दोस्तो, क्या उत्तराखंड की जमीनों पर अवैध कब्जे हो रहे हैं? क्या सरकारी और वन विभाग की जमीनों पर बाहरी लोगों ने बसावट कर ली है? और सबसे बड़ा सवाल आखिर उत्तराखंड में जमीन खरीदने के लिए नियम क्या हैं? दोस्तो सामने आए एक नए मामले ने अब पूरे प्रदेश की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। उत्तराखंड हाई कोर्ट ने कथित तौर पर नेपाली मूल के लोगों द्वारा सरकारी और वन विभाग की जमीनों पर कब्जे के मामले में सख्त रुख अपनाया है और सरकार से सीधे जवाब मांग लिया है, क्या पूछा है कोर्ट ने क्या है ये मामला कैसे उत्तराखंड की जमीनों पर पड़ रहा है डांका। दोस्तो मामला बेहद संवेदनशील है, इस बेहद ही नाजुस मामले पर आखिर कोर्ट ने क्यों पूछा कि आखिर ये लोग किस नीति के तहत भारत में रह रहे है? और किस प्रक्रिया के जरिए जमीन खरीद रहे हैं ?दोस्तो मामला सिर्फ जमीन का नहीं है, सवाल सरकारी भूमि, वन क्षेत्र और उत्तराखंड की संवेदनशील भौगोलिक स्थिति का भी है।अगर आरोप सही हैं तो आखिर इतने बड़े स्तर पर दस्तावेज कैसे बने? आधार कार्ड, राशन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस और दूसरे सरकारी कागजात कैसे जारी हुए? वहीं दूसरी तरफ सरकार का कहना है कि 1950 की भारत-नेपाल संधि के तहत दोनों देशों के नागरिक एक-दूसरे के यहां रह और काम कर सकते हैं, लेकिन दोस्तो सवाल ये है कि क्या जमीन खरीदने के लिए भी वही नियम लागू होते हैं? और अगर नहीं तो फिर वास्तविक प्रक्रिया क्या है? फिलहाल हाई कोर्ट ने पूरे मामले में तीन हफ्ते के भीतर सरकार से विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि सरकार कोर्ट में क्या जवाब देती है और क्या कथित अवैध कब्जों पर कोई बड़ी कार्रवाई होती है?
दरसल दोस्तो उत्तराखंड हाई कोर्ट ने नैनीताल के आसपास सरकारी और वन विभाग की भूमि पर नेपाली मूल के लोगों द्वारा कथित अवैध कब्जों के मामले में सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा है कि आखिर ये लोग किस नीति के तहत भारत में रह रहे हैं और किस प्रक्रिया के जरिए जमीन खरीद रहे हैं। दोस्तो इस मामले की सुनवाई मुख्य न्यायाधीश Manoj Kumar Gupta और न्यायमूर्ति Subhash Upadhyay की खंडपीठ में हुई। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने सरकार से स्पष्ट जवाब मांगते हुए तीन सप्ताह के भीतर विस्तृत रिपोर्ट दाखिल करने के निर्देश दिए। अदालत ने इस मामले को गंभीर मानते हुए पूछा कि नेपाली मूल के लोगों को भारत में रहने और जमीन खरीदने की अनुमति किन नियमों के तहत दी जा रही है। दोस्तो अब मै आपको बताता हूं कि क्या है पूरा मामला? गौर कीजिगा, दोस्तो यह जनहित याचिका नैनीताल निवासी की ओर से दायर की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि नैनीताल के समीप स्थित खुर्पाताल क्षेत्र के खाड़ी इलाके में नेपाली मूल के लगभग 25 परिवारों ने सरकारी और वन विभाग की जमीन पर अवैध कब्जा कर लिया है। याचिका के अनुसार इन लोगों ने वहां स्थायी आवासीय निर्माण भी कर लिया है। लेकिन दोस्तो यहां मामला तब गंभीर हो जाता है तब अवैध दस्तावेज बनाने के आरोप लगे वो इसलिए क्योंकि इस मामले में याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि संबंधित लोगों ने भारतीय नागरिकता प्राप्त नहीं की है और न ही इसके लिए वैधानिक प्रक्रिया अपनाई है। इसके बावजूद उन्होंने कथित रूप से अवैध तरीके से कई सरकारी दस्तावेज बनवा लिए। इन दस्तावेजों में आधार कार्ड, राशन कार्ड, ड्राइविंग लाइसेंस, स्थायी निवास प्रमाण पत्र और स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़े कार्ड शामिल बताए गए हैं।
