कैंची धाम में रिकॉर्ड भीड़, लेकिन सवाल ये है—अगर श्रद्धालुओं और पर्यटकों की संख्या इतनी ज्यादा है, तो स्थानीय दुकानदार क्यों परेशान हैं?ग्राहकों के बजाय सड़कों पर गाड़ियों का रेला। दुकानें खुली हैं, लेकिन क्या कारोबार ठप पड़ गया है?गरमपानी के दुकानदार आशीष पांडेय आखिर किस दर्द को बयां कर रहे हैं?क्या जाम ने स्थानीय कारोबारियों से उनके ग्राहक ही छीन लिए?बाहर से आने वालों के लिए ये लंबा वीकेंड घूमने और दर्शन का मौका है, लेकिन पहाड़ के इन कारोबारियों के लिए यही भीड़ परेशानी क्यों बन रही है? पूरी खबर पहाड़ियों की पीड़ा बताउंगा आपको अपनी इस रिपोर्ट के जरिए। दोस्तो घंटों का जाम, सड़क पर फंसी गाड़ियां और दुकानों तक पहुंचने में असमर्थ ग्राहक।तो सवाल सीधा है—भीड़ अपार है, फिर कारोबार ठप क्यों है? अमूमन यह माना जाता है कि किसी धार्मिक या पर्यटन स्थल पर जितनी ज़्यादा भीड़ बढ़ेगी, वहां के स्थानीय दुकानदारों और होटल व्यवसायियों की चांदी होगी, उनका मुनाफा चमकेगा। लेकिन कैंची धाम हाईवे और गरमपानी के दुकानदारों की ज़मीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। बाहर से आने वाले सैलानियों के लिए जो ‘लॉन्ग वीकेंड’ मौज-मस्ती का जरिया है, वही वीकेंड यहाँ के स्थानीय छोटे व्यापारियों के लिए किसी दुःस्वप्न से कम नहीं है। घंटों का महाजाम, धुएं का गुबार और गाड़ियों की इस अंतहीन कतार ने ग्राहकों को दुकानों तक पहुंचने का रास्ता ही बंद कर दिया है। गरमपानी के एक स्थानीय दुकानदार आशीष पांडेय जी और उनके जैसे सैकड़ों छोटे व्यवसायी आज इस बेकाबू भीड़ और लचर व्यवस्था के आगे लाचार हैं। देखिए हमारी यह विशेष ग्राउंड रिपोर्ट—’भीड़ का सच या कारोबार का दर्द’ दोस्तो पहाड़ पर उमड़ती भारी भीड़, रिकॉर्ड तोड़ती गाड़ियों की संख्या और होटल-होमस्टे फुल होने के बड़े-बड़े दावे! बाहर से देखने वाले को लगता है कि देवभूमि के इस रूट पर आज पैसे की बारिश हो रही होगी। लेकिन कैमरे को थोड़ा घुमाइए और हाईवे के किनारे सजी इन छोटी-बड़ी दुकानों को देखिए।
गरमपानी के स्थानीय दुकानदार आशीष पांडेय जी बताते हैं कि बाहर से दिखने वाली यह चकाचौंध एक बहुत बड़ा धोखा है। इस हाइवे पर रहने वाले और रोज़ी-रोटी कमाने वाले छोटे व्यापारियों के लिए यह भीड़ अब मुनाफे की चाबी नहीं, बल्कि उनके कारोबार को निगलने वाली एक बड़ी आफत बन चुकी है! दोस्तो सिद्धांत कहता है कि ग्राहक बढ़ेगा तो धंधा बढ़ेगा। लेकिन हकीकत यह है कि जब भवाली से लेकर गरमपानी और खैरना तक गाड़ियां बंपर-टू-बंपर फंस जाती हैं, तो कोई भी राहगीर या ग्राहक गाड़ी रोककर दुकान तक आने की हिम्मत ही नहीं कर पाता। गाड़ियों का पहिया थमा रहता है, लेकिन दुकानों का गल्ला खाली रहता है। जो ग्राहक रुकना भी चाहते हैं, उन्हें पीछे से आ रही गाड़ियों के हॉर्न और पुलिस की सख्ती आगे बढ़ने पर मजबूर कर देती है। नतीजा यह है कि दुकान खुली है, माल सजा है, लेकिन खरीदार नदारद हैं। लोकल कारोबारियों के लिए यह लॉन्ग वीकेंड अब सिर्फ गाड़ियों का धुंआ और हॉर्न का शोर लेकर आता है।
दोस्तो गरमपानी के आशीष पांडेय जी की तरह ही यहाँ के दर्जनों होटल, रेस्टोरेंट और रोजमर्रा का सामान बेचने वाले छोटे व्यवसायी इस बेकाबू भीड़ से त्रस्त हैं। इनका कहना है कि जाम के कारण स्थानीय लोग भी बाज़ारों में आने से कतराने लगे हैं। रोजमर्रा की जिंदगी इस कदर ठप हो जाती है कि दुकानदारों को अपनी ही दुकान तक सामान सप्लाई करने में पसीने छूट जाते हैं। भारी भीड़ के इस दौर में होटल व्यवसायी भी परेशान हैं, क्योंकि जाम के डर से उनके रेगुलर कस्टमर इस रूट पर आने से कतराने लगे हैं। आस्था के इस अनियंत्रित सैलाब ने स्थानीय अर्थव्यवस्था को रीढ़ पर चोट पहुंचाई है। दोस्तो यह समस्या सिर्फ एक वीकेंड की नहीं है, बल्कि हर छुट्टी और हर शनिवार-रविवार की कहानी बन चुकी है। पर्यटन और आस्था के नाम पर पहाड़ों का विकास तो हो रहा है, लेकिन उस विकास की कीमत इन छोटे दुकानदारों को अपनी जेब से चुकानी पड़ रही है। सवाल यह है कि प्रशासन जब भी नया ट्रैफिक प्लान बनाता है, तो इन स्थानीय व्यवसायियों के पेट पर लात न पड़े, इसका ख्याल क्यों नहीं रखा जाता? क्या केवल गाड़ियों की संख्या गिनना ही सफलता है, या सड़क किनारे जीने वाले इन लोगों के कारोबार की रक्षा करना भी किसी की ज़िम्मेदारी है?