UKD का मास्टर प्लान! ’27’ में करेगा बेड़ा पार? | Election2027 | Surendra Kukreti | Uttarakhand News

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दोस्तों, 2027 के विधानसभा चुनाव का बिगुल अभी भले ही दूर हो, लेकिन उत्तराखंड की राजनीति में चुनावी शतरंज की बिसात बिछनी शुरू हो गई है। उत्तराखंड क्रांति दल ने बड़ा ऐलान करते हुए साफ कर दिया है कि वह राज्य की सभी 70 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगा। इतना ही नहीं, पार्टी ने ‘संकल्प, नए उत्तराखंड का’ नाम से अपना पहला नीतिगत एजेंडा भी जारी कर दिया है। अनुच्छेद 371, मूल निवास, भूमि सुधार, पलायन और आरक्षण के भीतर आरक्षण जैसे बड़े मुद्दों को चुनावी केंद्र में रखकर UKD ने नई सियासी लड़ाई का आगाज कर दिया है। अब सवाल यह है। क्या 2027 में UKD उत्तराखंड की राजनीति का समीकरण बदल पाएगा, या यह संकल्प सिर्फ चुनावी दस्तावेज बनकर रह जाएगा? दोस्तों, 2027 के विधानसभा चुनाव का बिगुल अभी बजा भी नहीं है, लेकिन उत्तराखंड की राजनीति में सियासी शतरंज बिछ चुकी है। कभी उत्तराखंड आंदोलन की अगुवाई करने वाला उत्तराखंड क्रांति दल अब फिर सत्ता की लड़ाई में पूरी ताकत के साथ उतरने का दावा कर रहा है। बड़ा ऐलान हुआ है। सभी 70 विधानसभा सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का। साथ ही जारी किया गया है नीतिगत एजेंडा— “संकल्प, नए उत्तराखंड का”। सवाल बड़ा है, क्या UKD इस बार सिर्फ मुद्दे उठाएगा या चुनावी मैदान में भी बड़ा उलटफेर करेगा? मै आपको दिखाउंगा।

उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर क्षेत्रीय दल उत्तराखंड क्रांति दल ने चुनावी रणभेरी बजा दी है। देहरादून में आयोजित पत्रकार वार्ता में पार्टी ने “संकल्प, नए उत्तराखंड का” नाम से अपना पहला नीतिगत एजेंडा जारी किया और साफ कर दिया कि इस बार यूकेडी किसी गठबंधन के भरोसे नहीं, बल्कि राज्य की सभी 70 विधानसभा सीटों पर अपने दम पर चुनाव लड़ेगाइस मौके पर केंद्रीय अध्यक्ष सुरेंद्र कुकरेती, पूर्व विधायक काशी सिंह ऐरी समेत पार्टी के कई वरिष्ठ नेता एक मंच पर दिखाई दिए और उत्तराखंड के मुद्दों पर नई राजनीतिक लड़ाई का एलान किया। दोस्तो यूकेडी का दावा है कि राज्य बनने के 26 साल बाद भी उत्तराखंड अपने मूल उद्देश्य से भटक गया है। पार्टी का आरोप है कि पलायन बढ़ा, गांव खाली हुए, प्राकृतिक संसाधनों पर स्थानीय लोगों का अधिकार कमजोर हुआ और विकास का लाभ मूल निवासियों तक नहीं पहुंचा। इसीलिए पार्टी ने पांच बड़े चुनावी संकल्प जनता के सामने रखे हैं।

  • अनुच्छेद 371 के तहत उत्तराखंड के लिए विशेष संवैधानिक प्रावधान।
  • मूल निवासियों को कानूनी अधिकार और विशेष संरक्षण।
  • राज्य के अनुरूप सख्त और व्यापक भू-कानून।
  • रोजगार पैदा कर पलायन पर रोक।
  • अनुसूचित जाति और जनजाति आरक्षण के भीतर न्यायसंगत वितरण।

यानी यूकेडी सीधे उन मुद्दों पर दांव खेल रही है, जो लंबे समय से उत्तराखंड की राजनीति के केंद्र में रहे हैं। दोस्तो यूकेडी का कहना है कि उत्तराखंड के जंगल, जल, जमीन और संस्कृति को बचाने वालों को ही सबसे ज्यादा उपेक्षा झेलनी पड़ी है। पार्टी का दावा है कि दूर-दराज के गांव आज भी सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। पार्टी का मानना है कि अगर पहाड़ों में रोजगार, उद्योग और बेहतर शिक्षा का ढांचा तैयार किया जाए तो पलायन अपने आप रुक सकता है..वहीं मूल निवास और भू-कानून जैसे मुद्दों को भी यूकेडी चुनावी एजेंडे का सबसे बड़ा हथियार बनाने की तैयारी में है, हालांकि यहां बड़ा सवाल यह भी है कि जिस उत्तराखंड आंदोलन की अगुवाई कभी उत्तराखंड क्रांति दल ने की थी, वही पार्टी पिछले कई चुनावों में राजनीतिक हाशिए पर क्यों पहुंच गई?

विधानसभा में उसका प्रतिनिधित्व लगभग समाप्त हो चुका है। ऐसे में क्या केवल पुराने मुद्दों को फिर से उठाकर यूकेडी जनता का भरोसा जीत पाएगी? या फिर 2027 का चुनाव भी बड़े राष्ट्रीय दलों— भाजपा और कांग्रेस— के बीच ही सिमट कर रह जाएगा?फिलहाल इतना तय है कि यूकेडी ने चुनावी एजेंडा जारी कर उत्तराखंड की राजनीति में अपनी मौजूदगी का मजबूत संदेश देने की कोशिश जरूर की है। तो दोस्तों, 2027 की चुनावी जंग में उत्तराखंड क्रांति दल ने अपनी रणनीति और संकल्प दोनों सामने रख दिए हैं। अब फैसला जनता को करना है कि क्या राज्य आंदोलन की विरासत एक बार फिर राजनीतिक ताकत बनेगी, या फिर यह एजेंडा भी चुनावी दस्तावेज बनकर रह जाएगा। अनुच्छेद 371, मूल निवास, भू-कानून और पलायन जैसे मुद्दे आने वाले दिनों में उत्तराखंड की राजनीति का केंद्र बन सकते हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है— क्या 2027 में UKD वापसी करेगी या फिर मुकाबला एक बार फिर बीजेपी बनाम कांग्रेस तक सीमित रहेगा? अपनी राय हमें कमेंट में जरूर बताइए।