दोस्तो, क्या अब इस देश में सवाल पूछना भी गुनाह हो गया है? क्या बेरोजगारी पर सवाल उठाने वाला युवा “कॉकरोच” कहलाएगा?क्या पेपर लीक के खिलाफ आवाज उठाने वाले छात्र “देशद्रोही” और “नकल जिहादी” कहे जाएंगे?और क्या अब जनता की आवाज दिखाने वाले छोटे डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म “टटपूंजिये” बन गए हैं? उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों एक नया शब्द बड़ा विवाद खड़ा कर रहा है — “टटपूंजिये” देशभर में कॉकरोच जनता पार्टी ने तहलाका मचाया हुआ है, तो वहीं उत्तराखंड के एक मंत्री जी कहते हैं सवाल करने वाले, आवाज उठाने वाले टटपूंजिये हैं। आखिर क्यों सवालों को सलाखों के पीछे धकेलने की कोशिश हो रही है। बताउंआपका पूरी खबर अपनी इस रिपोर्ट के जरिए। दोस्तो कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) नाम के व्यंग्यात्मक प्लेटफॉर्म के 16 मई को अस्तित्व में आने के बाद से ही सोशल मीडिया पर इसकी चर्चाएं जारी हैं। हालांकि, इसने हालिया रिकॉर्ड 21 मई को बनाया, जब सीजेपी के इंस्टाग्राम पेज पर उसके फॉलोवर्स की संख्या ने भाजपा के 88 लाख और कांग्रेस के करीब 1.3 करोड़ फॉलवोर्स के आंकड़े को पार कर लिया। अभी दोस्तो लोक इसके बारे में जान ही रहे थे। सर्च कर कर रहे थे कि और उसके अस्त्व में आने की जानकारी जुटा ही रहे हैं कि इस पर कार्रवाई देखने को मिल गई कॉकरोच जनता पार्टी के पेजिज को बंद करने का सिलसिला शुरू हो गया। लेकिन दगड़ियो एक बड़ी बहस के बीच उत्तराखंड के एक मंत्री का बयान भी खूब चर्चा में आ गया। टटपूंजिये कह कर कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी के बयान के बाद अब सवाल सिर्फ एक शब्द का नही, बल्कि उस मानसिकता का है, जिसमें सत्ता से सवाल पूछने वालों को छोटा दिखाने की कोशिश की जा रही है।
दोस्तो, जब युवा नौकरी मांगता है तो उसे ट्रोल किया जाता हैजब छात्र पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन करते हैं तो उन पर सवाल उठाए जाते हैं और जब कोई डिजिटल क्रिएटर भ्रष्टाचार, सिस्टम की नाकामी और जनता की समस्याएं दिखाता है, तो उसे “टटपूंजिया” कह दिया जाता है, तो क्या लोकतंत्र में सिर्फ तारीफ करने का अधिकार है। सवाल पूछने का नहीं?क्या जनता की आवाज उठाना अब सत्ता को चुभने लगा है? क्या छोटे डिजिटल प्लेटफॉर्म इसलिए निशाने पर हैं क्योंकि वे वो सच दिखा रहे हैं जिसे मुख्यधारा का मीडिया कई बार नजरअंदाज कर देता है? खैर इस बात होगी आगे लेकिन आज सोशल मीडिया ने गांव-गांव के युवाओं को आवाज दी है। छोटे क्रिएटर्स जमीन की समस्याएं उठा रहे है। बेरोजगारी से लेकर भ्रष्टाचार तक के मुद्दे सामने ला रहे हैं और शायद यही वजह है कि अब इन आवाजों से बेचैनी बढ़ने लगी है। दोस्तो, लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत सवाल होते हैं। अगर सवाल पूछने वालों को अपमानित किया जाएगा, उन्हें नाम देकर दबाने की कोशिश होगी तो फिर लोकतंत्र और डर के माहौल में फर्क क्या रह जाएगा? दोस्तो उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों एक नया शब्द खूब चर्चा में है — “टटपूंजिये”..और सवाल सिर्फ एक शब्द का नहीं है। सवाल उस सोच का है, जो सत्ता में बैठे लोगों की आलोचना करने वालों को छोटा दिखाने की कोशिश करती है। जब कोई युवा बेरोजगारी पर सवाल पूछता है। जब कोई छात्र पेपर लीक के खिलाफ सड़क पर उतरता है। जब कोई डिजिटल क्रिएटर भ्रष्टाचार, सिस्टम की नाकामी या जनता की परेशानियों को कैमरे में कैद करता है तो क्या उसे “कॉकरोच”, “देशद्रोही”, “नकल जिहादी” या अब “टटपूंजिया” कह देना आसान रास्ता बन गया है?
उत्तराखंड सरकार के कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी का बयान अब बड़े विवाद का कारण बन गया है। मंत्री कहते हैं कि “आजकल रोज नए चैनल खुल जाते हैं” और कई “टटपूंजिये चैनल” बिना तथ्यों के खबरें चलाने लगते हैं। दोस्तो लेकिन सवाल यह है कि आखिर तय कौन करेगा कि कौन सा मीडिया बड़ा है और कौन छोटा? क्या जनता की आवाज उठाने वाला हर छोटा डिजिटल प्लेटफॉर्म गलत है? क्या सिर्फ वही मीडिया सही है जो सत्ता से सवाल न पूछे? दिन पहले कुछ दिन पहले बेरोजगार युवाओं को “कॉकरोच” कहे जाने पर भी बड़ा विवाद हुआ था। UKSSSC पेपर लीक आंदोलन के दौरान आंदोलनकारी छात्रों को “देशद्रोही”, “एंटी-हिंदू” और “नकल जिहादी” जैसे शब्दों से निशाना बनाया गया, लेकिन सच यह है कि वही छात्र अपने भविष्य के लिए लड़ रहे थे वे नौकरी मांग रहे थे, अधिकार मांग रहे थे, पारदर्शिता मांग रहे थे। लोकतंत्र की असली ताकत सवाल पूछने में होती है, चुप रहने में नहीं अगर मीडिया सवाल पूछे तो उसे “टटपूंजिया” कह दिया जाए। अगर युवा विरोध करें तो उन्हें देशविरोधी बता दिया जाए तो फिर लोकतंत्र और तानाशाही में फर्क क्या रह जाएगा?आज सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म ने उन लोगों को भी आवाज दी है, जिनकी बातें पहले मुख्यधारा तक नहीं पहुंच पाती थीं। कई छोटे डिजिटल क्रिएटर्स गांव-गांव की समस्याएं दिखा रहे हैं। पेपर लीक से लेकर भ्रष्टाचार तक की खबरें सामने ला रहे हैं, और यही वजह है कि उनकी पहुंच लगातार बढ़ रही है। अब कैबिनेट मंत्री Ganesh Joshi कह रहे कि आजकल “रोज नया चैनल खुल जाता है” और कई “टटपूंजिये चैनल” बिना तथ्यों के खबरें चलाने लगते हैं। क्या सत्ता को सवालों से डर लगने लगा है?क्या जनता की आवाज उठाने वालों को अपमानित करना नया राजनीतिक ट्रेंड बन चुका है?या फिर यह उस बेचैनी का संकेत है, जहां अब जनता सिर्फ सुनना नहीं, सवाल पूछना भी चाहती है क्योंकि लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नही हर नागरिक का अधिकार है।