Rishikesh जापान के दो साधक बने ‘महामंडलेश्वर’! । Sanatan Dharma । Uttarakhand News

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देवभूमि में जापान से आए दो साधकों ने रचा ऐसा इतिहास, जिसने सबका ध्यान खींच लिया!केन्ता और दाईसाकू ने सनातन परंपरा अपनाकर लिया संन्यास, बने महादेव गिरी और श्रीकृष्णा गिरी!अखाड़ा परिषद के दिग्गजों की मौजूदगी में हुआ दीक्षा समारोह, गूंजे वैदिक मंत्र और शंखनाद!आखिर जापान से देवभूमि तक कैसे पहुंचा इन दोनों साधकों का आध्यात्मिक सफर? दोस्तो एक तरफ हमारे अपने ही देश के कुछ ऐसे तथाकथित ‘पर्यटक’ हैं, जो उत्तराखंड के पावन तीर्थस्थलों को सिर्फ मौज-मस्ती, पिकनिक स्पॉट और हुड़दंग मचाने का जरिया समझते हैं। गंगा किनारे रील बनाना और मर्यादाओं को तार-तार करना जिनकी फितरत बन चुका है। दोस्तो कोई सात समंदर पार से, दुनिया के सबसे आधुनिक देश जापान से चलकर देवभूमि आता है, और यहीं की माटी का होकर रह जाता है! जी हाँ, इसे ही कहते हैं हमारी देवभूमि उत्तराखंड का साक्षात चमत्कार। ऋषिकेश की पावन धरा पर सनातन धर्म की वो ऐतिहासिक गूँज सुनाई दी है, जिसने पूरी दुनिया को चकित कर दिया है। जापान के दो नागरिकों ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच संन्यास लेकर सनातन धर्म के सर्वोच्च ‘महामंडलेश्वर’ पद की शपथ ली है। आखिर कैसे केन्ता और दाईसाकू बन गए सनातन के ध्वजवाहक? क्या इसके पीछे अपने उत्तराखंड की संस्कृति आधात्म की वो चमक और धमक है जो दुनियां को यहां खींच कर ले आती है, इस पर आप जरूर कुछ ना कुछ बताइयेगा। खैर मै आगे खबर बताता हूं। दोस्तो यह अलौकिक दृश्य किसी आम धार्मिक अनुष्ठान का नहीं है, यह गवाह है सनातन संस्कृति के वैश्विक शंखनाद का! योग नगरी ऋषिकेश के ऐतिहासिक वीरभद्र महादेव मंदिर में एक ऐसा पट्टाभिषेक समारोह आयोजित किया गया, जिसने भारत और जापान के सांस्कृतिक संबंधों को एक नए आध्यात्मिक शिखर पर पहुँचा दिया। वैदिक मंत्रों की गूँज और शंखनाद के बीच जापान से आए दो साधकों को सनातन धर्म की दीक्षा देकर महामंडलेश्वर की उपाधि से विभूषित किया गया। जब इन जापानी संतों ने पूरे नियम-संयम के साथ संस्कृत के श्लोकों का उच्चारण किया, तो वहां मौजूद हर सनातनी का सीना गर्व से चौड़ा हो गया।

अब दोस्तो जो लोग अपनी ही संस्कृति को भूलकर पाश्चात्य सभ्यता के पीछे भाग रहे हैं, उन्हें इन जापानी साधकों ने बहुत बड़ा सबक दिया है! संन्यास की इस कठिन परीक्षा को पार करने वाले केन्ता इशियामा को अब नया नाम ‘श्री महादेव गिरी जी महाराज’ दिया गया है, जबकि दाईसाकू नारीता को अब दुनिया ‘श्रीकृष्णा गिरी जी महाराज’ के नाम से जानेगी। इन दोनों ने अपनी आधुनिक जापानी पहचान को त्यागकर, सनातन धर्म की उस लंगोट और भगवा चादर को सहर्ष स्वीकार कर लिया, जिसे धारण करने की प्रेरणा बड़े-बड़े ऋषियों-मुनियों को भी सदियों की तपस्या के बाद मिलती है। दोस्तो यह पट्टाभिषेक कोई साधारण घटना नहीं थी, बल्कि इसे सनातन धर्म की सर्वोच्च पीठों का पूरा आशीर्वाद प्राप्त था। इस महा-आयोजन में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत डॉ. रविंद्र पुरी, श्री निरंजन पीठाधीश्वर महामंडलेश्वर आचार्य कैलाशानंद गिरी जी महाराज और महंत दर्शनभारती जैसे बड़े संत और सनातन के स्तंभ खुद मौजूद रहे। संतों ने मंत्रोच्चार के बीच दोनों जापानी महामंडलेश्वरों का अभिषेक किया और उन्हें सनातन धर्म के प्रचार-प्रसार की बड़ी जिम्मेदारी सौंपी।

संतों का साफ कहना था कि यह आयोजन यह साबित करता है कि सनातन धर्म किसी भूगोल की सीमा में नहीं बंधा है, यह ब्रह्मांडीय सत्य है। दोस्तो ऋषिकेश से जापान तक गूंजने वाले ये वैदिक मंत्र उन हुड़दंगियों के गाल पर भी एक करारा तमाचा हैं जो वीकेंड पर शराब की बोतलें लेकर पहाड़ों में हुड़दंग काटने आते हैं। देवभूमि की महिमा यह है कि यह केवल एक पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि आत्मा को परमात्मा से जोड़ने वाला मोक्ष का द्वार है। जापान के ये साधक अब अपने देश लौटकर संस्कृत श्लोकों, वेदों के ज्ञान और सनातन परंपराओं की अलख जगाएंगे। टोक्यो की गलियों से लेकर जापान के हर कोने तक अब भगवान शिव और कृष्ण के जयकारे गूंजेंगे, जो भारत की सॉफ्ट पावर और आध्यात्मिक विजय का सबसे बड़ा प्रमाण है। दोस्तो तो साफ बात यह है कि सनातन धर्म की जड़ें इतनी गहरी हैं कि जो भी इसके संपर्क में आता है, वह पूरी तरह इसी के रंग में रंग जाता है। ऋषिकेश का यह पट्टाभिषेक समारोह यह याद दिलाने के लिए काफी है कि हमें अपनी पावन देवभूमि की मर्यादा और पवित्रता का सम्मान करना चाहिए, क्योंकि सात समंदर पार के लोग यहां मोक्ष ढूंढने आ रहे हैं। नव-दीक्षित दोनों जापानी महामंडलेश्वरों को हमारी पूरी टीम की तरफ से नमन और बधाई। इस गौरवमयी वैश्विक पल पर आपकी क्या भावनाएं हैं, कमेंट बॉक्स में ‘हर हर महादेव’ लिखकर जरूर जाहिर करें।