दोस्तों, ज़रा सोचिए अगर आपको हर मानसून में यह डर सताए कि अगली बारिश आपके घर की आखिरी बारिश साबित हो सकती है। अगर हर रात पहाड़ी दरकने की आवाज़ आपको नींद से जगा दे और अगर 16 साल तक सरकार सिर्फ़ आश्वासन देती रहे, लेकिन आपको सुरक्षित घर न मिले तो आप क्या करेंगे? खबर देखिगे तो चौंक जाएंगे। दोस्तो अल्मोड़ा जिले के भैसियाछाना विकासखंड के बूढ़ाधार और खेरखेत गांव की कहानी कुछ ऐसी है, आप भी हेरत में पड़ जाएंगे। दोस्तो साल 2010-12 की आपदा के बाद इन गांवों को विस्थापित करने का फैसला तो हुआ, फाइलें भी बनीं, सर्वे भी हुएm अधिकारी भी आए लेकिन 16 साल बाद भी करीब 100 परिवार आज उसी खतरे के साए में रहने को मजबूर हैं। हर मानसून के साथ उनका डर भी लौट आता है। और सवाल वो ही फिर से आखिर कब मिलेगा इन परिवारों को सुरक्षित आशियाना? क्यों आज भी सरकारी फाइलों में कैद है इनका विस्थापन?
दोस्तो उत्तराखंड में मानसून आते ही सरकार आपदा से निपटने के दावे करती है। राहत और बचाव की तैयारियों की बातें होती हैं, लेकिन अल्मोड़ा जिले के भैसियाछाना विकासखंड के बूढ़ाधार और खेरखेत गांव के लोगों के लिए हर बारिश सिर्फ मौसम नहीं बल्कि जिंदगी और मौत के बीच की लड़ाई बन जाती है। साल 2010 और 2012 की आपदा ने इन गांवों की जमीन को इतना अस्थिर कर दिया कि प्रशासन ने इन्हें आपदाग्रस्त घोषित किया। विस्थापन की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही गई। उम्मीद जगी कि जल्द ही सुरक्षित जगह मिलेगी लेकिन आज 16 साल बीत चुके हैं। सरकारें बदलीं, अधिकारी बदले, योजनाएं बनीं लेकिन नहीं बदली तो इन ग्रामीणों की तकदीर। दोस्तो अल्मोड़ा बूढ़ाधार के करीब 100 परिवार आज भी उन्हीं जर्जर मकानों में रहने को मजबूर हैं। जहां हर बरसात नई दरारें छोड़ जाती है। कई घरों की दीवारें टूट चुकी हैं, खेत खिसक चुके हैं, लेकिन मजबूरी ऐसी कि गांव छोड़कर जाएं तो जाएं कहां? हम लोग 16 साल से सिर्फ अधिकारियों के चक्कर काट रहे हैं। हर बार कहा जाता है कि फाइल शासन में है, लेकिन आज तक कुछ नहीं हुआ। बरसात आते ही पूरी रात डर के साये में गुजरती है। यह पहली बार नहीं है जब बूढ़ाधार का दर्द सामने आया हो। साल 2016 में भी ग्रामीणों ने चेतावनी दी थी कि अगर विस्थापन नहीं हुआ तो चुनाव का बहिष्कार करेंगे। साल 2017 में खबरें छपीं कि बरसात आते ही गांव वालों की धड़कनें बढ़ जाती हैं। उसके बाद प्रशासन ने दावा किया कि जमीन चिन्हित कर ली गई है। जल्द विस्थापन होगा, लेकिन वो “जल्द” आज तक नहीं आया फाइलें आगे बढ़ती रहीं लेकिन ग्रामीण वहीं के वहीं रह गए।
दोस्तो लोग यहां कहते हैं कि बारिश शुरू होते ही बच्चों को लेकर पूरी रात जागते हैं। पता नहीं कब पहाड़ टूट जाए, कई बार अधिकारियों से मिले, लेकिन सिर्फ आश्वासन मिला। दोस्तों ग्रामीणों का कहना है कि जनप्रतिनिधियों ने भी कई बार जिला प्रशासन और सरकार के सामने उनकी मांग उठाई, ज्ञापन दिए बैठकें हुईं, लेकिन नतीजा शून्य रहा। आज भी गांव की सबसे बड़ी मांग सिर्फ एक है। हमें सुरक्षित जगह बसा दीजिए। क्योंकि अब हर मानसून उनके लिए नई परीक्षा बनकर आता है।- वहीं कुछ स्थानीय जनप्रतिनिधी कहते दिखाई देते हैं कि हमने कई बार शासन और प्रशासन के सामने विस्थापन का मुद्दा उठाया है, लेकिन आज तक सिर्फ आश्वासन मिले हैं। सरकार को अब इस मामले में तुरंत फैसला लेना चाहिए। उत्तराखंड में हर साल आपदा आती है, हर साल नई घोषणाएं होती हैं, लेकिन बूढ़ाधार और खेरखेत जैसे गांव आज भी पूछ रहे हैं। क्या सरकार किसी बड़ी त्रासदी का इंतजार कर रही है?क्या 16 साल का इंतजार भी कम है?और आखिर कब इन परिवारों को सुरक्षित जिंदगी का अधिकार मिलेगा? दोस्तों उत्तराखंड आपदाओं का राज्य है, लेकिन सबसे बड़ी त्रासदी तब होती है, जब आपदा के बाद भी पीड़ितों का दर्द खत्म नहीं होता। बूढ़ाधार और खेरखेत के ये परिवार पिछले 16 वर्षों से सिर्फ एक मांग कर रहे हैं—हमें सुरक्षित स्थान पर बसा दीजिए अब देखना होगा कि इस बार मानसून के बीच उठी यह पुकार सरकार तक पहुंचती है या फिर एक बार और विस्थापन की फाइल सरकारी अलमारियों में धूल फांकती रह जाएगी।