दोस्तो क्या कागजों पर बने सख्त भू-कानून सिर्फ आम जनता को डराने के लिए हैं? क्या उत्तराखंड के संवेदनशील पहाड़ों और जंगलों को बचाने की कसमें सिर्फ चुनावी रैलियों तक सीमित हैं? जी हां, ‘पहाड़ों की रानी’ मसूरी से आई एक लाइव वीडियो रिपोर्ट ने सिस्टम के दावों की धज्जियां उड़ाकर रख दी हैं। गांधी चौक के ठीक पास, जहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता, वहां दिन-दहाड़े जेसीबी (JCB) गरज रही है, हरे-भरे जंगलों के बीच पहाड़ों को बेरहमी से काटा जा रहा है! स्थानीय लोग चीख-चीखकर अवैध निर्माण के आरोप लगा रहे हैं और प्रशासन अब जाकर जागा है। आखिर किसकी शह पर मसूरी को ‘कंक्रीट का जंगल’ बनाया जा रहा है? क्या पहले पहाड़ काटे जाएंगे, फिर कानून जागेगा? 7 बिघा जमान के दावे ने कैसे उड़ाई नींद, क्या बिक रहीं उत्तराखंड की संपत्तियां। दो ये दूर से दिखाई दे रही तस्वीर किसी विकास योजना के नहीं हैं, बल्कि यह सीधी चोट है उत्तराखंड की उस संवेदनशील पारिस्थितिकी (Ecology) पर, जिसे बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट से लेकर एनजीटी (NGT) तक लगातार चेतावनियां दे रहे हैं। मसूरी के गांधी चौक के पास धड़ल्ले से चल रहे इस खेल ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि भू-माफियाओं के हौसले कड़े नियमों से भी कहीं ज्यादा बुलंद हैं!
दोस्तो हैरानी की बात देखिए, एक तरफ प्रशासन नियम तोड़ने वालों पर ‘पीला पंजा’ चलाकर दुकानों को ध्वस्त कर रहा है, MDDA की टीमें अवैध निर्माण सील कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ नियमों को ठेंगा दिखाकर रातों-रात पहाड़ों को समतल किया जा रहा है। स्थानीय लोगों का सीधा आरोप है कि बिना किसी अनुमति और बिना स्वीकृत मानचित्र के, इस नाजुक जोन में अंधाधुंध निर्माण जारी है, क्या जिम्मेदार अधिकारियों को इस कटान की भनक तब तक नहीं लगती, जब तक जनता सड़कों पर नहीं आ जाती? दोस्तो नियमों के मुताबिक, मसूरी के संवेदनशील इलाकों और 30 डिग्री से अधिक के ढलानों पर भारी निर्माण पूरी तरह प्रतिबंधित है। लगातार हो रहे भूस्खलन और धंसते पहाड़ों के बीच इस तरह की लापरवाही विनाश को सीधा न्योता है। दोस्तो अगर पहले बिना रोक-टोक पहाड़ काटे जाएंगे और बाद में सिर्फ नोटिस थमाकर खानापूर्ति की जाएगी, तो सवाल उठना लाजिमी है कि ये कड़े कानून आखिर किसकी रक्षा के लिए बनाए गए हैं—पर्यावरण की या रसूखदारों की? इधर दोस्तो एक और मामला है जिसमें शासन प्रशान में खलबली मची है।
दोस्तो 7000 बीघा जमीन का गंभीर आरोप लग रहा है। मीडिया से बात करते हुए महिला मंच आरोप लगाया कि प्रदेश की करीब 7,000 बीघा बेशकीमती सरकारी जमीन को औने-पौने दामों या निवेश नीतियों के आड़ में बाहरी पूंजीपतियों को बेचने (या सौंपने) की तैयारी चल रही है। दोस्तो मंच ने इस बात को पुरजोर तरीके से उठाया कि सरकार निवेश और विकास के नाम पर जमीनों को 90-90 साल की लंबी लीज़ पर देने का जो खेल कर रही है, वह व्यावहारिक रूप से जमीन को पूरी तरह बेच देने के ही समान है। उत्तराखंड महिला मंच और राज्य के अन्य आंदोलनकारी संगठनों (जैसे उत्तराखंड क्रांति दल) का कहना है कि उत्तराखंड की जमीन, पर्यावरण और मूल निवासियों के अधिकारों की रक्षा राज्य की मूल भावना है। इसलिए इस कथित 7000 बीघा जमीन के आवंटन या टेंडर की प्रक्रिया की तुरंत एक निष्पक्ष उच्च-स्तरीय जांच होनी चाहिए। वहीं मसूरी के इस मामले में अब एक निष्पक्ष और उच्च स्तरीय जांच की जरूरत है। जमीन का मालिकाना हक किसके पास है, इस खुदाई की अनुमति किसने दी और पर्यावरण नियमों की अनदेखी करने वाले अधिकारियों पर क्या कार्रवाई होगी, इन सब पर से पर्दा उठना बाकी है। अगर अब भी ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो पहाड़ों की रानी को कंक्रीट का ढेर बनने से कोई नहीं रोक पाएगा।