दोस्तो एक बड़ी और अहम खबर हिमालय और गंगा से जुड़ी है। केंद्र सरकार ने गंगा के ऊपरी इलाकों और हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। अब अलकनंदा और भागीरथी बेसिन में नए जलविद्युत प्रोजेक्ट्स को मंजूरी नहीं दी जाएगी। सरकार का मानना है कि पर्यावरणीय जोखिम, आर्थिक लाभ से कहीं ज्यादा है। सुप्रीम कोर्ट में दिए हलफनामे के बाद यह रुख सामने आया है।इस फैसले को पर्यावरण संरक्षण की दिशा में अहम माना जा रहा है। पूरी खबर बताउंगा आपको कैसे उत्तराखंड में 2013 की त्रासदी का भी किया गया जिक्र। दोस्तो खबर कुछ ऐसी है कि हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र और उत्तराखंड में गंगा नदी के ऊपरी इलाकों पर और अधिक दबाव पड़ने से रोकने के उद्देश्य से, केंद्र ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया कि वह अलकनंदा और भागीरथी नदी बेसिन में उन सात परियोजनाओं के अलावा किसी भी नई जलविद्युत परियोजना की अनुमति देने के पक्ष में नहीं है, जो या तो चालू हो चुकी हैं या जिनके निर्माण में पर्याप्त प्रगति हुई है। दोस्तो केंद्र सरकार का ये दृष्टिकोण पर्यावरण मंत्रालय द्वारा सर्वोच्च न्यायालय में एक हलफनामे के माध्यम से व्यक्त किया गया था, जो 2013 की केदारनाथ आपदा के बाद से गंगा नदी बेसिन के ऊपरी क्षेत्रों में नई जलविद्युत परियोजनाओं की अनुमति देने के मुद्दे की जांच कर रहा है…दोस्तो इस फैसले का मतलब है कि केंद्र अब पहले से तय की गई और विभिन्न समितियों द्वारा जांच की गई 28 परियोजनाओं में से केवल सात पर ही आगे बढ़ेगा। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि शेष 21 जलविद्युत परियोजनाओं (जिनकी कुल क्षमता लगभग 2,100 मेगावाट है) से होने वाले वित्तीय/आर्थिक लाभ की तुलना में नदी के स्वास्थ्य सहित पर्यावरण को होने वाला जोखिम/नुकसान कहीं अधिक है। दोस्तो सुप्रीम कोर्ट से उम्मीद है कि वह 20 अगस्त को होने वाली अगली सुनवाई में इस मुद्दे पर अपना फैसला सुनाएगा। जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र को अंतिम निर्णय लेने के लिए तीन महीने का समय दिया था। अब बात उन परियोजनाओं की जिनको सरकार जारी रखना चाहती है। दोस्तो सरकार जिन सात परियोजनाओं को जारी रखना चाहती है, उनमें से चार पहले ही चालू हो चुकी हैं –
- टिहरी स्टेज-II (1000 मेगावाट)
- सिंगोली भटवारी (99 मेगावाट)
- मदमहेश्वर (15 मेगावाट)
- कालीगंगा-II (4.5 मेगावाट)
- तपोवन विष्णुगढ़ (520 मेगावाट
- विष्णुगढ़ पिपलकोटी (444 मेगावाट)
- फाटा ब्यंग (76 मेगावाट)
दोस्तो ये वो सात परियोजनाएं हैं जिनका निर्माण कार्य चल रहा है, इनमें से चार परियोजनाएं पहले ही चालू हो चुकी हैं, जबकि शेष तीन 74% से 80% तक पूरी हो चुकी हैं। सरकार का इन परियोजनाओं को जारी रखने का तर्क यह है कि इनमें पर्याप्त सार्वजनिक और निजी निवेश हुआ है, इनमें से कोई भी भागीरथी पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र में नहीं आती है, और किसी भी परियोजना को विशेषज्ञ निकायों द्वारा संदिग्ध नहीं बताया गया है। सरकार का कहना है कि इन्हें अभी रोकना बिना किसी उचित पर्यावरणीय