Masoom Sharma पर क्यों मेहरबान है सिस्टम?| Pandavaas | Local Artists | CM Dhami | Uttarakhand News

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उत्तराखंड में आखिर मासूम शर्मा पर सिस्टम इतना मेहरबान क्यों है?जिस कलाकार के पिछले कार्यक्रम को लेकर विवाद और छात्र के घायल होने के सवाल उठे, उसे फिर बड़े मंच पर मौका क्यों? पहाड़ के कलाकारों को दरकिनार और बाहर के कलाकार पर मेहरबानी—क्या है पूरा कनेक्शन? मासूम शर्मा ने देवभूमि से माफी भी मांगी, फिर बार-बार बुलाए जाने की वजह क्या है? सिस्टम की इस मेहरबानी पर क्यों उठ रहे सवालों। दोस्तो इसे देवभूमि उत्तराखंड की विडंबना कहें या हमारे सिस्टम का खोखलापन? जो कलाकार पहाड़ के लोकसंगीत, यहाँ की वेदना और संस्कृति को समेटकर पूरी दुनिया में उत्तराखंड का नाम रोशन करते हैं, आज वो 21 महीनों से अपने हक़ के पैसों के लिए मुख्यमंत्री से सार्वजनिक अपील कर रहे हैं। हम बात कर रहे हैं ‘पांडवाज़’ बैंड की। लेकिन गज़ब की बात देखिए! जहाँ पहाड़ के बेटों का पैसा अटका है, वहीं बाहरी राज्यों के सिंगर्स, विशेषकर हरियाणवी कलाकार मासूम शर्मा पर हमारा सिस्टम इस कदर मेहरबान है कि उन्हें एडवांस पैसे देकर बड़े-बड़े कार्यक्रमों में बुलाया जा रहा है। आखिर कौन सा ऐसा जादुई सामाजिक और राजनीतिक कनेक्शन है कि मासूम शर्मा बार-बार उत्तराखंड के मंचों पर नजर आते हैं? और क्यों पहाड़ के युवाओं के गुस्से के बाद मासूम को कैमरे पर आकर माफ़ी मांगनी पड़ी? जी हां दोस्तो हरियाणवी म्यूजिक इंडस्ट्री का एक चर्चित नाम—मासूम शर्मा। आजकल उत्तराखंड के विभिन्न सरकारी महोत्सवों, छात्रसंघ चुनाव के जश्न और निजी इवेंट्स में इस चेहरे की मौजूदगी आम बात हो चुकी है। लेकिन सवाल यह है कि जब उत्तराखंड का अपना लोकसंगीत इतना समृद्ध है, तो फिर मासूम शर्मा को बार-बार देवभूमि बुलाने के पीछे की असली वजह क्या है? क्या यह सिर्फ उत्तराखंड के युवाओं के बीच उनकी सोशल मीडिया रील्स का क्रेज़ है, या फिर इसके पीछे कोई गहरा सामाजिक और राजनीतिक दबाव काम कर रहा है?

दोस्तो राजनीतिक और सामाजिक गलियारों में तैरती खबरों की मानें तो मासूम शर्मा को बार-बार उत्तराखंड के मंचों पर उतारने के पीछे एक मजबूत समाजिक-राजनीतिक लॉबी और इवेंट मैनेजर्स का सिंडिकेट काम कर रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा बेल्ट से जुड़े कुछ रसूखदार नेताओं का दबाव और राज्य के मैदानी व पहाड़ी युवाओं में हरियाणवी गानों के बढ़ते चलन को भुनाने के लिए अधिकारी और इवेंट कंपनियां मासूम शर्मा को प्राथमिकता देती हैं। हद तो तब हो जाती है जब इन बाहरी कलाकारों को बुलाने के लिए ‘एडवांस पेमेंट’ का रेड कार्पेट बिछाया जाता है, लेकिन दिसंबर 2024 और जनवरी 2025 में राष्ट्रीय खेलों के लिए दिन-रात एक करने वाले उत्तराखंड के अपने ब्रांड ‘पांडवाज़’ को 21 महीने बीत जाने के बाद भी भुगतान नहीं किया जाता! लेकिन देवभूमि में बिना मर्यादा के पैर जमाना आसान नहीं है, और यह बात मासूम शर्मा को भी अच्छी तरह समझ आ गई है। दरअसल, पिछले कुछ कार्यक्रमों में मासूम शर्मा के गानों के बोल्ड कंटेंट और उनके मंचों से दिए गए कुछ बयानों को लेकर उत्तराखंड की पारंपरिक और शांत लोक मर्यादाओं को ठेस पहुँचाने के गंभीर आरोप लगे थे। पहाड़ के जागरूक युवाओं और स्थानीय कलाकारों ने इसे अपनी संस्कृति का अपमान माना और सोशल मीडिया पर मासूम शर्मा के खिलाफ एक बड़ा बायकॉट अभियान छेड़ दिया। जब विरोध की आग तेज हुई और उत्तराखंड में अपनी मोटी कमाई का बाजार बंद होने का डर सताया, तो मासूम शर्मा को कैमरे के सामने आकर हाथ जोड़कर देवभूमि की जनता और यहाँ की पावन संस्कृति से सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांगनी पड़ी।

दोस्तो मासूम शर्मा ने माफ़ी मांगकर अपनी गलती तो सुधार ली, लेकिन हमारा सिस्टम अपनी गलती कब सुधारेगा? पांडवाज़ बैंड ने साफ कहा है कि उन्होंने भुगतान के लिए हर आधिकारिक दरवाजा खटखटाया, लेकिन नतीजा सिफ़र रहा। अब जनता सोशल मीडिया पर पूछ रही है कि क्या उत्तराखंड के संस्कृति और खेल विभाग का बजट सिर्फ बाहरी राज्यों के सिंगर्स को खुश करने के लिए सुरक्षित रखा गया है? जब राज्य के सबसे प्रतिष्ठित लोक कलाकारों को अपने हक़ के लिए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से सार्वजनिक गुहार लगानी पड़े, तो यह समझ लेना चाहिए कि व्यवस्था के भीतर बैठे अधिकारी अपनी माटी के प्रति कितने लापरवाह हो चुके हैं। तो साफ बात यह है कि बाहरी कलाकारों का स्वागत है, लेकिन अपनी माटी के फनकारों की लाश पर बाहरी संस्कृति का जश्न मनाना देवभूमि के युवाओं को कतई बर्दाश्त नहीं है। मासूम शर्मा का बार-बार आना और उन्हें एडवांस मिलना यह साबित करता है कि सिस्टम में बैठे आकाओं की प्राथमिकताएं क्या हैं। उम्मीद है कि पांडवाज़ बैंड की इस दहाड़ के बाद मुख्यमंत्री कार्यालय तुरंत संज्ञान लेगा और इन लापरवाह अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी। बाहरी कलाकारों को एडवांस और अपनों को 2 साल का बनवास—इस सौतेले रवैये पर आपकी क्या राय है? कमेंट बॉक्स में अपनी बात बेबाकी से लिखें।