तुम बहुत बोल लिए, अब बोलने की बारी मेरी है, अभी यहां से हट जाइए, लिखित में नहीं मिलेगा। मै तुम्हारी टीसी काटूंगा! दोसतो जरा सोचिए, ये शब्द किसके हो सकते हैं? किसी गुंडे के? किसी दबंग के? जी नहीं! ये शर्मनाक शब्द हैं देहरादून के उस राष्ट्रीय दृष्टि दिव्यांगजन सशक्तिकरण संस्थान के प्रिंसिपल के, जिसका काम उन बच्चों को सहारा देना था जो देख नहीं सकते, लेकिन जब उन्हीं दृष्टिबाधित छात्रों ने अपने हक के लिए आवाज उठाई, तो उन्हें इंसाफ की जगह मिली सीधे स्कूल से बाहर निकालने की धमकी! दोस्तो आज मै आपको बताऊंगा देहरादून के मॉडल स्कूल में चल रहे उस बड़े आंदोलन की वो कहानी , जिसने पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर दिया है। दोस्तो ये वो आंदोलन है जिससने देहरादून से लेकर दिल्ली तक सिस्टम को हिला दिया, लेकिन दोस्तो एक तरफ सिस्टम छात्रों के साथ खड़ा होकर उनके बेहतर भविष्य की दुहाई देता है। वहीं दूसरी तरफ संस्थान की जिम्मेदारी जिन लोगों के कंधों पर है वो छात्रो को धमका रहे हैं। तो दोस्तो सुन लिया आपने? ये अहंकार से सने हुए वो शब्द हैं, जो किसी गुंडे या मवाली ने नहीं, बल्कि देहरादून के प्रतिष्ठित राष्ट्रीय दृष्टि दिव्यांगजन सशक्तिकरण संस्थान (NIEPVD) के एक जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी ने कहे हैं! जरा सोचिए, जिन बच्चों की आंखों में कुदरत ने रोशनी नहीं दी, जो इस बेरहम दुनिया में शिक्षा के सहारे अपने पैरों पर खड़ा होने की जंग लड़ रहे हैं, उन्हें हमारा संवेदनहीन सिस्टम क्या दे रहा है? इंसाफ? उनकी जायज मांगें? जी नहीं! उन्हें सीधे करियर बर्बाद करने और स्कूल से बाहर फेंकने की धमकी दी जा रही है!
दोस्तो यह पूरा मामला उत्तराखंड की राजधानी देहरादून का है, जहाँ पिछले कई दिनों से सैकड़ों दृष्टिबाधित छात्र अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए आंदोलन कर रहे हैं। विडंबना देखिए—इस संस्थान का नाम है ‘राष्ट्रीय दृष्टि दिव्यांगजन सशक्तिकरण संस्थान’। नाम में लिखा है ‘सशक्तिकरण’, लेकिन जमीन पर चल रहा है सरासर ‘शोषण’! ये बच्चे कोई चांद-तारे नहीं मांग रहे थे। इनकी मांगें इतनी बुनियादी हैं कि सुनकर आपको शर्म आ जाएगी, ये छात्र मांग रहे थे—मेस में मिलने वाले घटिया और बदबूदार खाने से मुक्ति, समय पर ब्रेल लिपि और इंग्लिश मीडियम की किताबें, जो इन्हें नहीं दी जा रही थीं, और वो लैपटॉप जो सरकार ने इनके लिए मंजूर तो किए, लेकिन प्रशासनिक फाइलों में दबे रह गए! लेकिन अत्याचार की हद तो तब हो गई जब पिछले 3 सालों से 12वीं पास करने के बाद आगे की उच्च शिक्षा (UG-PG) के लिए मिलने वाली बच्चों की मेरिटोरियस स्कॉलरशिप को बिना किसी ठोस वजह के बंद कर दिया गया! जो छात्र आर्थिक रूप से बेहद कमजोर परिवारों से आते हैं, उनके भविष्य का गला घोंट दिया गया। छात्र चीख-चीख कर कह रहे हैं कि पिछले 4 साल से इस बेहद संवेदनशील राष्ट्रीय संस्थान में कोई परमानेंट डायरेक्टर यानी स्थाई निदेशक ही नहीं है! दिल्ली में बैठे अधिकारियों को इस बात का एडिशनल चार्ज दे दिया गया है, जिन्हें देहरादून में बैठकर इन बच्चों के आंसू देखने की फुर्सत ही नहीं है! जब बच्चों ने सैकड़ों ईमेल लिखे, सरकार को चिट्ठियां भेजीं और कोई सुनवाई नहीं हुई, तब जाकर इन मासूमों को सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर होना पड़ा!
दोस्तो जब प्रशासन के साथ बातचीत बेनतीजा रही, तो इंसाफ की गुहार लगाने पहुंचे छात्रों के सामने यह अधिकारी महोदय अहंकार में चूर होकर आते हैं। वो ये भूल जाते हैं कि वो एक शिक्षक हैं, वो एक मार्गदर्शक हैं। वो अपनी तानाशाही दिखाते हुए चिल्लाते हैं—”लिखित में कुछ नहीं मिलेगा। मैं तुम्हारी टीसी काट दूंगा!” अरे साहब! किस बात का घमंड है आपको? उन बच्चों को डरा रहे हो जो देख नहीं सकते? उन बच्चों के करियर को लात मारने की धमकी दे रहे हो जो हक की लड़ाई लड़ रहे हैं? संस्थान ने मीडिया की एंट्री पर भी रोक लगा दी ताकि ये सच देश के सामने न आ सके, लेकिन डिजिटल इंडिया के इस दौर में इन दिव्यांग छात्रों के आत्मसम्मान की आवाज चारदीवारी को चीरकर बाहर आ चुकी है! दोस्तो कुछ सवाल हैं केंद्रीय सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय से सवाल है कि आखिर इस राष्ट्रीय संस्थान की ये दुर्दशा क्यों है? क्यों एक संवेदनशील संस्थान को बिना परमानेंट डायरेक्टर के लावारिस छोड़ दिया गया है? और सबसे बड़ा सवाल उस अधिकारी से—क्या दिव्यांग बच्चों को धमकी देना ही आपके संस्कार हैं? दोस्तों, ये जंग सिर्फ उन दृष्टिबाधित छात्रों की नहीं है, यह जंग इस देश के हर उस नागरिक की है जो तानाशाही के खिलाफ खड़ा है। इस वीडियो को इतना शेयर कीजिए कि ये सीधे मंत्रालय और सरकार के कानों तक पहुंचे और इस अहंकारी अधिकारी पर सख्त से सख्त कार्रवाई हो। हालांकि दोस्तो ये यहां बता दूं इस वीडियो के बाद इस अधिकारी को हटा दिया गया है, लेकिन क्या यहां से हटना दूसरे संसथान में भेजनी ही इसकी जसा है या फिर और कुछ होना चाहिए।