पोखरी में जनता के विरोध के बाद क्या बीजेपी बौखला गई है? क्या लोकतंत्र में सवाल पूछने वालों को धमकियां दी जाएंगी?क्या राजनीतिक विरोध का जवाब राजनीतिक संवाद से नहीं, बल्कि चेतावनी से दिया जाएगा? कैसे बीजेपी अध्यक्ष ने दे धमकी, घर से नहीं निकल पाओगे और कैसे यूकेडी दिखा दिया महेंद्र भट्ट को आइना, आप तो पीसीओ चलते थे। दोस्तो उत्तराखंड की राजनीति में छिड़े इस नए सियासी संग्राम पर कैसे शुरू हो चुका है बयानों का शोर। दोस्तो पहले कहा आपको समस्या का समाधान चाहिए तो चुनाव लड़िए और जीतीए और फिर करलो समस्या का समाधान। दोस्तो ये वो तस्वीर है, इस पर नया सियासी हंगामा खड़ा हो चुका है। पोखरी में हुए घटनाक्रम के बाद बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट के बयान ने सियासी पारा चढ़ा दिया है। उक्रांद नेताओं को लेकर दिए गए उनके बयान पर अब नया विवाद खड़ा हो गया है। महेंद्र भट्ट ने कहा कि अगर उन्होंने बीजेपी कार्यकर्ताओं को घेराव का आदेश दे दिया, तो उक्रांद नेता घर से बाहर नहीं निकल पाएंगे। दोस्तो अब अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह एक जिम्मेदार राजनीतिक बयान है या फिर विरोध की आवाज को दबाने की कोशिश? उक्रांद ने इस बयान को अभद्र और अलोकतांत्रिक बताते हुए कड़ा विरोध जताया है। मै आपको यूकेडी की प्रतिक्रिया और नया बयान दिखाउं उससे पहले ये देखि लीजिए कि कैसे लोगों के बीच घिरे बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट समस्यओं के समाधान के लिए चुनाव लड़ जीतने की चुनौती दे रहे हैं।
दोस्तो पोखरी में हुई घटना को लेकर बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट का बड़ा बयान सामने आया है। महेंद्र भट्ट ने UKD नेताओं को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर उन्होंने बीजेपी कार्यकर्ताओं को घेराव का आदेश दे दिया, तो UKD नेता घर से बाहर नहीं निकल सकेंगे..आखिर इस पूरे मामले पर क्या बोले बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट, सुनिए उनकी जुबानी। दोस्तो जब महेंद्र भट्ट ने यूकेडी को लेकर बयान दिया अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया तो जाहिर से बात है। जवाब भी आना था। तो दोस्तों, सवाल अब भी वहीं खड़ा है, क्या लोकतंत्र में विरोध करने वालों को “घर से बाहर नहीं निकलने” जैसी चेतावनी देना उचित है?क्या जनता के सवालों का जवाब धमकी से दिया जाएगा या समाधान से?और अगर राजनीतिक दल एक-दूसरे को इसी तरह चेतावनियां देते रहे, तो फिर लोकतांत्रिक संवाद की जगह आखिर बचेगी कहां?एक तरफ बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट का बयान है, तो दूसरी तरफ उक्रांद इसे अभद्र और अलोकतांत्रिक करार दे रही है। सियासी बयानबाजी अपने चरम पर है और अब जनता यह देख रही है कि नेताओं के पास समस्याओं का समाधान है या सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप और चेतावनियां।फिलहाल पोखरी की यह घटना अब सड़क से निकलकर सियासी गलियारों तक पहुंच चुकी है और आने वाले दिनों में इस पर बयानबाजी और तेज होने के आसार हैं। आप इस पूरे मामले पर क्या सोचते हैं? क्या राजनीतिक विरोध का जवाब इस तरह की भाषा से दिया जाना चाहिए? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताइए।