दोस्तो, चमोली से आई ये तस्वीरें उत्तराखंड के पूरे सिस्टम पर बड़ा सवाल खड़ा कर रही हैं!सालों से सड़क की मांग करते-करते जब ग्रामीण थक गए तो आखिरकार उन्होंने नेताओं और अफसरों का इंतजार छोड़ दिया और खुद फावड़ा-गैंती उठा ली।पूजा-अर्चना की और फिर पहाड़ काटकर सड़क बनाने का काम खुद शुरू कर दिया!सवाल ये है—जिस सड़क के लिए सरकार से बार-बार गुहार लगानी पड़ी, आखिर वो सड़क अब ग्रामीणों को अपने दम पर क्यों बनानी पड़ रही है?क्या चमोली में सिस्टम इतना फेल हो गया कि विकास की सड़क भी अब जनता को खुद खोदनी पड़ेगी? तस्वीर देखेंगे तो गुस्से तमतमा उठोगे। दोस्तो पहाड़ में डिजिटल इंडिया के खोखले नारों की हवा निकल गई! उत्तराखंड की डबल इंजन सरकार के विकास के दावों के मुंह पर चमोली के इस गांव ने ऐसा तमाचा जड़ा है, जिसकी गूंज से देहरादून का सचिवालय हिल गया है! सालों तक गिड़गिड़ाए, अधिकारियों के चक्कर काटे, मंत्रियों के पैर छुए, लेकिन जब फाइलों से बाहर सड़क नहीं निकली, तो ग्रामीणों ने भगवान की पूजा की और खुद ही पहाड़ का सीना चीरने निकल पड़े! कर्णप्रयाग के सकंड गांव की इस तस्वीर ने पूरे सूबे की सियासत में वो हड़कंप मचाया है कि नेताओं को अब मुंह छिपाने की जगह नहीं मिल रही! क्या जनता का टैक्स सिर्फ नेताओं की सफेद गाड़ियों के लिए है?
दोस्तो पहाड़ों में विकास की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले हुक्मरानों, जरा इन तस्वीरों को आंखें फाड़कर देख लीजिए! यह तस्वीर उत्तराखंड के चमोली जिले के कर्णप्रयाग विकासखंड के अंतर्गत आने वाले सकंड गांव की है। जहां के ग्रामीणों ने सालों तक सड़क का इंतजार किया, हर चुनावी मौसम में नेताओं के झूठे वादे सुने। लेकिन जब सब्र का बांध टूट गया, तो उन्होंने किसी सरकारी मदद की भीख मांगना बंद कर दिया। ग्रामीणों ने सुबह माता-देवताओं की विशेष पूजा-अर्चना की और अपने गांव की किस्मत बदलने के लिए खुद ही ‘श्रमदान’ के जरिए सड़क की खुदाई में जुट गए। दोस्तो हैरान करने वाली बात यह है कि इस मार्ग का अंतिम सर्वे भी हो चुका था, लेकिन फाइलों की कछुआ चाल और प्रशासनिक लापरवाही के कारण काम धरातल पर कभी नहीं उतरा। बीमार बुजुर्गों को डोली के सहारे कई किलोमीटर पैदल मुख्य मार्ग तक ले जाना, गर्भवती महिलाओं की जान जोखिम में डालना और बच्चों का स्कूल न जा पाना—इस गांव की रोज़मर्रा की त्रासदी बन चुका था। थक-हारकर, पूरे गांव ने एकजुट होकर तय किया कि जिस सड़क के लिए वो पीढ़ियों से तरस रहे हैं, उसे अब वो अपने दम पर बनाएंगे। यह आत्मनिर्भरता नहीं है, यह इस भ्रष्ट और नकारा सिस्टम के मुंह पर सबसे करारा तमाचा है!
सकंड गांव का यह वीडियो जैसे ही सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, उत्तराखंड की सियासत में भूचाल आ गया। विपक्ष ने इस मुद्दे को हाथों-हाथ लपकते हुए सरकार पर चौतरफा हमला बोल दिया है। कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों का कहना है कि प्रदेश का बजट आखिर जा कहां रहा है, जब सीमांत जिलों के लोग आज भी आदिम युग की तरह खुद रास्ते बनाने को मजबूर हैं? सत्ताधारी दल के विधायकों और मंत्रियों के पास इस बात का कोई जवाब नहीं है कि जब सर्वे पूरा हो चुका था, तो बजट क्यों अटका रहा? दोस्तो पहाड़ों से पलायन रोकने के बड़े-बड़े दावे करने वाली सरकारों के लिए चमोली की यह हकीकत आंखें खोलने वाली है। अगर जनता ही टैक्स भी देगी, जनता ही वोट भी देगी और अपने पैसों तथा बाजुओं के दम पर खुद ही सड़कें भी खोदेगी, तो फिर वातानुकूलित कमरों में बैठे इन जनप्रतिधियों और अफसरों की फौज की जरूरत क्या है? सकंड गांव के लोगों ने रास्ता तो बना लिया, लेकिन उन्होंने इस लोकतांत्रिक व्यवस्था की नीयत पर एक ऐसा परमानेंट सवालिया निशान खड़ा कर दिया है, जिसका जवाब देते-देते हुक्मरानों के पसीने छूट रहे हैं।