मंत्री के बयान से बवाल! अब क्या करेगी सरकार? | Ganesh Joshi | Sunil Uniyal Gama | Uttarakhand News

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दोस्तो उत्तराखंड की सबसे हॉट और वीआईपी मानी जाने वाली मसूरी विधानसभा सीट पर इस बार चुनाव बाहर से नहीं, बल्कि भीतर से लड़ा जा रहा है! 15 साल से अजेय रहे कबीना मंत्री गणेश जोशी के इस अभेद्य गढ़ में सेंध किसी विरोधी ने नहीं, बल्कि बीजेपी के ही पूर्व मेयर सुनील उनियाल गामा ने लगा दी है। कैसे सैन्य धाम में एंट्री को लेकर शुरू हुआ यह घमासान अब सीधे तौर पर 2027 की टिकट की महाजंग में तब्दील हो चुका है। बताउंगा आपको पूरी खबर कैसे मसूरी में घमासान से बीजेपी की बढीं टेशन। दोस्तो आप ये दो चेहरे देख रहे हैं, ये वो दो चेहरे हैं इनकी वजह से चुनाव से ठीक पहले बीजेपी हाईकमान भी पसीना-पसीना है। दोस्तो लड़ाई इन दोनों चेहरों की नहीं है, बल्कि इसके पीछे छिपा है मसूरी का वो पेचीदा जातीय और राजनीतिक समीकरण, जो अगर थोड़ा भी हिला, तो बीजेपी के पैर उखड़ना तय है। वहीं, कोने में बैठी कांग्रेस इस भीतरी आत्मघाती जंग को देखकर मुस्कुरा रही है, तो क्या बीजेपी आलाकमान इस सुलगत ज्वालामुखी को शांत कर पाएगा या मसूरी की ये बगावत पूरी सरकार के लिए मटियामेट साबित होगी? दोस्तो उत्तराखंड चुनाव भले ही 2027 में होने हों, लेकिन देहरादून की मसूरी विधानसभा सीट पर चुनावी विसात अभी से बिछ चुकी है। यह सीट उत्तराखंड की उन चुनिंदा सीटों में से है जो सत्ता का रुख तय करती हैं, लेकिन इस बार मसूरी में बीजेपी की राह आसान नहीं है, क्योंकि पार्टी के अंदर एक ऐसा द्वन्द्व छिड़ चुका है जिसने शीर्ष नेतृत्व की रात की नींद उड़ा दी है। एक तरफ हैं गणेश जोशी, जो लगातार चार बार से विधायक हैं, धामी सरकार में कद्दावर मंत्री हैं और इस क्षेत्र में अपना एक मजबूत एकछत्र साम्राज्य रखते हैं। वहीं दोस्तो दूसरी तरफ उन्हें खुली चुनौती दे रहे हैं पार्टी के ही कद्दावर नेता और देहरादून के पूर्व मेयर सुनील उनियाल गामा, जो साफ कह चुके हैं कि चार बार विधायक रहने के बाद अब गणेश जोशी को आराम करना चाहिए और टिकट पर उनका हक बनता है।

दोस्तो क्या आप जानते हैं कि आखिर क्यों गामा इस सीट पर अपनी दावेदारी इतनी मजबूती से ठोक रहे हैं? इसके पीछे क्या है कारण, इसको जरा ऐसा समझिए कि ये मसूरी का सोशल इंजीनियरिंग और जातीय समीकरण। ठाकुर-ब्राह्मण का दबदबा, उत्तराखंड की बाकी सीटों की तरह यहाँ भी सवर्ण मतदाता (ठाकुर और ब्राह्मण) सबसे बड़ी निर्णायक भूमिका में हैं। गणेश जोशी खुद ठाकुर समुदाय से आते हैं और इस वोट बैंक पर उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है। दोस्तो दूसरी अहम बात ब्राह्मण कार्ड का गणित, सुनील उनियाल गामा ब्राह्मण चेहरे के तौर पर खुद को पेश कर रहे हैं। पार्टी के पारंपरिक ब्राह्मण और व्यापारी वोट बैंक के सहारे गामा, गणेश जोशी के किले को ढहाने का ताना-बाना बुन रहे हैं। इसके आगे अगर चलते हैं तो आपको दिखाई देगा। गोरखा और दलित वोटर्स। मसूरी में लगभग 15% से अधिक अनुसूचित जाति (SC) और एक बड़ा हिस्सा गोरखा समुदाय का है। गणेश जोशी का गोरखा समुदाय में खासा प्रभाव रहा है, लेकिन लगातार एंटी-इंकंबेंसी (सत्ता विरोधी लहर) के कारण इस वोट बैंक में बिखराव का खतरा मंडरा रहा है। अब दोस्तो इस टिकट की जंग ने तब बेहद आक्रामक रूप ले लिया जब मंत्री गणेश जोशी ने कैमरे पर गामा को ‘खाली नेता’ कह डाला। राजनीतिक पंडितों का मानना है कि सैन्य धाम के बहाने गामा ने सीधे गणेश जोशी के विभाग में भ्रष्टाचार का मुद्दा उठाकर आलाकमान को यह संदेश देने की कोशिश की है कि अब वर्तमान विधायक का चेहरा बदलने की जरूरत है।

वहीं दोस्तो अब सवाल ये है कि बीजेपी आलाकमान क्या करेगा?बीजेपी के राष्ट्रीय नेतृत्व के सामने यह ‘कुआं और खाई’ जैसी स्थिति है वो इसलिए कहा जा सकता है कि अगर गणेश जोशी का टिकट काटा तो लगातार चार बार के विजेता का टिकट काटने से उनके समर्थक बागी हो सकते हैं, जिससे पूरी सीट तो जाएगी ही, साथ ही आस-पास की सीटों पर भी असर पड़ेगा। गामा को नजरअंदाज किया तो: पूर्व मेयर गामा का अपना एक मजबूत कैडर है। अगर उन्हें शांत नहीं किया गया, तो वे भीतरघात के जरिए गणेश जोशी की नैया डुबोने की पूरी ताकत रखते हैं। दोस्तो इधर कांग्रेस के लिए बहती गंगा में बड़ा मौका दिखाई देने लगा है क्योंकि बीजेपी के इसी आत्मघाती गृहयुद्ध में कांग्रेस को 15 साल बाद अपनी वापसी की उम्मीदें दिखाई दे रही हैं। पिछले दो चुनावों (2017 और 2022) में कांग्रेस की गोदावरी थापली ने गणेश जोशी को कड़ी टक्कर दी थी, हालांकि वे 12 हजार और 15 हजार वोटों के अंतर से चुनाव हार गईं। लेकिन दोस्तो इस बार कांग्रेस का गणित सीधा है—अगर बीजेपी के भीतर ठाकुर-ब्राह्मण वोटों की यह जंग लंबी खिंचती है और गामा या जोशी समर्थकों में से कोई भी एक-दूसरे को हराने के लिए भीतरघात करता है, तो कांग्रेस का पारंपरिक दलित, मुस्लिम और असंतुष्ट सवर्ण वोट बैंक एकजुट होकर कांग्रेस को जीत की दहलीज पार करा सकता है। दोस्तो मसूरी की यह जंग अब सिर्फ एक विधानसभा क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि यह उत्तराखंड बीजेपी के भीतर की उस अंदरूनी कलह का चेहरा बन चुकी है जिसे पार्टी हमेशा छुपाने की कोशिश करती है। चुनावी समर के मुहाने पर खड़े राज्य में अगर अपने ही सेनापति आपस में तलवारें भांजेंगे, तो किला ढहना तय है। अब देखना यह होगा कि दिल्ली दरबार इस बगावत को दबाने के लिए क्या हंटर चलाता है, या फिर मसूरी की जनता इस बार इस भीतरी घमासान का फायदा उठाकर इतिहास बदलने का मन बना चुकी है!