Badrinath के सिर पर खतरे की आहट । Hanging Glaciers । Glacier । Alert Avalanche । Uttarakhand News

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जी हां दोस्तो क्या बदरीनाथ धाम के सिर पर मंडरा रहा है कुदरत का बड़ा खतरा! पहाड़ों की चोटियों पर लटके विशाल ग्लेशियर और वैज्ञानिकों की ऐसी चेतावनी, जिसने सबकी चिंता बढ़ा दी है! सवाल है—क्या 280 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से आने वाला संभावित हिमस्खलन बदरीनाथ की सैकड़ों इमारतों को अपनी चपेट में ले सकता है? वैज्ञानिकों की रिपोर्ट में करीब 398 इमारतों और हेलीपैड पर खतरे का आकलन किया गया है। लेकिन क्या यह खतरा तत्काल है या भविष्य की चेतावनी? आखिर बदरीनाथ के ऊपर ऐसा क्या है, जिसने वैज्ञानिकों को अलर्ट किया है? देखिए यह पूरी रिपोर्ट। दोस्तो, देवभूमि उत्तराखंड के चारों धामों में से एक, करोड़ों हिंदुओं की आस्था के केंद्र बदरीनाथ धाम से इस वक्त की सबसे बड़ी, सबसे चौंकाने वाली और डरा देने वाली खबर सामने आ रही है! क्या ग्लोबल वॉर्मिंग और क्लाइमेट चेंज मिलकर बदरीनाथ धाम को किसी महा-विनाश की तरफ धकेल रहे हैं? क्या बदरीनाथ टाउनशिप के सिर पर प्रकृति ने एक ऐसा टाइम बम फिट कर दिया है जो कभी भी फट सकता है? दोस्तो यह बेहद गंभीर और झकझोर देने वाली चेतावनी किसी ज्योतिषी ने नहीं, बल्कि देश और दुनिया के चोटी के वैज्ञानिकों ने दी है! इंटरनेशनल जर्नल ‘लैंडस्लाइड्स’ में प्रकाशित एक ताजा और विस्फोटक रिसर्च रिपोर्ट ने पूरी उत्तराखंड सरकार से लेकर दिल्ली तक हड़कंप मचा दिया है! इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc) बेंगलुरु, डीआरडीओ (DRDO) और कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों की इस संयुक्त स्टडी ने खुलासा किया है कि बदरीनाथ धाम के ठीक ऊपर पहाड़ों पर तीन महाविशाल ‘हैंगिंग ग्लेशियर’ यानी लटकते हुए हिमनद मौत बनकर मंडरा रहे हैं! अगर ये ग्लेशियर अपनी जगह से टूटे, तो 280 किलोमीटर प्रति घंटे की खौफनाक रफ़्तार से आने वाला बर्फीला तूफान बदरीनाथ की करीब 400 इमारतों, सड़कों, पुलों और हेलीपैड को पल भर में मलबे के ढेर में तब्दील कर सकता है! दोस्तो आखिर क्या है वैज्ञानिकों की इस ‘डूम्सडे रिपोर्ट’ का पूरा सच? क्या मुख्य बदरीनाथ मंदिर भी इस खतरे की जद में है? दोस्तो, साल 2025 की चारधाम यात्रा के दौरान करीब 17 लाख से ज्यादा श्रद्धालुओं की मेजबानी करने वाला बदरीनाथ धाम इस वक्त प्रकृति के सबसे संवेदनशील चक्रव्यूह में फंसा हुआ है। समुद्र तल से करीब 3,415 मीटर की ऊंचाई पर बसी इस खूबसूरत टाउनशिप के ऊपर, करीब 4,700 से 5,465 मीटर की ऊंचाई पर पहाड़ों की खड़ी ढलानों पर तीन ऐसे ग्लेशियर लटके हैं, जिनका निचला आधार पूरी तरह खोखला हो रहा है। दोस्तो वैज्ञानिकों के मुताबिक, ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण इन ग्लेशियरों की पहाड़ों पर पकड़ कमजोर हो रही है, जिससे कभी भी एक महा-हिमस्खलन यानी आइस एवलांच की स्थिति पैदा हो सकती है। दोस्तो वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर सिमुलेशन के जरिए जो ‘वर्स्ट-केस सिनेरियो’ यानी सबसे विनाशकारी स्थिति का मॉडल तैयार किया है, उसके आंकड़े रोंगटे खड़े करने वाले है इस रिपोर्ट के मुताबिक, दोस्तो अगर ‘साइट-2’ का यह ग्लेशियर टूटता है, तो इसकी जद में बदरीनाथ टाउनशिप की 398 इमारतें आ जाएंगी।

दोस्तो यही नहीं, बदरीनाथ का मुख्य हेलीपैड, करीब ढाई किलोमीटर से ज्यादा लंबी सड़कें, पार्किंग जोन और दो मुख्य पुल पूरी तरह से तबाह हो सकते हैं। हालांकि, राहत की बात यह है कि मुख्य बदरीनाथ मंदिर के इस एवलांच की सीधी चपेट में आने की आशंका नहीं है, लेकिन इसके बावजूद तबाही के बाद आने वाला भारी मलबा और चट्टानें मंदिर के आसपास के सुरक्षा घेरे को भारी नुकसान पहुंचा सकती हैं। यहां दोस्तो गौर करने वाली बात ये है कि अलकनंदा के इस पूरे जलग्रहण क्षेत्र में करीब 219 लटकते हुए हिमनद मौजूद हैं, जिनमें से 30 फीसदी बेहद संवेदनशील और अस्थिर माने जा रहे हैं। वैज्ञानिकों ने चेताया है कि केवल बर्फ का आयतन ही नहीं, बल्कि पहाड़ों के नीचे बने संकरे रास्ते भी छोटे से एवलांच को बेहद खतरनाक बना देते हैं। इस वैज्ञानिक चेतावनी के बाद अब गेंद राज्य और केंद्र सरकार के पाले में है। वैज्ञानिकों ने साफ शब्दों में सिफारिश की है कि बदरीनाथ में तुरंत ‘नो-बिल्ड जोन’ यानी निर्माण प्रतिबंधित क्षेत्र लागू किया जाए, लैंड-यूज प्लानिंग को सुधारा जाए और ग्लेशियरों की निगरानी के लिए एक ‘अर्ली वॉर्निंग सिस्टम’ यानी पूर्व चेतावनी प्रणाली स्थापित की जाए। दोस्त तो आपने देखा, केदारनाथ की 2013 की त्रासदी के जख्म अभी पूरी तरह भरे भी नहीं हैं कि बदरीनाथ धाम के सिर पर मंडराते इन ‘हैंगिंग ग्लेशियरों’ ने एक और बड़े खतरे का अलार्म बजा दिया है। वैज्ञानिकों ने तो अपना काम कर दिया है और खतरे का पूरा ब्लूप्रिंट सरकार के सामने रख दिया है। अब देखना यह होगा कि उत्तराखंड का शासन और प्रशासन इस वैज्ञानिक चेतावनी को कितनी गंभीरता से लेता है, या फिर हमेशा की तरह किसी बड़ी आपदा के आने का इंतजार किया जाता रहेगा।