उत्तराखंड मदरसा नीति: 2 महीने बीते, आधे आवेदन भी नहीं; सरकार सख्त!

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उत्तराखंड सरकार द्वारा मदरसा शिक्षा व्यवस्था को मुख्यधारा से जोड़ने और उसमें पारदर्शिता लाने के लिए लागू की गई नई नीति जमीन पर हांफती नजर आ रही है। सरकार द्वारा पुराना मदरसा बोर्ड भंग कर उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के तहत नए सिरे से पंजीकरण शुरू किए दो महीने का समय बीत चुका है, लेकिन अब तक राज्य के आधे मदरसों ने भी आवेदन नहीं किया है। आगामी 30 सितंबर 2026 की डेडलाइन नजदीक आते देख सरकार ने कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। साफ चेतावनी दी गई है कि तय समय के बाद बिना पंजीकरण चलने वाले मदरसों पर सीधे ताला लगा दिया जाएगा। राज्य में कुल 452 पंजीकृत मदरसे हैं, जिनमें से सबसे बड़ी संख्या हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर जिलों में है। प्रशासनिक आंकड़ों के अनुसार, अकेले हरिद्वार जिले में कुल 271 मदरसे संचालित हैं, लेकिन कड़े नियमों के डर या प्रशासनिक ढिलाई के चलते अब तक महज 47 मदरसों ने ही नए पोर्टल पर पंजीकरण की हिम्मत दिखाई है। देहरादून और नैनीताल जैसे जिलों में भी आवेदन की रफ्तार बेहद सुस्त बनी हुई है, जिसने अल्पसंख्यक कल्याण विभाग की चिंताएं बढ़ा दी हैं।

उत्तराखंड में 1 जुलाई से मदरसा बोर्ड की व्यवस्थाएं पूरी तरह समाप्त कर दी गई थीं। इसके बाद मदरसों के संचालन और मान्यता के लिए नई व्यवस्था लागू की गई। अब मदरसों को उत्तराखंड अल्पसंख्यक शैक्षणिक व्यवस्था के लिए गठित प्राधिकरण के तहत रजिस्ट्रेशन कराना है। इसके साथ ही उन्हें शिक्षा विभाग और उत्तराखंड बोर्ड से जुड़े निर्धारित मानकों और नियमों को पूरा करना होगा। सरकार की कोशिश है कि मदरसों को भी मुख्यधारा की शिक्षा व्यवस्था से जोड़ते हुए उनकी शैक्षणिक व्यवस्था, पाठ्यक्रम, आधारभूत सुविधाओं और अन्य जरूरी मानकों को व्यवस्थित किया जाए। नई व्यवस्था के तहत मदरसों के लिए केवल धार्मिक शिक्षा तक सीमित व्यवस्था के बजाय शिक्षा से जुड़े निर्धारित मानकों को पूरा करना जरूरी होगा। संस्थानों को अपनी जानकारी और आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने होंगे। रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही उन्हें नई व्यवस्था के तहत मान्यता मिल सकेगी। सरकार ने इसके लिए ऑनलाइन आवेदन की सुविधा भी शुरू की है, ताकि मदरसा संचालक निर्धारित प्रक्रिया के तहत आवेदन कर सकें।