क्या नेपाल में मची भयंकर तबाही सिर्फ एक शुरुआत थी? क्या अब अगला खतरा देवभूमि उत्तराखंड पर मंडरा रहा है? नेपाल में ग्लेशियर फटने के बाद भारत की सरहद के भीतर एक बहुत बड़ा अलर्ट जारी किया गया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उत्तराखंड के ऊंचे पहाड़ों पर मौजूद 13 ऐसी ग्लेशियल झीलों को ‘अति-संवेदनशील’ घोषित कर दिया है, जो कभी भी फूट सकती हैं। प्रशासन को रात-दिन निगरानी के निर्देश दे दिए गए हैं। आखिर ये 13 झीलें अचानक इतनी खतरनाक क्यों हो गईं? और इस आसमानी आफत को रोकने के लिए सरकार क्या कदम उठा रही है? दोस्तो तिब्बत और नेपाल के बॉर्डर पर ग्लेशियर टूटने से जो सैलाब आया, उसने सैकड़ों जिंदगियां लील लीं। नेपाल की इसी त्रासदी से सबक लेते हुए उत्तराखंड सरकार पूरी तरह मुस्तैद हो गई है। वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक झीलें तेजी से बड़ी हो रही हैं, जो पहाड़ों के नीचे रहने वाली आबादी के लिए किसी टाइम बम से कम नहीं हैं। इसी को देखते हुए, सीएम पुष्कर सिंह धामी ने राज्य के आपदा प्रबंधन विभाग को अलर्ट पर रहने का आदेश दिया है। उत्तराखंड में 426 ग्लेशियर झीलें! 13 झीलें बताई गईं खतरनाक, ‘टाइम बम’ बनी ग्लेशियर झीलें? नेपाल जैसी आपदा का खतरा! 30 करोड़ मंजूर अर्ली वार्निंग सिस्टम के लिए, 8.10 करोड़ जारी, फिर भी काम शुरू क्यों नहीं? कहां हैं सबसे बड़ा खतरा? नेपाल में ग्लेशियर झीलों से जुड़ी आपदा ने पूरे हिमालयी क्षेत्र की चिंता बढ़ा दी है।
उत्तराखंड में भी सैकड़ों ग्लेशियर झीलें मौजूद हैं, जिनमें कुछ को बेहद संवेदनशील माना गया है। सवाल ये है कि खतरे की निगरानी के लिए मंजूर फंड और अर्ली वार्निंग सिस्टम का काम आखिर कहां तक पहुंचा? क्या उत्तराखंड ऐसी किसी आपदा के लिए पूरी तरह तैयार है? सुनिए हिमालयन वाडिया इंस्टिट्यूट के निदेशक डॉ. विनीत गहलोत क्या कहते हैं। दोस्तो वैज्ञानिकों ने उत्तराखंड की इन 13 झीलों को उनके खतरे के हिसाब से अलग-अलग कैटेगरी में बांटा है। इनमें से 5 झीलें ‘A-कैटेगरी’ यानी सबसे ज्यादा जोखिम वाली श्रेणी में हैं, जिनमें से 4 पिथौरागढ़ में और 1 चमोली जिले में स्थित है। वहीं, 4 झीलें B-कैटेगरी और बाकी C-कैटेगरी में रखी गई हैं। ये वो झीलें हैं जहां पानी का दबाव बढ़ने पर साल 2013 की केदारनाथ जैसी या फिर 2021 की चमोली ऋषिगंगा जैसी आपदा का खतरा फिर से पैदा हो सकता है।
दोस्तो इधर इस बार सरकार कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सभी संवेदनशील झीलों के पास तत्काल ‘अर्ली वार्निंग सिस्टम’ और आधुनिक सेंसर लगाने का निर्देश दिया है। जिलों के जिलाधिकारियों (DMs) को सख्त आदेश दिए गए हैं कि वे अपने क्षेत्रों में नदियों के जलस्तर और पहाड़ी हलचल पर पैनी नजर रखें और किसी भी असामान्य गतिविधि की रिपोर्ट तुरंत सीनियर अधिकारियों को दें। इसके साथ ही निचले इलाकों के गांवों में सुरक्षित निकासी मार्ग यानी इवैक्युएशन रूट्स भी तय किए जा रहे हैं। दोस्तो प्रकृति की इस आफत के सामने सतर्कता ही हमारा सबसे बड़ा हथियार है। नेपाल के सबक ने उत्तराखंड को एक मौका दिया है कि हम समय रहते अपने पहाड़ों की सुरक्षा पुख्ता कर लें। हम उम्मीद करते हैं कि देवभूमि पर प्रशासन की ये मुस्तैदी किसी भी बड़ी आपदा को रोकने में कामयाब होगी। इस गंभीर विषय पर आपकी क्या राय है, क्या पहाड़ों पर बढ़ रहा इंफ्रास्ट्रक्चर इसका कारण है? कमेंट में अपनी राय जरूर लिखें। इस महत्वपूर्ण वीडियो को शेयर करें और पल-पल की खबरों के लिए हमारे चैनल को सब्सक्राइब करें।