दोस्तो इतना भर नहीं है इसके आलावा आरोप लगाया गया कि सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के अलावा पानी और बिजली के कनेक्शन भी हासिल कर लिए गए हैं। दोस्तो सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से शपथपत्र पेश किया गया। सरकार ने कहा कि 1950 की भारत-नेपाल संधि के तहत भारतीय नागरिक नेपाल में और नेपाली नागरिक भारत में रह सकते हैं और रोजगार भी कर सकते हैं। हालांकि, दोस्तो याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि यदि कोई नेपाली नागरिक भारत में जमीन खरीदता है तो उसे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के माध्यम से निर्धारित प्रक्रिया का पालन करना होता है..लेकिन जब मामला गर्माया तो कोर्ट ने सीधे सरकार से जवाब तलब कर दिया कह दिया कि साफ नीति बताएं।
हाई कोर्ट ने सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा है नेपाली मूल के लोग किस वैधानिक व्यवस्था के तहत रह रहे हैं।
जमीन खरीदने की प्रक्रिया क्या है। कथित अवैध कब्जों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है। कोर्ट ने तीन सप्ताह में जवाब दाखिल करने का आदेश दिया है। दोस्तो याचिका में य़े भी कहा गया है कि कब्जे सरकारी और वन विभाग की भूमि पर किए गए हैं, जिससे पर्यावरण और सार्वजनिक संपत्ति दोनों प्रभावित हो रहे हैं। मामले को लेकर स्थानीय लोगों में भी चिंता बढ़ती जा रही है। दोस्तो, फिलहाल उत्तराखंड में जमीन, जनसंख्या और अवैध कब्जों को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है।हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद अब यह मामला सिर्फ नैनीताल या खुर्पाताल तक सीमित नहीं रह गया बल्कि पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन चुका है।सवाल ये है कि आखिर सरकारी और वन विभाग की जमीनों पर कथित कब्जे कैसे हो गए?अगर आरोप सही हैं तो इतने बड़े स्तर पर दस्तावेज आखिर किसकी मदद से बने?और क्या उत्तराखंड की संवेदनशील भौगोलिक और सांस्कृतिक पहचान पर धीरे-धीरे बड़ा संकट खड़ा हो रहा है? दोस्तो, मामला बेहद गंभीर इसलिए भी है क्योंकि इसमें सिर्फ जमीन खरीदने का मुद्दा नहीं बल्कि सरकारी भूमि, वन क्षेत्र, दस्तावेजों की वैधता और सुरक्षा व्यवस्था तक के सवाल जुड़े हुए हैं।हाई कोर्ट ने अब साफ तौर पर सरकार से नीति और प्रक्रिया का जवाब मांगा है। यानि आने वाले दिनों में इस पूरे मामले पर सरकार की जवाबदेही तय हो सकती है।लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है। क्या उत्तराखंड में जमीनों और सरकारी संपत्तियों की निगरानी व्यवस्था कमजोर पड़ रही है?और क्या भविष्य में ऐसे मामलों को रोकने के लिए कोई ठोस नीति बनाई जाएगी? फिलहाल तीन हफ्तों के भीतर सरकार को कोर्ट में जवाब दाखिल करना है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि सरकार क्या रिपोर्ट पेश करती है और क्या कथित अवैध कब्जों पर कोई बड़ा एक्शन देखने को मिलता है?