बुलाया ‘साहब’ ने.. तो ट्रोल क्यों हुई कलाकार! | Uttarakhand News

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दोस्तो, बद्रीनाथ DJ विवाद में सवालों का खा खूब शोर है। सरकार मंत्री मंदिर समीति तीर्थ परोहित का गुस्सा सब कुछ देखने को मिल रहा है, लेकिन अब निशाने पर आ चुके हैं कलाकार भी सवाल सिर्फ प्रियंका मेहर के नाचने का नहीं है! सवाल ये है कि अगर कलाकार को बुलाया गया था, तो सवाल सिर्फ कलाकार से ही क्यों? कार्यक्रम किसने कराया, अनुमति किसने दी और जिम्मेदारी किसकी थी? सोशल मीडिया पर कलाकार को ट्रोल करके क्या असली सवालों से ध्यान भटकाया जा रहा है? आखिर बुलाया ‘साहब’ ने और बलि का बकरा कलाकार क्यों? देखिए पूरी खबर। दोस्तो बद्रीनाथ धाम में संगीत और लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर उठ रहे सवाल अपनी जगह बिल्कुल जायज हो सकते हैं। परंपराओं और मर्यादा की रक्षा होनी ही चाहिए। लेकिन, उस विवाद की आड़ में सोशल मीडिया पर जो घिनौना खेल चल रहा है, जब व्यवस्थाएं फेल होती हैं, जब बड़े-बड़े अधिकारियों से जवाबदेही मांगी जानी चाहिए, तब हमारी ‘ट्रोल आर्मी’ सारा गुस्सा किस पर निकालती है? एक महिला कलाकार पर! सवाल बहुत सीधा है—गाना गाने वाला गलत, लेकिन जो वहां ताली बजाकर नाच रहे थे और जिन्होंने करोड़ों का बजट पास करके यह आयोजन करवाया, वो सब सही? ये कैसी मानसिकता है। दोस्तो उत्तराखंड के बद्रीनाथ धाम में हुए सांस्कृतिक महोत्सव के बाद से सोशल मीडिया का पारा सातवें आसमान पर है, लेकिन यह गुस्सा अब मर्यादा की बहस से भटककर एक कलाकार को व्यक्तिगत रूप से प्रताड़ित करने पर उतर आया है। गायक प्रियंका मेहर के गानों और परफॉर्मेंस को लेकर इंटरनेट पर कुछ तथाकथित ‘संस्कृति रक्षकों’ ने मोर्चा खोल दिया है। कमेंट्स देखिए—कोई कह रहा है कि ‘क्या गढ़वाली गाने गाकर सिर्फ पैसा कमाना ही ड्यूटी है?’ तो कोई उनके गानों को बैन करने की मांग कर रहा है दोस्तो बद्रीनाथ की धार्मिक मर्यादा पर बात करना हर सनातनी का अधिकार है, लेकिन क्या पूरे रायते की जिम्मेदारी सिर्फ एक परफॉर्मर की है? दोस्तो अब जो लोग कमेंट बॉक्स में बैठकर ज्ञान बांट रहे हैं, वो बुनियादी गणित भूल जाते हैं। एक कलाकार खुद अपना स्टेज उठाकर बद्रीनाथ नहीं पहुंच जाता। इस भव्य आयोजन के पीछे सरकारी तंत्र, जिला प्रशासन और सेना के जुड़े होने की खबरें आ रही हैं, सरकारी बजट पास हुआ, टेंडर छूटे, बकायदा वीआईपी कुर्सियां लगीं। फैसले बड़े-बड़े साहबों ने एयरकंडीशन कमरों में बैठकर लिए। लेकिन जब जनता भड़की, तो पूरी की पूरी जिम्मेदारी का ठीकरा उठाकर एक आर्टिस्ट के सिर मढ़ दिया गया! सवाल आयोजकों से होने चाहिए थे, सवाल अनुमति देने वालों से होने चाहिए थे, लेकिन आसान शिकार कौन बना? एक कलाकार!

दोस्तो ऐसे कई सारे कमेंट हैं कई सारे पोस्टर तैर रहे हैं.. जिसमें साफ लोग ये बोल रह हैं। “क्यों वो उत्तराखंड की नहीं है क्या?? वो गढ़वाली गाने गा के पैसा भी कमा रही? उसकी ड्यूटी नहीं है उत्तराखंड के परंपरा और धरोहर की रक्षा करना? अगर वो ना बोल दे तो कोई भी उसका गाना नहीं सुनेगा। कल को अगर इसको कोई बोलेगा कि किसके मय्यत में गाना गाना है, मतलब तुम्हारा कहना का मतलब ये है कल को पैसे दे के इनसे खूब, भी करा सकते हैं और ये कर भी लेंगे, pahadi_bandhu_uk01: “क्यों उस पर दिमाग नहीं था क्या पैसे के पीछे क्या सही क्या गलत ये भी नहीं सोच सकती, क्यों विवादों में इसी का नाम आता है, खैर इसी पर ब्लेम करना पूरा अनुचित है, ऑर्गनाइज़र ज़िम्मेदार है लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि ये ज़िम्मेदार नहीं, यही नहीं जितने भी वहां मजे ले रहे थे किसी ने भी विरोध करने का साहस नहीं किया क्या” ऐसे कई कमेंट्स है। कुछ अभद्र भी हैं, जब कार्यक्रम चल रहा था, तब दर्शक दीर्घा में बैठकर झूमने वाले लोग कौन थे? तब किसी का जमीर नहीं जागा। अब जब सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग का दौर शुरू हुआ, तो हर कोई खुद को पाक-साफ दिखाने की होड़ में लग गया है। प्रशासन अब गढ़वाल स्काउट्स को नोटिस भेजकर जवाब मांग रहा है। यानी सरकारी महकमे खुद जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहे हैं और सोशल मीडिया की भीड़ को एक चेहरा दे दिया गया है ताकि लोग असली जिम्मेदारों का नाम भूल जाएं। दोस्तो प्रियंका मेहर कोई ऐसी कलाकार नहीं हैं जो रातों-रात कहीं से आ गई हों। उन्होंने उत्तराखंड के पारंपरिक संगीत और गढ़वाली लोकगीतों को देश-दुनिया के युवाओं तक पहुंचाने में अपनी अहम भूमिका निभाई है। जो लोग आज उन पर उत्तराखंड की धरोहर को नष्ट करने का आरोप लगा रहे हैं दोस्तो वे शायद भूल गए कि कला और कलाकार हमेशा बुलावे पर काम करते हैं। अगर स्थान की पवित्रता के लिहाज से वह कार्यक्रम वहां नहीं होना चाहिए था, तो इसकी जवाबदेही पूरी तरह से मैनेजमेंट की बनती है। किसी कलाकार को इस तरह सोशल मीडिया पर मॉब-लिंचिंग का शिकार बनाना कहां की संस्कृति है? तो साफ बात ये है कि बद्रीनाथ धाम की गरिमा और शांति सर्वोपरि है, और वहां लाउड कॉन्सर्ट जैसे आयोजन नहीं होने चाहिए। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि आप सिस्टम के असली गुनहगारों को छोड़कर एक महिला कलाकार को निशाना बनाने लगें। जब तक हम फैसले लेने वाले बड़े अधिकारियों और आयोजकों से तीखे सवाल नहीं पूछेंगे, तब तक ऐसी गलतियां होती रहेंगी और हर बार किसी न किसी कलाकार को बलि का बकरा बना दिया जाएगा। इस दोहरी मानसिकता पर आपकी क्या राय है? कमेंट बॉक्स में अपनी बात जरूर रखें।