दोस्तो सिस्टम हारा, पहाड़ के ग्रामीणों की जिद जीती! आखिरकार घुटने टेकने पर मजबूर हुआ सरकारी अमला!ये है चमोली के सकंड गांव का वो ऐतिहासिक संघर्ष, जिसने अपनी तकदीर खुद बदल दी। ग्राम प्रधान शिवानी चौधरी की हुंकार के आगे ऐसा हड़कंप मचा कि राजस्व, वन विभाग और PWD के अधिकारियों को खुद गांव की चौपाल पर हाजिर होना पड़ा। आज पूरा उत्तराखंड पूछ रहा है कि आखिर 3 महीने में ऐसा क्या होने वाला है, जिससे इस गांव में मनेगा असली जश्न?! दोस्तो कहते हैं कि अगर इरादे पहाड़ों जैसे मजबूत हों, तो बड़े से बड़े सिस्टम और सोए हुए प्रशासन को भी घुटने टेकने के लिए मजबूर होना पड़ता है! दोस्तो पूरा गांव अपनी भविष्य की रणनीति को लेकर गैदी फावड़ा चला रहा है और तकलीफ और दर्द को को कुछ इस तरह बता रहा है, सुनेंगे तो सन रह जाएंगे। दोस्तो देवभूमि उत्तराखंड के चमोली जिले से एक ऐसी ही बड़ी और दिल को छू लेने वाली खबर सामने आ रही है, जिसने साबित कर दिया है कि जनता की सामूहिक ताकत के आगे अधिकारियों की सुस्ती कभी नहीं जीत सकती!चमोली के कर्णप्रयाग विकासखंड के सकंड गांव के ग्रामीणों की जिद और उनके मजबूत इरादों के आगे आखिरकार प्रशासन को मजबूर होना पड़ा है! सालों से सड़क की राह तक रहे इस गांव की तस्वीर बदलने के लिए अब खुद सरकारी अमला चलकर गांव की चौपाल तक पहुंचा है।
ग्राम प्रधान शिवानी चौधरी के नेतृत्व में ग्रामीणों ने वो दबाव बनाया कि राजस्व, वन विभाग और पीडब्ल्यूडी की संयुक्त टीम को खुद गांव आकर घुटने टेकने पड़े हैं और अल्टीमेटम देना पड़ा हैदोस्तो उत्तराखंड के पहाड़ों में सड़क सिर्फ एक रास्ता नहीं होती, बल्कि वो अस्पताल तक पहुंचने की उम्मीद होती है, बच्चों के उज्जवल भविष्य की सीढ़ी होती है। इसी उम्मीद और हक की लड़ाई लड़ रहे चमोली जिले के कर्णप्रयाग विकासखंड के अंतर्गत आने वाले सकंड गांव के ग्रामीणों को एक बड़ी कामयाबी मिली है। सालों से सड़क निर्माण की फाइलों में उलझे सिस्टम को ग्रामीणों के मजबूत इरादों ने हिलाकर रख दिया है। आखिरकार प्रशासन को ग्रामीणों की जायज मांग के आगे झुकना ही पड़ा। दोस्तो इस पूरे आंदोलन और प्रयास की कमान संभाली सकंड गांव की जागरूक ग्राम प्रधान शिवानी चौधरी ने। शिवानी चौधरी ने बताया कि ग्रामीणों की एकजुटता का ही असर था कि राजस्व विभाग, वन विभाग और लोक निर्माण विभाग (PWD) की एक संयुक्त टीम को खुद मजबूर होकर धरातल पर, यानी सकंड गांव आना पड़ा। अधिकारियों ने गांव का दौरा किया, जमीनी हकीकत देखी और ग्रामीणों के गुस्से व उनकी जरूरत को समझा। ग्राम प्रधान के मुताबिक, अधिकारियों ने अब हवा-हवाई बातें करना बंद कर दिया है और ऑन-कैमरा व लिखित तौर पर सड़क निर्माण की प्रक्रिया में तेजी लाने का भरोसा दिया है।
दोस्तो अक्सर पहाड़ों में योजनाएं सालों-साल लटकी रहती हैं, लेकिन सकंड गांव के लोगों ने इस बार अधिकारियों को ढिलाई बरतने का कोई मौका नहीं दिया। संयुक्त टीम ने ग्रामीणों के सामने यह आश्वासन दिया है कि सड़क निर्माण की राह में आने वाली सभी कागजी और तकनीकी बाधाओं को दूर कर, आगामी तीन महीने के भीतर आवश्यक कार्रवाई हर हाल में सुनिश्चित की जाएगी। वन भूमि हस्तांतरण से लेकर पीडब्ल्यूडी की एनओसी तक, हर प्रक्रिया को सुपरफास्ट मोड में डाला जाएगा ताकि तय समय सीमा के भीतर गांव को सड़क मार्ग से जोड़ा जा सके। दोस्तो सकंड गांव का यह मामला पूरे उत्तराखंड के उन गांवों के लिए एक बड़ी मिसाल है, जो आज भी सड़क, पानी और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं और पलायन को मजबूर हैं। इस गांव ने दिखाया कि अगर नेतृत्व सही हो और ग्रामीण एक सुर में अपने हक के लिए आवाज उठाएं, तो देहरादून में बैठे अधिकारियों की कुर्सी भी हिल जाती है। तीन महीने के भीतर मिलने वाली इस सड़क की सौगात से न सिर्फ ग्रामीणों का जीवन आसान होगा, बल्कि विकास की एक नई बयार इस क्षेत्र में बहेगी। दोस्तो कहते हैं कि लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन है, और सकंड गांव के लोगों ने इसे सच साबित कर दिखाया है। ग्राम प्रधान शिवानी चौधरी और तमाम ग्रामीणों का यह जज्बा वाकई सलाम करने योग्य है। अब उम्मीद यही है कि अधिकारियों ने जो तीन महीने का वादा किया है, वो सिर्फ कागजी साबित न हो, बल्कि तय समय पर धरातल पर जेसीबी चलती हुई दिखाई दे ताकि इस गांव का वनवास खत्म हो सके।ग्रामीणों की इस जीत पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट सेक्शन में जरूर बताएं। इस वीडियो को इतना शेयर कीजिए कि सोए हुए सिस्टम के हर अधिकारी तक यह संदेश पहुंच जाए।