Nepal Flood Tunnel Rescue 9 दिन… 216 घंटे! टनल से ‘चमत्कार’! | Nepal Army | Uttarakhand News

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क्या कोई इंसान बिना धूप, बिना ताज़ी हवा और मलबे से बंद एक अंधेरी सुरंग में पूरे 9 दिनों तक जिंदा रह सकता है? विज्ञान कहता है- नामुमकिन! लेकिन कुदरत के नियमों को चुनौती देते हुए नेपाल में एक ऐसा चमत्कार हुआ है, जिसने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है। 216 घंटे। जी हां, पूरे 216 घंटे मौ’त के मुंह में बिताने के बाद, जब दो जिंदगियां इस मलबे से बाहर आईं, तो रेस्क्यू टीम की आंखों में आंसू थे। आखिर उस काल कोठरी में इन दोनों ने खुद को कैसे जिंदा रखा? और टनल के अंदर से आई उस एक नेपाली शब्द की आवाज़ ने कैसे इस पूरे ऑपरेशन को बदल दिया? चलिए आपको बताते हैं इस ‘मिरेकल रेस्क्यू’ की रोंगटे खड़े कर देने वाली पूरी कहानी! बताता हूं। दोस्तो कहानी के इस पन्ने तबाही के बाद का वो मंजर है और रेस्क्यू का वीडियो जो किसी बड़े चमत्कार से कम नहीं है। दोस्तो ये नेपाली 9 दिन बाद मौत की टनल से सुरक्षित निकला आया।

दोस्तो कहानी शुरू होती है 26 अगस्त को। नेपाल और चीन के बॉर्डर पर एक विशालकाय ग्लेशियर भरभराकर टूट जाता है। इसके बाद त्रिशूली नदी में ऐसा भयानक सैलाब आता है कि जो सामने आया, वो बह गया। नेपाल में अब तक 1,200 से अधिक लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। इसी तबाही के बीच, त्रिशूली 3A हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट की एक सुरंग का मुंह भारी मलबे और पत्थरों से पूरी तरह बंद हो जाता है। अंदर काम कर रहे दर्जनों मजदूर वहीं दफन हो जाते हैं। बाहर खड़े लोगों को लगने लगता है कि अब सब कुछ खत्म हो चुका है। दोस्तो दिन बीतते गए। 1 दिन, 2 दिन और देखते-देखते हफ्ता गुजर गया। हर बीतते मिनट के साथ टनल के अंदर फंसे लोगों के बचने की उम्मीद दम तोड़ रही थी, लेकिन शुक्रवार को टनल के पास काम कर रही नेपाली सेना और सशस्त्र पुलिस बल के जवानों को कुछ अजीब महसूस होता है। मलबे के छोटे से छेद से टनल के करीब 50-60 मीटर गहरे हिस्से से एक बेहद धीमी, लड़खड़ाती हुई आवाज़ आती है। रेस्क्यू टीम चिल्लाकर पूछती है- “क्या अंदर कोई है?”और अंदर से जवाब आता है— “हुन्छ” यानी दोस्तो नेपाली भाषा में ‘हाँ, मैं ठीक हूँ’। ये एक शब्द सुनते ही रेस्क्यू टीम के रोंगटे खड़े हो जाते हैं टनल के बाहर चीख-पुकार मच जाती है— अंदर लोग जिंदा हैं! दोस्तो इतने दिन बाद मिली इस उम्मीद को सेना किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहती थी। मलबे को हटाने के लिए तुरंत युद्धस्तर पर अभियान शुरू किया गया, लेकिन खतरा ये था कि एक गलत ड्रिलिंग और पूरी टनल बैठ सकती थी।

ऐसे में इस रेस्क्यू ऑपरेशन में एंट्री होती है अर्नोल्ड डिक्स की। जी हां, ये वही ऑस्ट्रेलियाई टनल एक्सपर्ट हैं जिन्होंने भारत के उत्तरकाशी में 41 मजदूरों को सुरक्षित बाहर निकालने में दुनिया की सबसे बड़ी मदद की थी। अर्नोल्ड डिक्स वर्चुअली इस रेस्क्यू टीम से जुड़ते हैं और बारीकी से गाइड करना शुरू करते हैं। दोस्तो सांसें थमी हुई थीं, और आखिरकार वो पल आ ही गया जिसका सबको इंतजार था। मलबे को चीरते हुए रेस्क्यू टीम अंदर पहुंचती है और जांबाज मजदूरों को बाहर निकाल लिया जाता है। इनकी पहचान मैकेनिकल फोरमैन संजय साह और मैकेनिकल सुपरवाइजर कबीर महर्जन के रूप में हुई है। संजय साह को मामूली चोटें आई हैं, जबकि कबीर महर्जन फिलहाल अपने अंगों को हिला नहीं पा रहे हैं, लेकिन दोनों होश में हैं। उन्हें तुरंत काठमांडू के बड़े अस्पताल में एयरलिफ्ट किया गया। संजय और कबीर का बाहर आना किसी दूसरी जिंदगी से कम नहीं है, लेकिन ये चमत्कार अभी अधूरा है। नेपाल के अलग-अलग हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स की टनल में अभी भी करीब 500 से ज्यादा मजदूर फंसे हुए हैं। संजय और कबीर की सलामती ने उन 500 परिवारों की आंखों में फिर से उम्मीद की चमक दे दी है कि उनका लाल भी वापस लौटेगा। इस अविश्वसनीय रेस्क्यू और नेपाली सेना के इस जज्बे को हमारा सलाम, इस चमत्कार पर आपकी क्या राय है, हमें कमेंट सेक्शन में जरूर बताएं।