115 दिन से बबीता पांडे लापता! |Uttarkashi Dayara Bugyal | Babita Pandey | Uttarakhand News

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दोस्तो, 115 दिन और बबीता पांडे का अब तक कोई सुराग नहीं!दयारा बुग्याल के दुर्गम पहाड़ों में आखिर उस रात हुआ क्या था, जब बबीता अचानक लापता हो गईं? सैकड़ों जवानों ने चप्पा-चप्पा खंगाला, रेस्क्यू अभियान चला लेकिन सवाल आज भी वहीं खड़ा है—आखिर बबीता गईं तो गईं कहां? क्या पहाड़ के इन रास्तों में कोई ऐसा राज छिपा है, जिसकी कड़ियां अभी तक नहीं जुड़ पाई हैं? और अब सौ दिन से ज्यादा बीत जाने के बाद पुलिस क्या कह रही है। दोस्तो क्या हुआ बबीता पांडे के साथ क्या उत्तराखंड के ऊंचे और दुर्गम पहाड़ इंसानों को जिंदा निगल रहे हैं? या फिर ट्रेकिंग के नाम पर पहाड़ों की खामोशी के पीछे कोई बहुत बड़ा और घिनौना गुनाह छिपाया जा रहा है? रामनगर की रहने वाली होनहार एमबीए छात्रा बबीता पांडे को लापता हुए आज पूरे 115 दिन बीत चुके हैं। हर बीतता दिन एक नया और खौफनाक सवाल छोड़ रहा है। तीन महीनों तक सेना, आईटीबीपी, एनडीआरएफ और हेलीकॉप्टर्स ने आसमान से लेकर पाताल तक छान मारा, लेकिन बबीता का एक तिनका तक हाथ नहीं लगा! आखिर 29 मई की उस काली रात को 12,000 फीट की ऊंचाई पर क्या हुआ था? क्या यह सिर्फ एक हादसा है या कोई गहरी साजिश? इसका जवाब किसी के पास आज सौ से ज्यादा दिन बीत जाने के बाद भी क्यों नहीं है। दोस्तो नैनीताल के रामनगर की रहने वाली 24 साल की बबीता पांडे, जो आंखों में बड़े-बड़े सपने लेकर पहाड़ों की वादियों को नापने निकली थी। लेकिन किसे पता था कि दयारा बुग्याल ट्रेक उसका आखिरी सफर बन जाएगा। 29 मई की रात से बबीता रहस्यमयी ढंग से गायब है। 115 दिन बीत जाने के बाद भी सबसे बड़ा और यक्ष प्रश्न यही खड़ा है कि बबीता आखिर गई कहाँ? क्या वह जमीन निगल गई या आसमान खा गया? आखिर आधुनिक तकनीक, ड्रोन और खोजी कुत्ते भी उस रात का सच क्यों नहीं ढूंढ पाए? क्यों, दोस्तो इस पूरी मिस्ट्री की क्रोनोलॉजी को समझिए और उन कड़ियों को जोड़िए जो सीधे तौर पर शक के घेरे में हैं। बबीता अपने दो दोस्तों के साथ उत्तरकाशी के गोई बेस कैंप में रुकी हुई थी।

दोस्तों के मुताबिक, रात के करीब 11:30 बजे टेंट के अंदर गाने सुनने को लेकर बबीता से उनका विवाद हुआ था। इसके बाद बबीता गुस्से में टेंट से बाहर निकली और फिर कभी वापस नहीं लौटी। दोस्तो सवाल यह उठता है कि आधी रात को, घने जंगलों के बीच, जहां हिंसक भालू और तेंदुए घूमते हैं, कोई लड़की अकेले बाहर कैसे जा सकती है? दोस्तो बबीता को खोजने के लिए उत्तराखंड सरकार और प्रशासन ने अपना पूरा दम-खम लगा दिया। इतिहास का सबसे बड़ा रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया गया। पुलिस, एसडीआरएफ, एनडीआरएफ, आईटीबीपी, सेना और नेहरू पर्वतारोहण संस्थान के 100 से ज्यादा जवानों ने दिन-रात एक कर दिया। भालू वाले इलाकों से लेकर डोडीताल की गहरी खाइयों तक को छान मारा गया, लेकिन ताज्जुब की बात देखिए, 3 महीने की इस महा-खोज में न तो बबीता का कोई कपड़ा मिला, न जूते और न ही किसी जंगली जानवर के हमले के निशान! अब दोस्तो ताजा अपडेट यह है कि पूरे तीन महीने से अधिक समय तक चले इस बेनतीजा रेस्क्यू ऑपरेशन को अब आधिकारिक तौर पर बंद कर दिया गया है, पहाड़ों पर अब कोई खोजबीन नहीं हो रही है। उत्तरकाशी की एसपी कमलेश उपाध्याय के मुताबिक, अब पुलिस की विवेचना और वैज्ञानिक जांच जारी है। मोबाइल सर्विलांस, कॉल डिटेल रिकॉर्ड्स (CDR) और रायथल से लेकर उत्तरकाशी तक के सीसीटीवी कैमरों को खंगाला जा रहा है। इधर रामनगर में बबीता के परिवार का आज भी बुरा हाल है, जिनकी उम्मीदें अब टूट चुकी हैं और उन्होंने सरकार से इस पूरे मामले की CBI जांच कराने की गुहार लगाई थी उसका क्या हुआ कोई नहीं जानता। दोस्तो दयारा बुग्याल के इतिहास में साल 2002 से लेकर आज तक कभी कोई ट्रेकर इस तरह गायब नहीं हुआ। स्थानीय लोग इसे दैवीय प्रकोप और परियों की लोककथाओं से जोड़ रहे हैं। लेकिन कानून अंधविश्वास पर नहीं, सबूतों पर चलता है! क्या पुलिस उन दो दोस्तों से सच उगलवा पाई? क्या बबीता के प्राइवेट सोशल मीडिया अकाउंट्स में छिपा कोई राज इस पहेली को सुलझाएगा? इस खामोशी को तोड़ना ही होगा, क्योंकि देवभूमि की सुरक्षा व्यवस्था और एक बेटी की जिंदगी का सवाल है! दोस्तो 115 दिन का लंबा वक्त बीत जाना और एक इंसान का इस तरह गायब हो जाना हमारी पूरी सुरक्षा व्यवस्था और आधुनिक विज्ञान के मुंह पर एक करारा तमाचा है। बबीता पांडे का परिवार आज भी इंसाफ और जवाब का इंतजार कर रहा है। क्या हमारी पुलिस इस रहस्य से पर्दा उठा पाएगी या यह फाइल भी हमेशा के लिए बंद हो जाएगी?