वाडिया इंस्टीट्यूट और इसरो की एक नहीं कई रिपोर्ट्स ने देवभूमि के पहाड़ों और ग्लेशियरों को लेकर जो खुलासे किए हैं, वो आपके रोंगटे खड़े कर देंगे। दोस्तो सबसे बड़ा सवाल ये कि तिब्बत में क्यों फटा ग्लेशियर? नेपाल में कैसे आई बाढ़? तिब्बत के पहाड़ों में भारी बारिश और बढ़ते तापमान के कारण मलबे से ढके ग्लेशियरों के ऊपर पानी की बड़ी-बड़ी झीलें बन गई थीं, जिन्हें ‘सुप्राग्लेशियल लेक’ कहा जाता है। 26 अगस्त को अचानक ये मोराइन बांध टूट गया और अरबों लीटर पानी कंक्रीट को चीरते हुए नेपाल की भोटकोशी नदी में उतर आया।

दोस्तो तापमान बढ़ने के कारण ग्लेशियर पिघल रहे हैं और हिमालयन रीजन में ये झीलें ‘टाइम बम’ की तरह फट रही हैं। अब दोस्तो यहां सवाल आता है कि उत्तराखंड का ‘स्नो ड्राउट’ और ‘हैंगिंग ग्लेशियर’ का खतरा अब बात करते हैं उत्तराखंड की। दोस्तो वैज्ञानिकों की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक, उत्तराखंड इस समय बेहद खतरनाक ‘स्नो ड्राउट’ (बर्फ के सूखे) और सर्दियों में कम बर्फबारी के दौर से गुजर रहा है। साथ ही दोस्तो गढ़वाल यूनिवर्सिटी के जियोलॉजी विभाग के प्रोफेसर एच.सी. नैनवाल की रिपोर्ट कहती है कि उत्तराखंड के ग्लेशियर हर साल 5 से 20 मीटर तक सिकुड़ रहे हैं। बर्फ की मोटाई कम हो रही है, जिससे ‘हैंगिंग ग्लेशियर’ (लटकते हुए ग्लेशियर) बेहद कमजोर हो चुके हैं। जरा सा तापमान बढ़ा या हल्की सी हलचल हुई, तो ये लटकती हुई बर्फ की चट्टानें टूटकर नीचे गिरेंगी, ठीक वैसे ही जैसे साल 2021 में चमोली की ऋषिगंगा आपदा के वक्त हुआ था। इतना ही नहीं है दोस्तो हाल ही में आई इसरो (ISRO) की स्टडी ने खुलासा किया था कि उत्तरकाशी के धराली में आई फ्लैश फ्लड का कारण श्रीकंठ ग्लेशियर के एक बर्फ के हिस्से का ढहना था। इसके अलावा दोस्तो एक्सपर्ट्स ने उत्तराखंड में 13 सबसे संवेदनशील ग्लेशियरों को चिन्हित किया है।

इनमें चमोली के चार ग्लेशियर (जिसमें वसुंधरा ताल शामिल है) उत्तरकाशी का केदारताल, बागेश्वर का नाग कुंड, टिहरी का मंसूर ताल, पिथौरागढ़ के मबांग और प्युंगरू समेत छह ग्लेशियर हाई-अलर्ट पर हैं! दोस्तो इन ग्लेशियरों के पास लगातार पानी का दबाव बढ़ रहा है जो कभी भी तिब्बत जैसी तबाही ला सकता है। एक तरफ कुदरत नाराज है, तो दूसरी तरफ इंसान का लालच चरम पर है। हाल ही में आई ‘एसडीसी फाउंडेशन’ (SDC Foundation) की उत्तराखंड डिजास्टर एनालिसिस रिपोर्ट ने सरकार के होश उड़ा दिए हैं, रिपोर्ट में साफ कहा गया है कि उत्तराखंड में ‘इंफ्रास्ट्रक्चर जनित आपदाओं’ और ‘अंधाधुंध मास टूरिज्म’ के कारण हिमालय का इकोसिस्टम पूरी तरह चरमरा गया है। संवेदनशील और दरकते ग्लेशियरों के ठीक नीचे कंक्रीट के बड़े-बड़े हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स बनाना और बिना किसी वैज्ञानिक ऑडिट के पहाड़ों को खोदना, मौत को खुली दावत देना है। दोस्तो नेपाल और तिब्बत की आपदा कोई मामूली घटना नहीं है, यह उत्तराखंड के लिए प्रकृति का आखिरी अल्टीमेटम है। अगर अब भी पहाड़ों पर चल रहे इस अंधे विकास और कंक्रीट के खेल को नहीं रोका गया, तो अंजाम बेहद भयानक होगा। क्या आपको भी लगता है कि उत्तराखंड सरकार को वैज्ञानिकों की इन चेतावनियों को गंभीरता से लेकर तुरंत कड़े कदम उठाने चाहिए? अपनी राय कमेंट बॉक्स में जरूर लिखें। इस वीडियो को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें