जी हां दोस्तो जयकारों से गूंजी घाटी, श्रद्धालुओं ने रचा नया इतिहास उत्तराखंड के हेमकुंड साहिब में बर्फबारी के बीच भावुक विदाई! सर्द मौसम, श्रद्धा का सैलाब और ‘जो बोले सो निहाल’ के जयकारे। शीतकाल के लिए बंद हुए हेमकुंड साहिब के कपाट! 4 हजार से ज्यादा श्रद्धालुओं ने नवाया शीश, पाकिस्तान से लेकर इंग्लैंड और फ्रांस तक की संगत ने टेका माथा। बर्फ की सफेद चादर के बीच आस्था का ऐसा संगम, जिसने हर किसी का मन मोह लिया! दोस्तो हिमालय की दुर्गम और ऊंची चोटियों पर 15,200 फीट की ऊंचाई पर स्थित सिखों के पवित्र धाम श्री हेमकुंड साहिब से आज एक बेहद अलौकिक और भावुक कर देने वाली तस्वीर सामने आई है। हल्की बर्फबारी के बीच, शनिवार को गुरुद्वारा साहिब के कपाट शीतकाल के लिए बंद कर दिए गए। इस ऐतिहासिक पल का साक्षी बनने के लिए देश-विदेश से 5 हजार से ज्यादा श्रद्धालु उमड़े थे। लेकिन इस बार की ‘समाप्ति अरदास’ बेहद खास रही, क्योंकि गुरु महाराज का आशीर्वाद लेने के लिए सरहद पार पाकिस्तान से 40 सदस्यों का विशेष जत्था पहुंचा, तो वहीं इंग्लैंड और फ्रांस से भी संगतें मत्था टेकने हिमालयाई चोटियों पर दौड़ी चली आईं।
दोसतो ‘जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल’ के गगनभेदी जयकारे और चारों तरफ बिछी सफेद बर्फ की मखमली चादर। हेमकुंड यात्रा इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई। चमोली जिले में स्थित सिखों के महान आस्था के केंद्र, श्री हेमकुंड साहिब और लोकपाल तीर्थ के कपाट शीतकाल के लिए बंद कर दिए गए हैं। कड़ाके की ठंड और हल्की बर्फबारी भी श्रद्धालुओं के कदमों को डिगा नहीं सकी। गुरु महाराज के दर्शन की आखिरी झलक पाने के लिए हजारों आंखें सजल थीं और समूची हेमकुंड घाटी गुरुवाणी के रूहानी सुरों से सराबोर थी। दोस्तो इस बार कपाट बंदी का यह उत्सव सिर्फ देश के कोने-कोने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसने अंतरराष्ट्रीय सीमाओं को भी बौना साबित कर दिया। इस पवित्र बेला का साक्षी बनने के लिए पाकिस्तान के पेशावर से आया 40 सदस्यीय श्रद्धालुओं का विशेष जत्था पहाड़ों पर पहुंचा था। जैसे ही पाकिस्तानी जत्थे ने पवित्र दरबार साहिब में शीश नवाया, वैसे ही दोनों देशों के बीच की दूरियां मानों सिमट गईं। ‘
इतना ही नहीं, गुरु का संकल्प लेकर इंग्लैंड, अमेरिका और फ्रांस से भी संगतें सात समंदर पार कर इस बेहद कठिन 15 हजार फीट ऊंचे दुर्गम मार्ग को पार कर यहाँ पहुंची थीं। दोस्तो आस्था के इस वैश्विक मंच ने यह साबित कर दिया कि भक्ति की कोई सीमा नहीं होती। दोस्तो कपाट बंद होने की प्रक्रिया सुबह सुखमणि साहिब के पाठ के साथ शुरू हुई। इसके बाद शबद कीर्तन और साल की अंतिम अरदास की गई। इस मौके पर भारतीय सेना के बैंड की 11 टीमों ने जब देशभक्ति और भक्ति रस से सराबोर मधुर धुनें बजाईं, तो वहां मौजूद हर श्रद्धालु भावविभोर हो उठा। दोस्तो आपको बता दें कि, साल 2026 की इस यात्रा ने इतिहास के सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं! 23 मई से शुरू हुई इस यात्रा में इस बार रिकॉर्ड 3,84,573 से अधिक श्रद्धालुओं ने मत्था टेका, जो अब तक का सबसे बड़ा आंकड़ा है। दोस्तो पवित्र अरदास के बाद हुक्मनामा लिया गया और पंच प्यारों की अगुवाई में पवित्र गुरु ग्रंथ साहिब को बेहद सम्मान के साथ दरबार साहिब से शीतकालीन निवास ‘सचखंड’ में सुशोभित कर दिया गया। अब अगले सात महीनों तक यह पवित्र धाम पूरी तरह बर्फ के आगोश में समाया रहेगा। सेना के जवानों और जिला प्रशासन के अथक प्रयासों से यह रिकॉर्ड यात्रा पूरी तरह सुरक्षित और सफल रही। कपाट बंद होने के साथ ही यह खूबसूरत सफर अगले साल तक के लिए थम गया है, लेकिन संगतों के दिलों में गुरु महाराज की यह यादें हमेशा के लिए अमर हो गई हैं।