दोस्तो मरीजों की एम्बुलेंस में चल रहा था ‘मौ,त का धंधा’ पौड़ी पुलिस ने पकड़ी 90 किलो गांजे की खेप!एक तरफ उत्तराखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था धड़ाम। दूसरी तरफ एम्बुलेंस बनी ‘नशा एक्सप्रेस’!डॉक्टरों को प्राइवेट क्लीनिक की छूट, और एम्बुलेंस में गांजा। स्वास्थ्य मंत्रालय पर उठे महा-सवाल! कैसे रुद्रप्रयाग से ऋषिकेश तक फैला था नेटवर्क। जी हां दोस्तो ये सच है कि जिस एम्बुलेंस का सायरन सुनकर लोग अपनी गाड़ियों को किनारे लगा देते हैं कि भीतर कोई मरता हुआ मरीज अस्पताल पहुंच जाए। जरा सोचिए, अगर उसी एम्बुलेंस के भीतर मरीज की जिंदगी नहीं, बल्कि ₹45 लाख के नशे की खेप दौड़ रही हो, तो आप क्या कहेंगे? जी हां! दोस्तो देवभूमि उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल से एक ऐसी शर्मनाक और रीढ़ की हड्डी कंपा देने वाली खबर सामने आई है जिसने पूरे स्वास्थ्य महकमे के कपड़ों में आग लगा दी है! एक तरफ उत्तराखंड के पहाड़ों में गर्भवती महिलाएं डोली में दम तोड़ रही हैं, स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह धड़ाम है, डॉक्टरों को सरकारी ड्यूटी के बजाय प्राइवेट क्लीनिक चलाने की खुली छूट दी जा रही है और दूसरी तरफ सरकारी दावों के बीच एम्बुलेंस ‘नशा एक्सप्रेस’ बनकर दौड़ रही है! आखिर उत्तराखंड के स्वास्थ्य मंत्रालय की नाक के नीचे ये कौन सा खौफनाक खेल चल रहा है? उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले की श्रीनगर कोतवाली पुलिस ने नशा तस्करों के एक ऐसे खौफनाक और घिनौने नेटवर्क का पर्दाफाश किया है जिसे सुनकर आपकी रूह कांप जाएगी। सुनिए पुलिस क्या कह रही है। दोस्तो पुलिस ने चेकिंग के दौरान एक ऐसी एम्बुलेंस को रोका, जो रुद्रप्रयाग से ऋषिकेश की तरफ तेजी से दौड़ रही थी। जब पुलिस ने इसके पिछले दरवाजे को खोला, तो वहां कोई मरीज नहीं था, बल्कि एम्बुलेंस के भीतर खाकी रंग के कट्टों में 90 किलोग्राम अवैध गांजा छुपाकर रखा गया था। अंतरराष्ट्रीय बाजार में इस गांजे की कीमत करीब ₹45 लाख रुपये आंकी गई है। पुलिस ने तुरंत एम्बुलेंस चालक रविंद्र सिंह बिष्ट को गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे भेज दिया है। ये तस्वीर भी दोस्तो पौड़ी की है, अब देखिए मरीज को कैसे ले जाया जा रहा है।
वहीं पौड़ी है जहां से एक नहीं तकरीबन 5 मुख्यमंत्री बने हैं। वहां एक तो ये तस्वीर है बीमार महिला को डंडो के सहारे अस्पातल पहुंचाया जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ एंबुलेंश में नशा पहुंचाया जा रहा है। इधर से उधर दोस्तो अब दोस्तो ये मामला इतना भर नहीं है, तस्करों ने पुलिस की नजरों से बचने के लिए एम्बुलेंस का सहारा लिया, क्योंकि अमूमन इमरजेंसी गाड़ियों को पुलिस चेकिंग प्वाइंट्स पर नहीं रोका जाता। ये गांजा रुद्रप्रयाग के पहाड़ी इलाकों से इकट्ठा कर मैदानी इलाकों में युवाओं को बर्बाद करने के लिए ऋषिकेश और देहरादून ले जाया जा रहा था। दोस्तो पुलिस अब इस बात की जांच कर रही है कि यह एम्बुलेंस किसी निजी अस्पताल की है या सरकारी बेड़े की, और इसके पीछे कौन-कौन से बड़े सफेदपोश तस्कर शामिल हैं, लेकिन इस खबर का दूसरा और सबसे डरावना पहलू उत्तराखंड की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था है। एक तरफ जहां पहाड़ों में मरीजों को समय पर एक सामान्य एम्बुलेंस तक नसीब नहीं होती, तड़पते हुए मरीज दम तोड़ देते हैं, वहीं दूसरी तरफ उपलब्ध गाड़ियों का इस्तेमाल गांजा सप्लाई के लिए हो रहा है। हाल ही में उत्तराखंड स्वास्थ्य मंत्रालय का एक फैसला भारी चर्चा और विवादों में रहा था, जिसमें डॉक्टरों को सरकारी सेवा में रहते हुए भी निजी यानी प्राइवेट क्लीनिक चलाने की छूट देने का ऐलान किया गया था। जनता में भारी आक्रोश है कि एक तरफ तो मंत्रालय डॉक्टरों को प्राइवेट कमाई की छूट देकर सरकारी अस्पतालों को लावारिस छोड़ रहा है, और दूसरी तरफ विभाग की नाक के नीचे एम्बुलेंस में नशे का काला कारोबार फल-फूल रहा है। दोस्तो एम्बुलेंस से 45 लाख के गांजे की बरामदगी ने सीधे तौर पर विभागीय मॉनिटरिंग और सुरक्षा व्यवस्था की धज्जियां उड़ा दी हैं। जब जीवनदायिनी गाड़ियां ही मौत का सामान ढोने लगेंगी, तो आम जनता का इस पूरे सिस्टम से भरोसा उठना लाजिमी है। अब दोस्तो एम्बुलेंस से गांजे की बरामदगी और डॉक्टरों को प्राइवेट क्लीनिक की छूट। यह दोनों ही मामले उत्तराखंड के स्वास्थ्य ढांचे की कड़वी और खोखली हकीकत बयां करते हैं। सरकार को सिर्फ ड्राइवर को पकड़कर पल्ला नहीं झाड़ना चाहिए, बल्कि इस पूरे रैकेट की जड़ तक पहुंचना होगा। इस गंभीर मुद्दे पर और स्वास्थ्य मंत्रालय की इन नीतियों पर आपकी क्या राय है?