लाभ के निवेशित निवेश को बेकार कर देगा। इसके अलावा दोस्तो जल शक्ति, विद्युत और पर्यावरण – इन तीन मंत्रालयों के “सामूहिक और सर्वसम्मति से लिए गए निर्णय” का प्रतिनिधित्व करने वाले हलफनामे में तर्क दिया गया है कि इन सात परियोजनाओं को “लागू वैधानिक प्रावधानों और पर्यावरण सुरक्षा उपायों के सख्त अनुपालन के अधीन आगे बढ़ने की अनुमति दी जा सकती है। इस पर कई तरह की प्रतिक्रियाएं भी देखने को मिल रही हैं जहां पर्यावरण कार्यकर्ता। पर्यावरण प्रेमी इसको समझदारी की जीत बता रहे हैं। वहीं एक बड़ी चिंता उत्तराखंड के लिए ये बड़ी परियोजनाएं मानी जाती रही हैं। दोस्तो गंगा और हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के लिए काम करने वाले नागरिक कहते हैं कि यह देखकर खुशी हो रही है कि सरकार ने समझदारी दिखाते हुए 2013 जैसी भविष्य की त्रासदियों को रोकने और गंगा-हिमालय बेसिन की नाजुक और आपदा-प्रवण पारिस्थितिकी की रक्षा के लिए यह बुद्धिमानी भरा और स्वागत योग्य कदम उठाया है। यहां दोस्तो मै आपको ये भी बता दूं कि अलकनंदा और भागीरथी नदी बेसिन में कोई भी नई जलविद्युत परियोजना न शुरू करने का निर्णय विभिन्न विशेषज्ञ समितियों की सिफारिशों पर अंतर-मंत्रालयी परामर्श के बाद लिया गया।
दोस्तो एक समिति अलकनंदा और भागीरथी बेसिन में 28 परियोजनाओं को अनुमति देना चाहती थी, जबकि दूसरी समिति, जिसमें जल शक्ति और पर्यावरण मंत्रालयों के अधिकारी शामिल थे, ने केवल पांच परियोजनाओं की सिफारिश की। वहीं दोस्तो आपको ये भीबता दूं कि केंद्र सरकार ने अब उन पांचों आपत्तियों को भी मानने से इनकार कर दिया है, क्योंकि बांधों की अत्यधिक संख्या, भूकंपीय संवेदनशीलता और 2013 के बादल फटने और अगस्त 2025 की धारली बाढ़ जैसी कई आपदाओं के संचयी प्रभाव के कारण 2013 के फैसले की मूलभूत चिंताएं अभी भी बरकरार हैं। इस मामले की सुनवाई 20 मई को होनी है। यह मामला जून 2013 में केदारनाथ में आई बाढ़ से जुड़ा है, जिसमें कम से कम 5,000 लोगों की जान चली गई थी। राज्य में जलविद्युत परियोजनाओं पर रोक लगाते हुए, सर्वोच्च न्यायालय ने पर्यावरण मंत्रालय को निर्देश दिया कि वह इस बात की जांच करे कि ऐसी परियोजनाओं ने आपदा को और भी गंभीर बनाने में क्या भूमिका निभाई। पर्यावरणविद् रवि चोपड़ा के नेतृत्व में गठित 17 सदस्यीय समिति (विशेषज्ञ निकाय-I) ने 2014 में निष्कर्ष निकाला कि जांच की गई 24 परियोजनाओं में से 23 का अलकनंदा और भागीरथी बेसिन की पारिस्थितिकी पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा। आईआईटी-कानपुर के विनोद तारे के नेतृत्व में गठित दूसरे पैनल ने छह विकासकर्ताओं की परियोजनाओं की जांच की और पाया कि समीक्षा लंबित रहने तक उन्हें उनके वर्तमान स्वरूप में “शुरू नहीं किया जा सकता, तो दोस्तो ये था पूरा अपडेट उत्तराखंड और गंगा-हिमालय से जुड़ी इस बड़ी खबर पर जहां केंद्र सरकार का रुख अब साफ नजर आ रहा है कि विकास के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण भी उतना ही जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर आगे क्या फैसला आता है, उस पर सबकी नजर बनी
हुई है।