मां Nanda की अंतिम विदाई! होमकुंड के लिए महाप्रस्थान! | Nanda Rajjat | Homkund | Uttarakhand News

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दोस्तो, आज हिमालय की वादियों में आस्था का सबसे भावुक पल है। मां नंदा की अंतिम विदाई का समय आ गया है। चौसिंग्या खाडू के साथ मां नंदा ने होमकुंड के लिए महाप्रस्थान किया है। भक्तों की आंखें नम हैं, जयकारों से पूरा माहौल गूंज रहा है और हर कदम मां नंदा को कैलाश की ओर ले जा रहा है। आखिर इस विदाई के पीछे क्या है सदियों पुरानी आस्था और परंपरा?देखिए, हिमालय महाकुंभ के इस भावुक और अद्भुत क्षण की पूरी तस्वीर, कितनी मुश्किल डगर है ये आस्था ही तो है वरना कौन कर पाता ये सब। दोस्तो उत्तराखंड की ऊंची बर्फीली चोटियों से इस वक्त आस्था की एक ऐसी तस्वीर सामने आ रही है, जिसे देखकर आपकी आंखें नम हो जाएंगी। एक बेटी जब अपने मायके से ससुराल विदा होती है, तो पूरा परिवार रो पड़ता है, लेकिन देवभूमि उत्तराखंड में जब मां नंदा अपने ससुराल कैलाश पर्वत के लिए प्रस्थान करती हैं, तो पूरा हिमालय रो पड़ता है! 5 सितंबर से शुरू हुई नंदा देवी की यह ऐतिहासिक बड़ी जात यात्रा अपने अंतिम पड़ाव होमकुंड पहुंच चुकी है। जहां हजारों नंदा भक्तों की मौजूदगी में मां को विदा किया जा रहा है। क्या है इस विदाई का महा-रहस्य और क्यों इस यात्रा के आगे इंसानों के कदम रुक जाते हैं, दोस्तो समुद्रतल से करीब 17 हजार फीट की ऊंचाई पर बसा यह है ‘होमकुंड’। आस्था का वो सर्वोच्च शिखर, जहां पहुंचकर इंसानों की सीमाएं समाप्त हो जाती हैं और शुरू होता है देवत्व का अलौकिक साम्राज्य। चमोली से शुरू हुई ‘नंदा देवी बड़ी जात यात्रा 2026’ अपने अंतिम और सबसे दिव्य पड़ाव पर पहुंच चुकी है। चारों तरफ बर्फ की सफेद चादर, हाथों में मां नंदा के पवित्र छत्र और जुबां पर मां का नाम, हजारों नंदा भक्त इस कड़कड़ाती ठंड में मां की एक झलक पाने और उन्हें विदा करने के लिए उमड़ पड़े हैं।

दोस्तो इस महायात्रा के सबसे बड़े आकर्षण और मां नंदा के शुभदूत, इस ‘चौसिंग्या खाडू’ को गौर से देखिए। चार सींगों वाला यह दुर्लभ नर मेढ़ा, कुरुड़ और नौटी से लगातार सैकड़ों किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई चढ़कर मां नंदा की डोली के आगे-आगे चलता हुआ यहाँ पहुंचा है। लोक मान्यताओं के अनुसार, पहाड़ के लोग मां नंदा को अपनी बेटी मानते हैं। और जब बेटी ससुराल जाती है, तो मायके वाले उसे खाली हाथ नहीं भेजते। इस खाडू की पीठ पर भक्तों ने मां के लिए नए वस्त्र, गहने, सुहाग की सामग्री और पहाड़ी पकवान बांधे हैं। दोस्तो वांण, बेदनी बुग्याल और रहस्यमयी रूपकुंड के दुर्गम रास्तों को पार करते हुए नंदा भक्त जब होमकुंड पहुंचते हैं, तो फिजाओं में एक अजीब सी भावुकता घुल जाती है। यहाँ आकर पुरोहित विशेष पूजा और महायज्ञ का संपादन करते हैं। माँ की छतरियों और डोलियों की अंतिम पूजा की जाती है। यह वो पल होता है जब हर आंख नम हो जाती है। हर भक्त के दिल में वही दर्द होता है, जो एक सगे पिता या भाई को अपनी लाडली बेटी या बहन को विदा करते समय होता है। दोस्तो होमकुंड में विदाई की मुख्य रस्म पूरी कर ली गई है। अब इंसानों का सफर यहीं थम जाएगा, क्योंकि इसके आगे सिर्फ देवताओं का मार्ग है। अपनी पीठ पर मां नंदा की विदाई की भेंट लादे यह चौसिंग्या खाडू अब इंसानी आबादी को पीछे छोड़कर, अकेले ही कैलाश पर्वत की ओर बढ़ चला है। आश्चर्य की बात यह है कि यह मूक पशु बिना किसी के हाके, अपने आप पहाड़ों की दुर्गम चोटियों पर सीधा चढ़ता चला जाता है और इसके बाद यह कभी किसी को दोबारा दिखाई नहीं देता. दोस्तो नंदा देवी की यह बड़ी जात यात्रा सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि देवभूमि की समृद्ध लोक संस्कृति और भावनाओं का जीवंत दस्तावेज है। बेटी और मायके के इस अनूठे रिश्ते को शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता। होमकुंड से मां नंदा तो कैलाश चली गईं, लेकिन नंदा भक्तों के दिलों में अब अगले 12 वर्षों का एक लंबा और लंबा इंतजार छोड़ गई हैं! दोस्तो मां नंदा की यह विदाई हमें सिखाती है कि प्रकृति और ईश्वर के प्रति पहाड़ के लोगों की आस्था कितनी निश्छल और अटूट है। चौसिंग्या खाडू मां का संदेश लेकर कैलाश की ओर बढ़ चुका है और भक्त भारी मन से वापस अपनी घाटियों की ओर लौट रहे हैं।