देवभूमि उत्तराखंड से आस्था की एक ऐसी अलौकिक तस्वीर सामने आई है, जिसे देखकर साक्षात काल भी थम जाए! 12 साल बाद माँ नंदा की ‘बड़ी जात’ में आस्था का ऐसा महा-सैलाब उमड़ा है, जिसे देखने के लिए समूचा हिमालय उमड़ पड़ा है!लेकिन हैरान करने वाली बात देखिए, जहाँ सरकारें और प्रशासन घुटने टेक देते हैं, वहाँ बिना किसी सरकारी मदद के, पहाड़ के सीधे-सादे ग्रामीणों ने अपनी लाडली बेटी नंदा के लिए एक अनोखा इतिहास रच दिया है! लाखों भक्तों के लिए खाने और रहने का ऐसा बंदोबस्त, जिसे देखकर बड़ी-बड़ी व्यवस्थाएं शर्मा जाएं। और आज चमोली के दुर्गम पड़ाव पर जब 3 डोलियों का महा-मिलन हुआ, तो वहां मौजूद हर एक भक्त फूट-फूट कर रो पड़ा! आखिर मायके से विदा हो रही बेटी नंदा की डोलियां जब आपस में मिलीं, तो क्यों थम गईं सबकी सांसें? और अब इंसानी बस्तियों को छोड़कर यह यात्रा किन खौफनाक और निर्जन रास्तों पर बढ़ने जा रही है? दोस्तो देवभूमि उत्तराखंड से आस्था, विदाई और लोक-परंपरा की एक ऐसी अलौकिक तस्वीर सामने आई है, जिसे देखकर आपकी आंखों में भी आंसू आ जाएंगे! 12 साल बाद आयोजित हो रहा हिमालय का महाकुंभ यानी ‘मां नंदा देवी बड़ी जात यात्रा’ अपने पूरे शबाब पर है। चमोली के दुर्गम कनोल गाँव में जब माँ नंदा की तीन देव डोलियाँ पहुँचीं, तो लाखों भक्तों का ऐसा जनसैलाब उमड़ा कि पैर रखने तक की जगह नहीं बची! लेकिन असली हैरान करने वाली बात यह है कि इस महा-आयोजन के पीछे कोई सरकार या प्रशासन नहीं, बल्कि पहाड़ के सीधे-सादे ग्रामीणों का वो जज्बा है जिसने सबको झकझोर कर रख दिया है। आखिर कनोल गाँव में ऐसा क्या हुआ? और अब इंसानी बस्तियों को छोड़कर माँ नंदा की यात्रा किन खौफनाक और निर्जन रास्तों पर बढ़ने जा रही है? चमोली जिले का सुदूर और दुर्गम कनोल गाँव इन दिनों एक ऐतिहासिक पल का गवाह बना है। जब मशकबीन और ढोल-दमाऊं की पारंपरिक थाप के बीच मां नंदा की तीन पावन देव डोलियों ने कनोल गांव में प्रवेश किया, तो पूरा इलाका ‘जय माँ नंदा’ के उद्घोष से गूंज उठा। ग्रामीणों की आंखें नम थीं और वे छतों से अपनी लाडली ध्याण यानी बेटी नंदा पर फूलों की बारिश कर रहे थे। इस यात्रा की सबसे खूबसूरत और दिल को छू लेने वाली तस्वीर कनोल गाँव से ही सामने आई है। यहाँ लाखों श्रद्धालुओं का जनसैलाब उमड़ा, लेकिन प्रशासन की मुस्तैदी से ज्यादा स्थानीय ग्रामीणों का समर्पण देखने को मिला। बिना किसी सरकारी मदद के, गांव के लोगों ने खुद आगे आकर लाखों श्रद्धालुओं के रहने और उनके खाने-पीने का भव्य इंतजाम किया। रात भर माँ नंदा के मायके में लोकगीत और पारंपरिक जागर गाए गए, जिससे पूरा माहौल पूरी तरह भक्तिमय हो गया।
कनोल गाँव के इस भावुक पड़ाव के बाद यात्रा अब अपने सबसे भावुक और मुख्य चरण में पहुँच चुकी है। आज यानी 15 सितंबर को बाण गाँव में माँ नंदा की इन तीनों देव डोलियों का अलौकिक महा-मिलन हो रहा है। इस महा-मिलन को देखने के लिए देश-विदेश से श्रद्धालु बाण गाँव पहुँचे हैं, लेकिन भक्तों के लिए असली और सबसे कठिन परीक्षा अब शुरू होने जा रही है। क्योंकि बाण गाँव और वाण के इस पड़ाव के बाद, यह यात्रा अब इंसानी बस्तियों को हमेशा के लिए छोड़ देगी। इसके बाद शुरू होगा माँ नंदा का वो निर्जन और दुर्गम सफर, जहाँ सिर्फ ऊंचे हिमालयी शिखर, खौफनाक खाइयाँ और गहरी आस्था होगी।16 सितंबर के बाद यह यात्रा वाण से आगे बढ़कर गैरोलीपातल, समंदर तल से हजारों फीट ऊंचे बेदनी बुग्याल, पातरन-चौणियां और रहस्यों से भरी रूपकुंड झील तक पहुँचेगी। सिर्फ यही नहीं, हाड़ कंपा देने वाली ठंड के बीच डोलियाँ ज्यूंरागली और शिलासमुद्र को पार करते हुए अपने अंतिम गंतव्य होमकुंड के लिए रवाना होंगी। दोस्तो होमकुंड वो पावन स्थल है जहाँ पहुँचकर माँ नंदा को चार सींगों वाले खाडू (मेढ़े) के साथ भारी मन से कैलाश के लिए हमेशा के लिए विदा कर दिया जाएगा। मायके से बेटी की विदाई का यह दृश्य हर किसी की छाती फाड़ देता है। पहाड़ की इस अटूट आस्था, परंपरा और ग्रामीणों के इस बेमिसाल जज्बे को हमारा शत-शत नमन। अगर आप भी माँ नंदा के दर पर नहीं पहुँच पाए हैं, तो घर बैठे ही कमेंट बॉक्स में ‘जय माँ नंदा देवी’ लिखकर अपनी हाजिरी जरूर लगाएं। इस पावन वीडियो को उत्तराखंड के हर एक कोने तक शेयर करें।