Youth Voters के नतीजों से 2027 का संकेत? | BJP Congerss | ABVP | NSUI | Gen Z | Uttarakhand News

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दोस्तो, उत्तराखंड के छात्रसंघ चुनावों के नतीजों ने 2027 की सियासत में नई हलचल जरूर पैदा कर दी है!कहीं ABVP, कहीं NSUI और कई जगह निर्दलीयों ने बाजी मारी—तो क्या कैंपस का ये जनादेश आने वाले चुनाव की सियासी तस्वीर पर भी असर डालेगा?17 लाख से ज्यादा युवा वोटरों वाले राज्य में आखिर युवाओं के मुद्दे और पसंद किस दिशा में हैं? दोस्तो क्या इस बार उत्तराखंड की चाबी युवाओँ के हाथ में है, जो अभी कॉलेज चुनाव में वोट कर आगामी विधायनसभा चुनाव में वोट करने के लिए उतावले हैं। दोस्तो इन उतवले युवानों बीजेपी और कांग्रेस दोनों के दिग्गजों की परेशानी बढाने का काम किया है और उत्तराखंड के ‘जेन-ज़ी’ (Gen-Z) यानी युवा वोटरों का वो जनादेश है, जिसने देहरादून से लेकर दिल्ली दरबार तक बैठे बड़े-बड़े सियासी धुरंधरों के माथे पर पसीना ला दिया है! 29 सितंबर को आए उत्तराखंड छात्रसंघ चुनावों के नतीजों ने सत्ताधारी दल के ‘ऑल इज़ वेल’ और विपक्ष के ‘वन-वे नैरेटिव’ दोनों की धज्जियां उड़ा दी हैं हालांकि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी एबीवीपी की जीत पर बधाई दे रहे हैं, लेकिन अंदर की हकीकत यह है कि कुमाऊं के सबसे बड़े कॉलेज अखाड़ों में युवाओं ने स्थापित राजनीतिक दलों को सिरे से नकार कर निर्दलीयों के सिर पर ताज सजा दिया है। आखिर क्यों यह परिणाम आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले दोनों ही बड़ी पार्टियों के लिए गंभीर आत्ममंथन और चिंता की बात है? इसको कुछ ऐसा समझा जा सकता है।

दोस्तो ढोल-नगाड़ों की यह थाप और हवा में उड़ता गुलाल उत्तराखंड की छात्र राजनीति में हुए एक बहुत बड़े भूचाल की गवाही दे रहा है। कुमाऊं मंडल के सबसे बड़े और वीआईपी परिसरों—MBPG हल्द्वानी और DSB कॉलेज नैनीताल में जो हुआ, उसने सबको चौंका दिया। DSB में निर्दलीय भानु प्रताप सिंह चौहान ने ABVP को 482 वोटों के भारी अंतर से धूल चटा दी। वहीं, MBPG हल्द्वानी में टिकट न मिलने से नाराज बागी प्रत्याशी आर्यन बेलवाल ने निर्दलीय लड़कर इतिहास रच दिया और मुख्यधारा की दोनों बड़ी पार्टियों को तीसरे नंबर पर धकेल दिया। इधर दोस्तो वरिष्ठ पत्रकारों का साफ कहना है कि छात्रसंघ चुनाव ऐसे समय में हुए हैं, जब युवाओं की प्राथमिकताएं तेजी से बदल रही हैं। अब ज़रा उस जमीनी गणित को समझिए जिससे उत्तराखंड के बड़े-बड़े रणनीतिकारों की रात की नींद गायब हो गई है।

आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव में उत्तराखंड के कुल 85 लाख मतदाताओं में से लगभग 17 से 22 लाख मतदाता शुद्ध रूप से युवा (18 से 29 साल) होने वाले हैं, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार युवा मतदाताओं का झुकाव किसी भी पार्टी की सरकार बनाने या गिराने के लिए सबसे निर्णायक साबित होगा। छात्रसंघ के चुनाव में इसी ‘जेन-ज़ी’ ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है और इनका मूड यह साफ बता रहा है कि वे पार्टियों के बड़े-बड़े वादों और हाई-कमांड संस्कृति के बंधुआ मजदूर नहीं हैं। दोस्तो यह चुनाव परिणाम बीजेपी (BJP) के लिए सबसे बड़ी चिंता और आत्ममंथन की बात क्यों है? क्योंकि यह साफ इशारा है कि सिर्फ राष्ट्रवाद और हिंदुत्व का नैरेटिव हर जगह युवाओं को आकर्षित नहीं कर पा रहा है। बेरोजगारी, पेपर लीक, और नौकरियों में पारदर्शिता जैसे बुनियादी मुद्दों पर आज का जेन-ज़ी वोटर जवाबदेही मांग रहा है। मंत्रियों और विधायकों के गृह जनपदों में एबीवीपी की हार यह बताती है कि स्थानीय नेता युवाओं के साथ सीधा कनेक्ट बनाने में फेल हो रहे हैं। अगर सरकार ने समय रहते नौकरियों और युवाओं के मुद्दों पर ठोस कदम नहीं उठाए, तो 2027 में यह लावा सीधे विधानसभा सीटों पर फूट सकता है। वहीं दोस्तो बीजेपी ही नहीं, ये परिणाम कांग्रेस (Congress) के लिए भी उतना ही बड़ा तमाचा और आत्ममंथन की चेतावनी है। राहुल गांधी देश भर में ‘युवाओं की गूँज’ जैसे कार्यक्रमों से युवाओं को साधने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन उत्तराखंड में कांग्रेस का छात्र संगठन एनएसयूआई (NSUI) इस बड़े एंटी-इंकंबेंसी करंट को भुनाने में पूरी तरह नाकाम रहा। युवाओं ने बीजेपी से नाराजगी के बावजूद कांग्रेस के हाथ को नहीं थामा, बल्कि निर्दलीयों पर भरोसा जताया। कांग्रेस के लिए चिंता की बात यह है कि युवाओं के मन में उनके प्रति भी कोई खास लहर नहीं है और उनका सांगठनिक ढांचा पूरी तरह खोखला साबित हो रहा है। तो दोस्तो साफ बात यह है कि उत्तराखंड के इन छात्रसंघ चुनाव परिणामों ने 2027 से ठीक पहले एक बहुत बड़ा ‘रेड अलर्ट’ जारी कर दिया है। युवाओं का रुझान किसी पार्टी विशेष की तरफ नहीं, बल्कि काम, जवाबदेही और मजबूत स्थानीय चेहरों की तरफ है। जो दल यह सोचकर बैठा है कि वह केवल बड़े चेहरों और रैलियों के दम पर 2027 का किला फतह कर लेगा, उसे इन ‘जेन-ज़ी’ वोटरों ने खुली चुनौती दे दी है। अब देखना यह होगा कि इस कड़े सबक के बाद बीजेपी और कांग्रेस अपनी रणनीतियों में क्या बदलाव लाते हैं। युवाओं के इस आक्रामक और बेबाक मूड पर आपकी क्या राय है? कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं।