दोस्तो, मां नंदा की बड़ी जात पूरी हुई, सभी अपने-अपने घर और गांव लौट गए, लेकिन कैलाश की ओर जाने वाला चौसिंग्या खाड़ू अब अकेला है!पीठ पर श्रृंगार की पोटली लादे ये चौसिंग्या खाड़ू आखिर कहां जा रहा है? क्या ये सिर्फ एक परंपरा है, या मां नंदा का दूत बनकर कैलाश की ओर बढ़ने की सदियों पुरानी मान्यता?और सबसे बड़ा सवाल—बर्फीले पहाड़ों पर बिना इंसानी मदद के इसकी यात्रा कैसे पूरी होती है? जानिए चौसिंग्या खाड़ू से जुड़ी इस रहस्यमयी परंपरा की पूरी कहानी। दोस्तो मां नंदा देवी बड़ी जात यात्रा संपन्न हो चुकी है। सभी भक्त, डोलियां और देव-निशान पहाड़ों से नीचे अपने-अपने घरों और गांवों की ओर लौट आए हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि उस 16 हजार फीट ऊंचे, हाड़ कंपा देने वाले निर्जन और बर्फीले होमकुंड में पीछे कौन अकेला रह गया? जी हां, वह है मां नंदा का सबसे वफादार दूत— चौसिंग्या खाडू! चार सींगों वाला एक ऐसा अनोखा जीव जो इंसानों के बीच जन्म लेता है, लेकिन जिसकी नियति केवल कैलाश पर्वत है। अक्सर लोग इंटरनेट पर कंफ्यूज रहते हैं कि होमकुंड में छोड़े जाने के बाद इस बेजुबान का आखिर क्या होता है? क्या वह जंगली जानवरों का शिकार हो जाता है, या फिर साक्षात महादेव के चरणों में पहुंच जाता है? गढ़वाली भाषा में भेड़ या मेढ़े को ‘खाडू’ कहा जाता है, और चार सींग होने के कारण इसे ‘चौसिंग्या खाडू’ नाम दिया गया है। जब भी 12 साल में मां नंदा की राजजात (बड़ी जात) होती है, तो उससे ठीक पहले कुदरती रूप से इस अनोखे जीव का जन्म चमोली के किसी गांव में होता है। यात्रा को लेकर सबसे बड़ा कंफ्यूजन इंटरनेट पर यह फैला है कि क्या होमकुंड पहुंचने पर इस बेजुबान जीव की बलि चढ़ा दी जाती है? कुछ लोग यह भी सोचते हैं कि दुर्गम पहाड़ों पर उसे लावारिस मरने के लिए छोड़ दिया जाता है, लेकिन सच इससे कोसों दूर और बेहद अलौकिक है। नंदा देवी राजजात में बलि की कोई परंपरा नहीं है, बल्कि यह यात्रा तो एक लाडली बेटी की विदाई का उत्सव है।
दोस्तो मां नंदा की विग्रह डोली जब 280 किलोमीटर का बेहद कठिन सफर तय करके समुद्र तल से 16,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित होमकुंड पहुंचती है, तो वहां अंतिम यज्ञ किया जाता है। यही वो जगह है जहाँ इंसानों की सीमा खत्म हो जाती है, इसके आगे इंसान नहीं जा सकते यहाँ चौसिंग्या खाडू की पीठ पर दो थैलियां (पोटली) बांधी जाती हैं, जिसमें मायके वालों की तरफ से मां नंदा के लिए दिया गया श्रृंगार का सामान, वस्त्र, आभूषण और रोली-पिठ्याँ (भेंट) रखी होती हैं। पूजा संपन्न होते ही पुरोहित इस खाडू को आशीर्वाद देकर स्वतंत्र छोड़ देते हैं। यहीं से शुरू होती है वो कहानी, जो विज्ञान को भी सोचने पर मजबूर कर देती है। दोस्तो जैसे ही चौसिंग्या खाडू को आजाद किया जाता है, वह पीछे मुड़कर इंसानों की तरफ नहीं देखता, बिना किसी इंसानी मदद या इशारे के, वह बेहद तेजी से खड़ी बर्फीली चट्टानों और त्रिशूल पर्वत की चोटियों की तरफ अकेले ही दौड़ने लगता है। स्थानीय लोगों और कई चश्मदीदों का दावा है कि कुछ दूरी तक तो यह खाडू सफेद बर्फ पर चलता हुआ साफ दिखाई देता है, लेकिन फिर पलक झपकते ही रहस्यमयी तरीके से आंखों से ओझल (गायब) हो जाता है।
दोस्तो पौराणिक कहानियां भी हैं लोक मान्यता यह है कि यह कोई साधारण जानवर नहीं बल्कि स्वयं भगवान शिव का वाहन या मां नंदा का देव-रथ है। वो इस श्रृंगार की पोटली को सीधे कैलाश पर्वत पर विराजमान महादेव और माता पार्वती तक सुरक्षित पहुंचाता है। वहीं दोसतो कुछ लोग इसे प्रकृति का नियम मानते हैं कि यह उच्च-ऊंचाई वाले पर्वतीय क्षेत्रों का जीव है, जो इंसानी बस्ती से दूर अपने प्राकृतिक निवास की ओर चला जाता है। लेकिन इतनी कड़ाके की ठंड और बिना घास-पानी के वह त्रिशूल की चोटियों पर कैसे जीवित रहता है, इसका कोई भौतिक या वैज्ञानिक प्रमाण आज तक नहीं मिल सका है। दोसतो जब नंदा के भक्त नम आंखों से अपने-अपने घरों को लौट आते हैं, तो कैलाश की उन अनंत गहराइयों में केवल चौसिंग्या खाडू ही मां नंदा के साथ उनकी परछाई बनकर रह जाता है। यही देवभूमि की वो अटूट आस्था है, जहाँ एक बेजुबान जानवर भी भक्त और भगवान के बीच का सबसे पवित्र माध्यम बन जाता है। इसके अलावा भी कुछ और है तो कमेंट में आप बता सकते हैं लेकिन दोस्तो यही है चौसिंग्या खाडू की वो अनसुनी और अलौकिक दास्तान जो सदियों से हिमालय के सीने में दफन है। जब पूरी दुनिया विज्ञान के तराजू पर हर चीज को तौलती है, तब उत्तराखंड की ये परंपराएं साक्षात चमत्कार बनकर सामने खड़ी हो जाती हैं। आपको चौसिंग्या खाडू के गायब होने का यह रहस्य कैसा लगा, हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।