दोस्तो चुनावी वादे या सिर्फ छलावा? एक मां की पीठ पर मासूम बच्चा, सामने उफनती नदी और पार करने के लिए न पुल, न कोई सुरक्षित रास्ता! ये तस्वीर उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल के थलीसैंण की है, जहां ग्रामीणों का दावा है कि वे पिछले 10 साल से पुल का इंतजार कर रहे हैं। चुनाव आते हैं, वादे होते हैं, लेकिन नदी पर पुल आज तक नहीं बना! आखिर इन ग्रामीणों की सुध कौन लेगा? क्या सिस्टम किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है? देखिए विकास के दावों के बीच थलीसैंण की ये जमीनी हकीकत! दोस्तो देवभूमि उत्तराखंड के विकास के उन दावों का सच दिखाने जा रहे हैं, जिन्हें सुनकर और देखकर आपकी रूह कांप जाएगी और व्यवस्था से आपका भरोसा उठ जाएगा। दोस्तो पौड़ी गढ़वाल के थलीसैंण क्षेत्र से एक ऐसी विचलित करने वाली तस्वीर सामने आई है, जिसने सरकार और स्थानीय प्रशासन के तमाम दावों की सरेआम धज्जियां उड़ा दी हैं। दोस्तो इस वीडियो में एक बेबस मां अपने छोटे से मासूम बच्चे को पीठ पर लादकर, अपनी जान हथेली पर रखकर उफनती हुई नदी को पार करने पर मजबूर है। हैरान करने वाली बात यह है कि इस इलाके के ग्रामीण पिछले 10 साल से एक अदद पुल का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन हर बार उन्हें मिलती है तो सिर्फ नेताओं की खोखली बयानबाजी। आखिर इन ग्रामीणों की सुध कब ली जाएगी? अगर नदी पार करते समय कोई अनहोनी हो गई, तो उसका जिम्मेदार कौन होगा? यह तस्वीर किसी एडवेंचर स्पोर्ट्स की नहीं है और न ही यह किसी फिल्म की शूटिंग है। यह उत्तराखंड के पौड़ी जिले के थलीसैंण क्षेत्र की वो खौफनाक जमीनी हकीकत है, जो हमारे सिस्टम के मुंह पर एक करारा तमाचा है।
गौर से देखिए इस बेबस मां को, जो अपने जिगर के टुकड़े को पीठ पर कपड़े से बांधकर पत्थरों के बीच से बहती तेज नदी को पार कर रही है। एक छोटी सी चूक, एक गलत कदम और माँ-बेटे दोनों की जिंदगी हमेशा के लिए खत्म हो सकती है। दोस्तो यह कोई एक दिन की मजबूरी नहीं है। थलीसैंण क्षेत्र के कई गांवों के लोग पिछले 10 साल से सरकार और लोक निर्माण विभाग के चक्कर काट रहे हैं। ग्रामीणों का कसूर सिर्फ इतना है कि वे हर चुनाव में नेताओं की बातों पर भरोसा कर लेते हैं कि इस बार उनके गांव की नदी पर पुल बन जाएगा। लेकिन चुनाव बीतते ही नेता गायब हो जाते हैं, फाइलें धूल फांकने लगती हैं और जनता को छोड़ दिया जाता है इसी तरह रोज मौत से दो-दो हाथ करने के लिए कछ सवाल हैं। सवाल न.-1, पहाड़ों में अरबों रुपये के विकास के दावों के बीच 10 साल में एक छोटा सा पुल क्यों नहीं बन पाया? सवाल न. 2, क्या सरकार को जनता की जान की कोई कीमत नहीं लगती, या किसी बड़े हादसे का इंतजार हो रहा है? सवाल 3, गर्भवती महिलाओं, स्कूल जाने वाले बच्चों और बीमार बुजुर्गों के लिए आपातकाल में क्या व्यवस्था है? दोस्तो जब भी इस बदहाली पर प्रशासनिक अधिकारियों या स्थानीय जनप्रतिनिधियों से बात की जाती है, तो उनका रटा-रटाया जवाब सामने आता है। प्रशासन का दावा होता है कि ‘पुल का प्रस्ताव शासन को भेजा जा चुका है, बजट की स्वीकृति मिलते ही काम शुरू कर दिया जाएगा।’ लेकिन सवाल यह है कि क्या बजट पास होने की कछुआ चाल से चलने वाली प्रक्रिया में 10 साल का समय भी कम पड़ जाता है? क्या पहाड़ों का विकास सिर्फ कागजों पर और बड़े शहरों की होर्डिंग्स तक ही सीमित रह गया है? दोस्तो ग्रामीणों का गुस्सा अब सातवें आसमान पर है। उनका कहना है कि बरसात हो या ठंड का मौसम, हर वक्त नदी पार करना एक खौफनाक सपना जैसा है। बच्चों की पढ़ाई छूट जाती है और इलाज के अभाव में लोग दम तोड़ देते हैं। अब ग्रामीणों ने साफ चेतावनी दे दी है कि अगर जल्द ही पुल का निर्माण शुरू नहीं हुआ, तो वे उग्र आंदोलन को मजबूर होंगे। दोस्तो “पीठ पर बच्चा लादकर नदी पार करती इस मां की तस्वीर केवल एक महिला की बेबसी नहीं, बल्कि उत्तराखंड के पूरे सिस्टम की नाकामी का जीता-जागता सबूत है। उम्मीद है कि इस आंखें खोल देने वाली रिपोर्ट के बाद देहरादून की वातानुकूलित कुर्सियों पर बैठे हुक्मरानों की नींद टूटेगी और थलीसैंण के इन ग्रामीणों को अगले 10 साल और मौत के सफर पर नहीं जाना पड़ेगा।