दोस्तो 11,004 फीट की वो जमा देने वाली ऊंचाई, जहाँ इंसानी बस्तियाँ खत्म हो जाती हैं और प्रकृति भी मौन होकर घुटने टेक देती है! आज उसी पावन धरा पर देवलोक उतर आया है। जी हाँ, चमोली की दुर्गम वादियों से शुरू हुई मां नंदा की पावन लोकजात आज अपने सबसे अलौकिक और सबसे भावुक पड़ाव—पवित्र वेदनी कुंड पहुँच चुकी है! यह वो कुंड है, जहाँ साक्षात महादेव की मौजूदगी में आज देवी-देवताओं का महास्नान होने जा रहा है। कहते हैं इसी कुंड में आदिशक्ति ने महिषासुर का वध कर उसे दफन किया था। आज जब धर्मभाई लाटू देवता की अगुवाई में मां नंदा की डोली मायके से ससुराल यानी कैलाश के निर्जन रास्तों की ओर बढ़ी, तो हज़ारों श्रद्धालुओं की आँखें फूट-फूट कर रो पड़ीं! आखिर क्या है 11 हज़ार फीट की ऊंचाई पर होने वाले इस महास्नान का रहस्य? क्यों यहाँ आते ही रो पड़ता है पूरा पहाड़? देखिए पूरी खबर। दोस्तो 10 वीं हजार फीट की वो बेजोड़ ऊंचाई, जहां इंसानी आबादी पीछे छूट चुकी है और प्रकृति मौन है! आज शुक्रवार को मां नंदा की लोकजात अपने सबसे भावुक और अलौकिक पड़ाव—वेदनी कुंड पहुंच चुकी है। जहां साक्षात महादेव की मौजूदगी में देवताओं का महास्नान हो रहा है। आखिर क्या है इस कुंड का महिषासुर से जुड़ा वो खौफनाक सच सब कुछ इस रिपोर्ट में आगे है। दोस्तो जब इंसानी बस्तियां खत्म हो जाती हैं, जहां से आगे सिर्फ घने देवदार के जंगल, मखमली घास के मैदान और बादलों को छूते बर्फीले पहाड़ बचते हैं। वहां से शुरू होता है आस्था का वो सफर, जिसकी कल्पना भी रोंगटे खड़े कर देती है!जी हां, चमोली के देवाल क्षेत्र से शुरू हुई मां नंदा की पावन लोकजात यात्रा आज अपने उस मुकाम पर पहुंच चुकी है, जिसे इस पूरी कैलाश यात्रा का सबसे पवित्र और भावुक दिल माना जाता है। कल गुरुवार को ‘गेरौली पातल’ की निर्जन वादियों में रात बिताने के बाद, आज यानी शुक्रवार को मां नंदा की डोली समुद्र तल से 11,004 फीट की ऊंचाई पर स्थित ऐतिहासिक वेदनी बुग्याल पहुंच चुकी है। आज वेदनी कुंड में वो चमत्कारिक स्नान होने जा रहा है, जिसे देखने के लिए देवलोक से भी देवता तरसते हैं!
दोस्तो उच्च हिमालय की दुर्गम और पथरीली राहों को नापते हुए श्रद्धालु आज जब वेदनी बुग्याल पहुंचे, तो वहां का नजारा अद्भुत था। एक तरफ मखमली घास के मैदान और ठीक सामने सीना ताने खड़ी त्रिशूली और नंदा घुंघुटी की बर्फीली चोटियां, मानो मां नंदा की अगवानी कर रही हों। परंपरा के अनुसार इस पावन वेदनी कुंड में देवी-देवताओं के पवित्र स्नान की रस्म निभाई जा रही है। इस कुंड का पौराणिक इतिहास रोंगटे खड़े कर देने वाला है। मान्यता है कि जब मां नंदा अपने ससुराल कैलाश जा रही थीं, तब इसी जगह पर उनका सामना अत्याचारी राक्षस महिषासुर से हुआ था। मां नंदा ने इसी पावन धरा पर महिषासुर का वध किया और उसके शव को इसी वेदनी कुंड में फेंक दिया था। दोस्तो यही वजह है कि यह कुंड सिर्फ पानी का स्रोत नहीं, बल्कि साक्षात आदिशक्ति की विजय का प्रतीक है! और भक्तों में आस्था के साथ उत्साह अपार है। दोस्तो इस पड़ाव की दिव्यता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि लोकविश्वास के अनुसार, जब वेदनी कुंड में पूजा और महास्नान होता है, तो हिमालय के आराध्य भगवान शंकर स्वयं अदृश्य रूप में वहां उपस्थित रहते हैं। सिर्फ इतना ही नहीं, वेदनी कुंड में मां नंदा की पूजा के साथ-साथ एक और बेहद खास परंपरा निभाई जाती है—वह है पितरों का श्राद्ध और तर्पण। वेदनी कुंड के पुजारी बताते हैं कि इस ऊंचाई पर किया गया तर्पण सीधे पितृलोक तक पहुंचता है। इसीलिए आज श्रद्धालु अपनी कुलदेवी मां नंदा के साथ-साथ अपने पुरखों को भी याद कर भावुक हो रहे हैं। साक्षात देवलोक और पितृलोक का ऐसा मिलन दुनिया में कहीं और देखने को नहीं मिलता। दोस्तो यहां मै आपको बता दूं कि इस निर्जन और खतरनाक हिमालयी रास्ते पर आगे बढ़ने से पहले, अंतिम इंसानी आबादी वाले गांव ‘वाण’ में मां नंदा के धर्मभाई लाटू देवता ने इस यात्रा की कमान संभाली थी। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, मां नंदा ने लाटू देवता को अपना भाई मानकर आगे के इस दुर्गम और निर्जन रास्ते की अगुवाई का जिम्मा सौंपा था, जिसे लाटू आज भी बखूबी निभा रहे हैं। आज वेदनी कुंड में इस भव्य और अलौकिक पूजा के बाद, मां नंदा की यह लोकजात अपने ननिहाल देवराड़ा के लिए प्रस्थान करेगी। लोकविश्वास है कि देवराड़ा मां का मायका है, जहां वह अगले छह महीनों तक प्रवास करेंगी और क्षेत्र को खुशहाली का आशीर्वाद देंगी। यही वजह है कि वेदनी से मां की विदाई का यह क्षण हर श्रद्धालु की आंख को नम कर रहा है। दोस्तो प्रकृति, परंपरा और परमात्मा का ऐसा त्रिवेणी संगम सिर्फ और सिर्फ हमारी देवभूमि उत्तराखंड में ही मुमकिन है। 11,004 फीट की इस जमा देने वाली ठंड में भी भक्तों का यह रेला और मां नंदा के प्रति यह अटूट विश्वास हर किसी को नतमस्तक होने पर मजबूर कर देता है। धन्य है यह हिमालय और धन्य हैं इसके ये आंचल! मां नंदा की इस अलौकिक यात्रा की हर छोटी-बड़ी अपडेट के लिए जुड़े रहिए हमारे साथ।