PM MODI का दौरा, सवालों की बैछार! । Uttarakhand News । Uttarakhand Visit।Ganesh Godiyal

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उत्तराखंड में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दौरा और उससे पहले सियासत पूरी तरह गरमा गई है। प्रधानमंत्री से 10 बड़े सवाल अंकिता भंडारी केस से लेकर रोजगार, कानून व्यवस्था और युवाओं के भविष्य तक, सवालों की लंबी फेहरिस्त पीएम मोदी के सामने है, लेकिन क्या चुनावी साल में इन सवालों की बौछार का जवाब देंगे बीजेपी वाले या सरकार प्रधानमंत्री मोदी उन दस सवालों से चलिए आपको रुबरू करूता हूं। आप देखना ये सवाल कितने महत्वपूर्ण हैं उत्तराखंड के लिए, आपके लिए। दोस्तो जैसा की दोस्तो ये साल चुनावी है तो सौगात भी खूब मिलेगी और सवाल भी बुहत होंगे। ऐसे में चुनावी साल में ये सवाल सिर्फ राजनीतिक बयानबाज़ी हैं या फिर जनता के मुद्दों को उठाने की कोशिश? हैं ये तय तो आप करगें लेकिन में आपको पूरी खबर बताता हूं। दोस्तो कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने साफ कहा है—रोड शो और रैली के साथ-साथ प्रधानमंत्री को इन मुद्दों पर जवाब भी देना चाहिए तो आखिर क्या हैं वो 10 सवाल जिनको लेकर सियासी पारा चढ़ा हुआ है? दोस्तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दौरे से ठीक पहले कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने कुछ सवाल उठाए हैं। उन्होंने पीएम मोदी से जनता के कुछ सवालों के जवाब पूछे हैं. उनका कहना है कि ये हम सबके लिए खुशी की बात है कि प्रधानमंत्री आ रहे हैं और यहां रोड शो भी करेंगे, लेकिन पीएम चुनावी साल में यहां आ रहे हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री को 10 सवालों के जवाब उत्तराखंड को देने होंगे।

जी हां दोस्तो सवालों की शुरूआत कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने अंकिता भंडारी मर्डर केस का जिक्र कर की यानि पहला सवाल अंकिता केस, जांच और वीआईपी। अंकिता हत्याकांड में जिन तथाकथित नेताओं की भागीदारी थी और वो वीआईपी कौन है? प्रधानमंत्री उत्तराखंड कितनी बार आ गए हैं, लेकिन अंकिता का उन्होंने एक बार भी नाम नहीं लिया। इसके अलावा कांग्रेस का ये कहना है कि सीबीआई जांच की बात कही, लेकिन तीन से चार महीने बीतने के बावजूद जांच की स्थिति स्पष्ट नहीं है. ऐसे में इस मामले पर बात की जाए। अब दूसरा सवाल, वो लगातार बढ़ रहे मानव वन्यजीव संघर्ष पर। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले गरीब पर्वत वासी लगातार वन्यजीवों के आतंक का सामना कर रहे हैं। प्रधानमंत्री को बताना चाहिए कि राज्य सरकार ने इस मामले पर क्या ठोस कदम उठाए? वहीं, दोस्तो गणेश गोदियाल ने प्रधानमंत्री मोदी के 2017 के उस बयान की भी याद दिलाई है, जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी’ उत्तराखंड के काम आएगी. उन्होंने सवाल उठाए कि राज्य के युवाओं के लिए सरकार ने अब तक कौन सी प्रभावी योजनाएं लागू की है? दोस्तो कांग्रेस पूछ रही है कि प्रधानमंत्री को बताना चाहिए कि पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी पहाड़ के काम नहीं आ रहा है। जबकि, हकीकत ये है कि नशाखोरी बढ़ रही है और युवाओं का भविष्य खतरे में है। उन्होंने भर्ती घोटाले और पेपर लीक की घटनाओं पर सवाल उठाए हैं। गोदियाल ने कहा कि उत्तराखंड अब इन मामलों के लिए बदनाम हो चुका है। दोस्तो इसी तरह शिक्षा व्यवस्था पर भी उन्होंने सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि बीजेपी सरकार के कार्यकाल में 826 स्कूल बंद हो गए हैं, जो की चिंताजनक विषय है, लेकिन पहाड़ी क्षेत्रों में 55 नई शराब की दुकानें खुल गई हैं। शराब और खनन को लेकर राज्य सरकार राजस्व बढ़ाने का बहाना बनाती रहती है। ऐसे में क्या सरकार के पास शराब और खनन राजस्व बढ़ाने के विकल्प रह गए हैं?

कांग्रेस कहती है कि उत्तराखंड नंबर वन राज्य तो नहीं बना, लेकिन महिला अपराध में आया अव्वल: गणेश गोदियाल ने आगे कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यहां के जनता से वादा किया था कि 5 साल में उत्तराखंड को नंबर वन राज्य बना देंगे, लेकिन आज उत्तराखंड हिमालय राज्यों में महिला अपराध के मामले में नंबर एक पायदान पर है। उपनल कर्मियों का नियमितीकरण कहां अटका हुआ है? इस सवाल का जवाब भी जनता को मिलना चाहिए। उन्होंने राज्य की बिगड़ती कानून व्यवस्था, महिला अपराध, पूर्व सैनिकों के खिलाफ हो रही अपराधिक घटनाओं पर भी सवाल उठाए हैं। इसके अलावा दोस्तो कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने घरेलू गैस की कालाबाजारी और बढ़ती कीमतों पर भी चिंता जताई है। कांग्रेस का कहना है कि ये तमाम प्रश्न हैं, जिसका आश्वासन प्रधानमंत्री को देना चाहिए। कुल मिलाकर प्रधानमंत्री के उत्तराखंड दौरे से पहले कांग्रेस ने जिन 10 सवालों को उठाया है, उसने सियासी माहौल को पूरी तरह गरमा दिया है। अंकिता भंडारी केस से लेकर रोजगार, कानून व्यवस्था, महिला सुरक्षा और महंगाई जैसे मुद्दों पर सीधे जवाब मांगे जा रहे हैं। अब बड़ा सवाल यही है कि क्या इन मुद्दों पर सरकार और बीजेपी की तरफ से कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया सामने आएगी, या फिर ये सवाल चुनावी बयानबाज़ी तक ही सीमित रह जाएंगे। क्योंकि चुनावी साल में हर सवाल और हर जवाब का राजनीतिक असर भी तय माना जाता है।फिलहाल जनता के मुद्दों पर सियासत तेज है और नजरें इस बात पर टिकी हैं कि इन सवालों का जवाब कब और कैसे मिलेगा।