Maa Nanda Devi रूपकुंड और ज्यूंरागली की ओर बढ़ा कारवां! | Nanda Rajjat Homkund | Uttarakhand News

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चमोली के रामणी गांव में उमड़ा श्रद्धा का अभूतपूर्व समंदर! पूरे 12 साल बाद लोक संस्कृति का ऐसा महासंगम देखने को मिला है, जहाँ लोकगीतों और जागरों से पूरा पहाड़ नंदामय हो उठा है! अपनी लाडली बेटी की विदाई पर जहाँ फफक-फफक कर रो पड़े हजारों श्रद्धालु, वहीं बंड नंदा डोली और 80 से ज्यादा छंतोलियों के साथ अब कैलाश की ओर रवाना हो चुका है यह पावन कारवां! आज हर कोई इस अद्भुत सफर को देख रहा है कि आखिर रूपकुंड और ज्यूंरागली जैसे दुनिया के सबसे खतरनाक रास्तों को पार कर कहाँ पहुंचेगी मां की ये डोली?! दोस्तो देवभूमि उत्तराखंड की पावन वादियों से आस्था, परंपरा और संस्कृति की एक ऐसी अलौकिक तस्वीर सामने आई है, जिसे देखकर साक्षात अध्यात्म का अहसास होने लगता है! 12 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद आयोजित हो रही ऐतिहासिक माँ नंदा देवी लोक जात यात्रा इस वक्त अपने सबसे भव्य और भावुक पड़ाव पर पहुंच चुकी है! चमोली जिले का रामणी गांव आज आस्था के एक अभूतपूर्व जनसैलाब का गवाह बना है!हजारों श्रद्धालुओं की नम आंखें, हवा में गूंजते मां नंदा के लोकगीत और जागर, और आसमान को छूती सैकड़ों छंतोलियां, नजारा ऐसा कि हर कोई बस देखता रह गया। बंड नंदा डोली के साथ निजमुला घाटी की 80 से अधिक छंतोलियां अब सीधे उच्च हिमालयी कैलाश धाम की ओर विदा हो चुकी हैं! आखिर क्यों पहाड़ की इस विदाई को देखकर हर आंख छलक उठती है? और आने वाले दिनों में यह यात्रा किन दुर्गम और रहस्यमयी रास्तों से होकर गुजरेगी?

दोस्तो देवभूमि उत्तराखंड में मां नंदा को केवल एक देवी नहीं, बल्कि हिमालय की बेटी और गढ़वाल-कुमाऊं के हर घर की धियाणी यानी लाडली बेटी माना जाता है। यही वजह है कि जब 12 साल बाद मां नंदा अपने मायके से ससुराल कैलाश धाम के लिए निकलती हैं, तो पूरा पहाड़ उनकी विदाई में उमड़ पड़ता है। चमोली जिले का रामणी गांव इस वक्त इसी अलौकिक श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है, जहां आस्था का ऐसा जनसैलाब उमड़ा है कि पैर रखने तक की जगह नहीं बची है। पूरा इलाका जागरों और मां के जयकारों से नंदामय हो चुका है। दोस्तो इस बार की यात्रा बेहद खास और ऐतिहासिक है। रामणी गांव से बंड नंदा डोली के नेतृत्व में एक विशाल कारवां आगे बढ़ा है। इस कारवां में बंड क्षेत्र, फर्स्वाण फाट, क्षेत्रपाल और निजमुला घाटी समेत विभिन्न क्षेत्रों की 80 से अधिक पारंपरिक छंतोलियां शामिल हैं। रंग-बिरंगे वस्त्रों और कलाकृतियों से सजी ये छंतोलियां जब ऊंचे पहाड़ों के रास्तों से गुजरती हैं, तो ऐसा लगता है मानो आसमान से खुद देवता इस यात्रा का स्वागत करने धरती पर उतर आए हों। दोस्तो जैसे ही यह पावन डोली और छंतोलियों का कारवां रामणी गांव से आगे बढ़ा, रास्ते में आने वाले हर गांव में त्योहार जैसा माहौल हो गया। घुनी, पेडर, जोखना और आला गांव में स्थानीय ग्रामीणों ने पलक-पावड़े बिछाकर मां नंदा की अगवानी की। पहाड़ की पारंपरिक रीतियों के अनुसार मां को अर्घ्य दिया गया, धियाणियों ने मां को पोटली भेंट की और नम आंखों से सुख-समृद्धि का आशीर्वाद मांगा। यात्रियों के स्वागत और सत्कार के लिए इन गांवों के लोगों ने अपने घरों के दरवाजे खोल दिए हैं।

दोस्तो गांवों की सीमा समाप्त होने के बाद अब यह यात्रा सबसे कठिन, ऊंचे और दुर्गम हिमालयी क्षेत्रों में प्रवेश कर रही है। आने वाले दिनों में यह कारवां मखमली घास के मैदानों यानी बेदनी बुग्याल से होते हुए पातर नचौनियां पहुंचेगा। इसके बाद श्रद्धालुओं की असली परीक्षा होगी, जब वे 4,500 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर स्थित कंकालों की रहस्यमयी झील रूपकुंड को पार करेंगे। इसके बाद सबसे खतरनाक ज्यूंरागली पास (4,620 मीटर) की खड़ी चढ़ाई को पार कर यह यात्रा 30 सितंबर 2026 को अपने अंतिम गंतव्य होमकुंड पहुंचेगी, जहां महायज्ञ के बाद मां नंदा को उनके ससुराल कैलाश के लिए विदा कर दिया जाएगा। दोस्तो मां नंदा की यह यात्रा सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह हिमालय की कठोर भौगोलिक परिस्थितियों के बीच रहने वाले लोगों के अटूट विश्वास, संस्कृति और भाईचारे का सबसे बड़ा प्रतीक है। कड़कड़ाती ठंड और दुर्गम रास्तों की परवाह किए बिना हजारों श्रद्धालु जिस तरह मां की डोली के पीछे चल रहे हैं, वो इंसानी हौसले और श्रद्धा की अद्भुत मिसाल है। हम मां नंदा से यही प्रार्थना करते हैं कि सभी श्रद्धालुओं की यह कठिन यात्रा सकुशल संपन्न हो और मां का आशीर्वाद देवभूमि पर हमेशा बना रहे।अगर आप भी इस पावन यात्रा के साक्षी बनना चाहते हैं या घर बैठे मां नंदा के दर्शन करना चाहते हैं, तो इस वीडियो को लाइक और शेयर जरूर करें। कमेंट बॉक्स में ‘जय मां नंदा’ लिखना न भूलें।