मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के श्रीनगर गढ़वाल दौरे के बीच अंकिता भंडारी को न्याय दिलाने की मांग एक बार फिर सड़कों पर गूंज उठी। VIP की गिरफ्तारी और जेल भेजने की मांग को लेकर प्रदर्शन की तैयारी कर रहे AISA से जुड़े छात्र नेताओं और महिला कार्यकर्ताओं को पुलिस ने हिरासत में ले लिया। इतना ही नहीं, महिला नेता सरस्वती देवी को उनके घर से ही हिरासत में लिए जाने की बात सामने आई है। आखिर मुख्यमंत्री के दौरे पर विरोध की आशंका के बीच पुलिस ने इतनी बड़ी कार्रवाई क्यों की? और हिरासत में लिए गए साथियों की रिहाई की मांग अब क्यों तेज हो रही है? दोस्तो उत्तराखंड की वो बेटी जिसके दर्द, जिसकी चीख और जिसकी हत्या ने पूरे देश को रुला दिया था, वो ‘अंकिता भंडारी’ आज भी न्याय के इंतजार में है! अंकिता के हत्यारों और उस कथित ‘वीआईपी’ का चेहरा बेनकाब करने की मांग एक बार फिर देवभूमि के पहाड़ों में गूंज उठी है। दोस्तो जब मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी श्रीनगर (गढ़वाल) के दौरे पर पहुंचे, तो वहां स्वागत और रैलियों की चकाचौंध के बीच छात्रों और युवाओं का गुस्सा फूट पड़ा। ‘आइसा’ यानी ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन के कार्यकर्ताओं और छात्र संघ के नेताओं ने सीएम के सामने अंकिता भंडारी को न्याय देने और उस छुपे हुए ‘वीआईपी’ को तुरंत सलाखों के पीछे भेजने की हुंकार भरी। लेकिन जवाब में इंसाफ तो नहीं मिला, बल्कि पुलिस का आक्रामक ‘डंडा’ और ‘गिरफ्तारी’ जरूर नसीब हुई! छात्र नेताओं को सड़कों पर घसीटा गया, आधी रात महिला नेताओं के घरों पर छापे मारकर उन्हें हिरासत में ले लिया गया। आखिर सरकार अंकिता के नाम से इतना डर क्यों रही है? क्यों न्याय की आवाज उठाने वालों की आवाज को पुलिस के दम पर कुचला जा रहा है? श्रीनगर (गढ़वाल) की धरती कल एक बार फिर अंकिता भंडारी हत्याकांड के न्याय की गूंज से दहल उठी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के श्रीनगर आगमन पर छात्रों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने वो सवाल दोबारा दाग दिया, जिससे सत्ता के गलियारे हमेशा बचते आए हैं—’अंकिता भंडारी को न्याय कब मिलेगा? वो वीआईपी कौन है और उसे जेल कब भेजा जाएगा?
दोस्तो मुख्यमंत्री के सामने विरोध प्रदर्शन या काले झंडे की आशंका से घबराई पुलिस ने कल सुबह से ही दमन चक्र चलाना शुरू कर दिया। छात्र संघ में विश्वविद्यालय प्रतिनिधि युवराज सिंह, पूर्व छात्र संघ उपाध्यक्ष शिवांक नौटियाल, पूर्व छात्रा प्रतिनिधि प्रियंका खत्री और आइसा की नगर अध्यक्ष प्रीति वर्मा जैसे ही अंकिता के पोस्टर लेकर सड़कों पर उतरे, भारी पुलिस फोर्स ने उन्हें चारों तरफ से घेर लिया और जबरन घसीटते हुए हिरासत में ले लिया! पुलिस का यह आक्रामक रूप यहीं नहीं रुका। दोस्तो हद तो तब हो गई जब आंदोलन को दबाने के लिए पुलिस ने लोकतांत्रिक मर्यादाओं को ताक पर रख दिया। महिला सामाजिक कार्यकर्ता और स्थानीय नेता सरस्वती देवी को पुलिस ने प्रदर्शन स्थल से नहीं, बल्कि सीधे उनके घर के भीतर घुसकर नजरबंद करते हुए हिरासत में ले लिया! श्रीनगर पुलिस की इस तानाशाही कार्रवाई के बाद पूरे गढ़वाल मंडल में छात्रों और आम जनता का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया है। सोशल मीडिया पर #JusticeForAnkitaBhandari एक बार फिर ट्रेंड करने लगा है और मांग उठ रही है कि हिरासत में लिए गए साथियों को अविलंब रिहा करो! दोस्तो आखिर पहाड़ के युवा बार-बार इस वीआईपी का मुद्दा क्यों उठा रहे हैं? ऋषिकेश के उसी वनंतारा रिसॉर्ट के स्टाफ ने गवाही दी थी कि अंकिता पर किसी खास ‘वीआईपी’ को एक्स्ट्रा सर्विस देने का दबाव बनाया जा रहा था, जिसका विरोध करने पर उसकी हत्या कर दी गई साल बीत गए, मुख्य आरोपी जेल में हैं, लेकिन उस तथाकथित सफेदपोश वीआईपी का नाम आज तक चार्जशीट में सामने नहीं आया। जनता और विपक्ष का सीधा आरोप है कि सरकार उस रसूखदार चेहरे को बचाने की पुरजोर कोशिश कर रही है। और यही वजह है कि जब भी कोई छात्र या बेटी इस वीआईपी के नाम पर सवाल उठाती है, तो उसे सलाखों के पीछे भेज दिया जाता है। दोस्तो मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी लगातार मंचों से कहते हैं कि बेटियों की सुरक्षा और न्याय उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता है। लेकिन धरातल की हकीकत यह है कि उनके ही दौरे के दौरान अपनी सुरक्षा और आत्मसम्मान की लड़ाई लड़ रही उत्तराखंड की बेटियों और युवाओं को अपराधी की तरह थानों में बंद कर दिया जाता है। श्रीनगर की सड़कों पर कल जो हुआ, उसने साबित कर दिया है कि पहाड़ की जनता अंकिता भंडारी के दर्द को भूली नहीं है। पुलिस की लाठियां और बैरिकेड्स इस चिंगारी को दबा नहीं सकते, बल्कि यह गुस्सा और ज्यादा भड़क रहा है। दोस्तो श्रीनगर (गढ़वाल) में छात्र नेताओं युवराज सिंह, शिवांक, प्रियंका, प्रीति और सरस्वती देवी की ये गिरफ्तारियां सरकार की नीयत पर बड़े सवाल खड़े करती हैं। अंकिता भंडारी को न्याय देने की मांग करना कोई अपराध नहीं है। अगर सरकार सचमुच पारदर्शी है, तो उसे छात्रों की आवाज दबाने के बजाय उस वीआईपी को बेनकाब करना चाहिए। जब तक उस बड़े चेहरे की गिरफ्तारी नहीं होती।