Rudraprayag अधूरा सपना, जर्जर बिल्डिंग सरकारी सिस्टम पर सवाल | Government Project | Uttarakhand News

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दोस्तो क्या 12 साल का वक्त किसी भी बड़े प्रोजेक्ट के लिए कम होता है? या फिर ये सरकारी सिस्टम की उस लापरवाही की कहानी है, जहां करोड़ों का बजट भी नतीजा नहीं दे पाया?₹25 करोड़ की लागत से शुरू हुआ कृषि महाविद्यालय आज भी अधूरा क्यों है?और जो इमारतें खड़ी हुई थीं, वो अब खंडहर में क्यों बदल गईं? जब प्रोजेक्ट की नींव 2013 में रख दी गई थी, तो फिर 12 साल बाद भी छात्रों को अपना कैंपस क्यों नहीं मिला?क्या यह सिर्फ निर्माण में देरी है या फिर सरकारी धन के उपयोग पर भी बड़े सवाल खड़े होते हैं? य़े खबर सिर्फ एक अधूरे निर्माण की नहीं, बल्कि सिस्टम की उस हकीकत की तस्वीर है, जहां योजनाएं बनती हैं, बजट पास होता है, लेकिन ज़मीनी हकीकत खंडहर बनकर रह जाती है, तस्वीर देख कर आप भी रह जाएंगे दंग बताउंगा आपको पूरी खबर। उत्तराखंड की खंडहर होती व्यवस्था। दोस्तो क्या ये विकास की तस्वीर है या सरकारी सिस्टम की सबसे बड़ी लापरवाही की कहानी? क्या योजनाएं सिर्फ कागजों पर बनती हैं और ज़मीनी हकीकत खंडहर में बदल जाती है? दोस्तो रुद्रप्रयाग और टिहरी जिले की सीमा पर स्थित चिरबटिया कृषि महाविद्यालय आज एक बड़े सवाल का प्रतीक बन चुका है। साल 2013 में इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट की शुरुआत हुई थी, उद्देश्य था—पर्वतीय क्षेत्रों में कृषि शिक्षा और अनुसंधान को नई दिशा देना इसके लिए 8.3 हेक्टेयर भूमि चिन्हित की गई, ₹25 करोड़ का बजट स्वीकृत हुआ और पहली किस्त के तौर पर ₹5 करोड़ जारी भी किए गए। लेकिन सवाल ये है कि 12 साल बाद भी यह प्रोजेक्ट पूरा क्यों नहीं हुआ?

दोस्तो जो इमारतें कभी भविष्य की उम्मीद बनकर खड़ी की गई थीं, वे आज देखरेख और गुणवत्ता की कमी के चलते खंडहर में तब्दील हो चुकी हैं, जहां छात्रों को आधुनिक कृषि शिक्षा, लैब सुविधा, रिसर्च सेंटर और बेहतर अकादमिक माहौल मिलना था, वहां आज सिर्फ टूटी दीवारें और अधूरी संरचनाएं खड़ी हैं।और सबसे बड़ा सवाल—इसकी जिम्मेदारी किसकी है? दोस्तो शासन ने टेंडर के जरिए उत्तर प्रदेश निर्माण निगम को निर्माण की जिम्मेदारी सौंपी थी, लेकिन निर्माण कार्य की गुणवत्ता इतनी कमजोर बताई जा रही है कि तैयार ढांचा भी समय के साथ जर्जर हो गया। दोस्तो क्या यह सिर्फ निर्माण की गलती है? या फिर सिस्टम की उस गहरी खामोशी का नतीजा है, जहां जवाबदेही धीरे-धीरे खत्म हो जाती है?आज हालत यह है कि महाविद्यालय की कक्षाएं चिरबटिया में नहीं बल्कि टिहरी के रानीचौरी परिसर में चल रही हैं, यानि जिस संस्थान को अपने क्षेत्र में स्थापित होना था, वह आज दूसरे परिसर में संचालित हो रहा है। दोस्तो बड़ी हैरानी होती है ऐसी तस्वीरों को देख कर जहां छात्रों को B.Sc. Agriculture, Horticulture, Soil Science और Agricultural Research जैसे महत्वपूर्ण विषयों की पढ़ाई करनी थी..लेकिन बुनियादी ढांचा ही तैयार नहीं हुआ, तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की उम्मीद कैसे पूरी होगी?

अब इधर दोस्तो एक खबर ये भी कि सरकार ने यहां छात्रावास निर्माण के लिए ₹7.26 करोड़ की नई स्वीकृति दी है।लेकिन सवाल वही है—क्या यह नया निर्माण भी पुराने ढांचे की तरह अधूरा और विवादों में घिर जाएगा? क्षेत्रीय जनप्रतिनिधि और युवा नेता मोहित डिमरी ने मौके पर पहुंचकर इस स्थिति को गंभीर लापरवाही बताया है। दोस्तो अगर पहले चरण में ही पूरा ढांचा तैयार होता—प्रशासनिक भवन, लैब, एकेडमिक ब्लॉक और आवास—तो आज हालात कुछ और होते, लेकिन यहां तो टुकड़ों में बजट जारी हुआ, और टुकड़ों में ही निर्माण चलता रहा। दोस्तो सवाल करूंगा तो जवाब देते थक जाएंगे बल जिम्मेदार लेकिन जहां एक तरफ उत्तराखंड 25 साल का हो चुका है। रजत जयंति का खुमार अभी उतरा भी नहीं है वहां, 13 साल पहले शुरू हुआ एक कॉलेज खंडहर बन चुका है। दोस्तो क्या 12 साल पर्याप्त नहीं थे एक कॉलेज पूरा करने के लिए? क्या करोड़ों का बजट सिर्फ कागजों में खर्च दिखाया गया? और क्या जवाबदेही तय करने वाला कोई तंत्र वास्तव में काम कर भी रहा है? दोस्तो चिरबटिया कृषि महाविद्यालय आज सिर्फ एक अधूरी इमारत नहीं है…यह उस सिस्टम की तस्वीर है, जहां योजनाएं बनती हैं, बजट पास होता है, लेकिन नतीजा—खंडहर बनकर रह जाता है।और शायद यही सबसे बड़ा सवाल है कि— क्या आने वाले वर्षों में यह प्रोजेक्ट पूरा होगा या फिर यह भी सिर्फ एक और “अधूरी सरकारी कहानी” बनकर रह जाएगा?