जिस ऐपण कला को कभी पहाड़ की देहरी और आंगन तक सीमित माना जाता था, आज वही कला डिजिटल दुनिया में अपनी पहचान बना रही है! मिट्टी के दीयों पर गेरू और बिस्वार की खूबसूरत आकृतियां और इनके पीछे हैं उत्तराखंड के वो युवा, जिन्होंने अपनी परंपरा को कारोबार का नया रूप देने की पहल की है।किसी ने ऐपण को सोशल मीडिया के जरिए नई पहचान दी, तो किसी ने अपना ब्रांड बनाकर देशभर के बाजारों तक पहुंचाया। सवाल है कि आखिर कैसे पहाड़ की सदियों पुरानी लोककला डिजिटल मार्केट तक पहुंची? कौन हैं वो युवा चेहरे, जो अपनी संस्कृति को नई पीढ़ी से जोड़ रहे हैं? और क्या ऐपण कला पहाड़ में स्वरोजगार का नया रास्ता बन सकती है? आज बात ऐपड़ की। दोस्तो जब कोई संस्कृति मरती है, तो उस समाज की पहचान खो जाती है। लेकिन जब उस संस्कृति को बचाने की जिम्मेदारी देश की युवा पीढ़ी अपने कंधों पर उठा ले, तो वो इतिहास रच देती है! उत्तराखंड की सदियों पुरानी। देवभूमि के कण-कण में रची-बसी ‘ऐपण कला’, जो कभी केवल त्योहारों पर घर के आंगनों तक सिमट कर रह गई थी, आज वो एक ग्लोबल ब्रांड बन चुकी है! दोस्तो इस बार दीपावली पर चीनी लाइट्स और प्लास्टिक के दीयों को खदेड़ने के लिए पहाड़ की बेटियों और युवाओं ने कमर कस ली है! मिट्टी के साधारण दीयों पर जब गेरू का लाल रंग और चावल के बिस्वार की सफेद लकीरें उतरती हैं, तो वो सिर्फ एक दीया नहीं रह जाता, बल्कि हमारी आस्था का जीवंत दस्तावेज बन जाता है! आखिर क्या है इस अद्भुत ऐपण कला का प्रागैतिहासिक इतिहास? और कौन हैं उत्तराखंड के वो जांबाज युवा, जो पलायन को ठेंगा दिखाकर आज इस विरासत को करोड़ों के बाजार में बदल चुके है।
दोस्तो उत्तराखंड की माटी की खुशबू और यहां की अनमोल लोक विरासत आज पूरी दुनिया को सम्मोहित कर रही है। देवभूमि की पारंपरिक ऐपण कला अब केवल घरों की चौखटों तक महदूद नहीं है। कुमाऊं की इस दिव्य कला से सजे मिट्टी के दीये देश के कोने-कोने में पहुंचने के लिए तैयार हैं। इस बार की दीपावली स्वदेशी, स्वावलंबन और संस्कृति के इसी अनूठे संगम से जगमगाने वाली है। दोस्तो आइए सबसे पहले आपको बताते हैं कि ऐपण का इतिहास क्या है। ऐपण का इतिहास क्या है? ‘ऐपण’ शब्द संस्कृत के ‘अर्पण’ से निकला है, जिसका अर्थ होता है लिखना या समर्पित करना। इस कला की उत्पत्ति प्रागैतिहासिक काल से मानी जाती है और उत्तराखंड के चंद राजवंश के शासनकाल में इस कला को राजाश्रय मिला और इसका जबरदस्त विकास हुआ। दोस्तो यह केवल एक कला नहीं, बल्कि एक तांत्रिक और आध्यात्मिक साधना है, जिसमें ज्यामितीय आकृतियों, डॉट्स और लाइनों के जरिए भगवान का आह्वान किया जाता है। जन्म, मुंडन, जनेऊ से लेकर विवाह और मृत्यु तक, कुमाऊं में हर संस्कार ऐपण के बिना अधूरा है।
(मीनाक्षी खाती की तस्वीरें (‘सेल्फी विद ऐपण’ अभियान)। पिथौरागढ़ की युवा उद्यमी मानसी कपरी और अल्मोड़ा की सुजाता बिष्ट (‘कुमाऊँ ऐपण’ ब्रांड) अपने उत्पादों का प्रदर्शन करते हुए। नैनीताल में स्तुति पंत महिलाओं को ट्रेनिंग देते हुए) दोस्तो एक समय था जब यह कला लुप्त होने की कगार पर थी। लेकिन आज उत्तराखंड की नई पीढ़ी इस धरोहर की रक्षक बनकर सामने आई है। नैनीताल की ‘ऐपण गर्ल’ के नाम से मशहूर मीनाक्षी खाती ने “सेल्फी विद ऐपण” अभियान चलाकर हजारों युवाओं को इससे जोड़ा। पिथौरागढ़ की मानसी कपरी ने उच्च शिक्षा के साथ ‘देवभूमि उद्यमिता योजना’ के सहयोग से इसे एक सफल बिजनेस मॉडल में बदल दिया। इतना ही नहीं दोस्तो अल्मोड़ा की सुजाता बिष्ट अपने ‘कुमाऊँ ऐपण’ ब्रांड के जरिए देश के कोने-कोने में ऑनलाइन ऑर्डर सप्लाई कर रही हैं, तो नैनीताल की स्तुति पंत गांव-गांव जाकर स्वयं सहायता समूहों को ट्रेनिंग दे रही हैं ताकि पहाड़ों से पलायन रुके। दोस्तो आज इस पारंपरिक कला को प्रमोट करने का अंदाज बिल्कुल आधुनिक हो चुका है। युवा कलाकारों ने इसे केवल मिट्टी और दीवारों से उठाकर कैनवास, कपड़ों, डायरियों, मोबाइल कवर और होम डेकोर के प्रोडक्ट्स पर उतार दिया है। इंस्टाग्राम रील और सोशल मीडिया के जरिए इस कला की रीच ग्लोबल हो गई है। सरकार के ‘राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन’ और जिला उद्योग केंद्रों की मदद से आज इसे ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर जगह मिल रही है, जिससे पहाड़ों की महिलाओं को हर महीने सम्मानजनक आजीविका मिल रही है। दोस्तो इन युवाओं का यह जज्बा साबित करता है कि जड़ें कितनी भी पुरानी हों, अगर उन्हें नई सोच का पानी मिले, तो वो दोबारा हरी-भरी हो जाती हैं। मिट्टी के ये दीये सिर्फ रोशनी नहीं करेंगे, बल्कि हमारी आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़े रखेंगे। इस त्योहारी सीजन में, जब आप अपने घरों को सजाएं, तो पहाड़ के इन युवाओं और महिलाओं के हुनर को जरूर तरजीह दें। देवभूमि की इस गौरवशाली ऐपण यात्रा पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट करके जरूर बताएं।