High Court से बड़ा मंत्री का सिस्टम?| Ganesh Joshi | Vikesh Negi | Judgement | Uttarakhand News

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दोस्तो क्या इस देश में अब अदालतें नहीं, बल्कि सत्ताधारी मंत्री तय करेंगे कि वो गुनहगार हैं या बेदाग? उत्तराखंड की सियासत से जो सनसनीखेज सच सामने आया है, उसने न्यायपालिका की साख पर सीधे सवालिया निशान लगा दिए हैं! कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी पर आय से अधिक संपत्ति का संगीन आरोप है, हाई कोर्ट ने अभी तक अपना फैसला बंद फाइलों में सुरक्षित रखा है, लेकिन मंत्री जी ने एडवांस में ही जश्न मना डाला, खुद को क्लीन चिट दे दी! यह न्याय व्यवस्था का मखौल है या सत्ता का अंधा अहंकार? पूरी खबर देखिए चौंक जाएंगे आप। दोस्तो क्या हमारे लोकतंत्र में अब नेता न्यायपालिका से भी ऊपर हो चुके हैं? क्या अदालतों के फैसले अब जजों के कलम चलाने से पहले ही मंत्रियों के ड्राइंग रूम में तय हो जाते हैं? उत्तराखंड की उत्तराखंड सरकार के कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी ने जो दावा किया है, उसने भारतीय न्याय व्यवस्था और संविधान की मर्यादाओं को कटघरे में खड़ा कर दिया है! आय से अधिक संपत्ति मामले में जिस वक्त हाई कोर्ट ने अपना फैसला सुरक्षित रखा हुआ है, ठीक उसी वक्त मंत्री जी सीना ठोककर कह रहे हैं कि उन्हें ‘क्लीन चिट’ मिल चुकी है और याचिका खारिज हो गई है! यह आत्मविश्वास है, अहंकार है या फिर सीधे-सीधे देश की न्याय प्रणाली का मखौल?

कैबिनेट मंत्री गणेश जोशी पर आय से अधिक संपत्ति अर्जित करने के गंभीर आरोप लगे। मामला विजिलेंस कोर्ट से लेकर उत्तराखंड उच्च न्यायालय की चौखट तक पहुंचा। याचिकाकर्ता विकेश सिंह नेगी ने अदालत से निष्पक्ष जांच और कार्रवाई की गुहार लगाई। हफ्तों तक दलीलें चलीं, फाइलों को खंगाला गया और अंत में माननीय अदालत ने सब कुछ सुनने के बाद फैसला अपने पास सुरक्षित रख लिया। दोस्तो कानून कहता है कि जब तक जजमेंट ओपन कोर्ट में सुनाया नहीं जाता, तब तक कोई नहीं जानता कि फैसला किसके पक्ष में आएगा। लेकिन मंत्री जी तो कानून से दो कदम आगे निकले! अब दोस्तो जैसे ही मंत्री गणेश जोशी ने दावा किया कि कोर्ट से याचिका खारिज हो चुकी है और वो पूरी तरह बेदाग साबित हो चुके हैं, वैसे ही याचिकाकर्ता विकेश नेगी ने मोर्चा खोल दिया! उन्होंने सीधे ई-कोर्ट्स (E-Courts) का आधिकारिक रिकॉर्ड जनता के सामने रख दिया, जिसमें साफ-साफ दिख रहा है कि मामले में जजमेंट अभी भी रिजर्व है! दोस्तो विकेश नेगी ने मंत्री पर तीखा हमला बोलते हुए कहा कि फैसला आने से पहले ही खुद को क्लीन चिट देना न्यायपालिका की अस्मिता पर गहरी चोट है!

सवाल उठता है— मंत्री जी के पास ऐसी कौन सी दिव्य दृष्टि है कि उन्हें बंद लिफाफे में बंद फैसले का मजमून पहले से पता चल गया? क्या सत्ता के गलियारों में बैठकर न्याय की तराजू को पहले ही तौल लिया गया था? दोस्तो सत्ता की हनक और भ्रष्टाचार के आरोपों का इतिहास देखिए। यह पहली बार नहीं है जब गणेश जोशी विवादों में घिरे हैं। उद्यान घोटाला हो, सैन्यधाम घोटाला हो या फिर हाल ही में देहरादून की विजिलेंस कोर्ट द्वारा उन्हें व्यक्तिगत रूप से पेश होने का जारी नोटिस, मंत्री जी का नाता विवादों से पुराना रहा है। शिकायतकर्ता पंकज सिंह क्षेत्री ने भी आरोप लगाया था कि विजिलेंस विभाग ने सरकार से अनुमति न मिलने का बहाना बनाकर मंत्री पर FIR तक दर्ज नहीं की थी, जिसके बाद उन्हें कोर्ट का दरवाजा खटखटाना पड़ा था! बीजेपी भले ही भ्रष्टाचार पर ‘जीरो टॉलरेंस’ का नारा दे, लेकिन जब कैबिनेट का कोई रसूखदार मंत्री कोर्ट के फैसले से पहले ही अपनी जीत का ढोल पीटने लगे, तो जनता के मन में शक की चिंगारी भड़कना लाजमी है दोस्तो न्यायपालिका देश का वो आखिरी स्तंभ है, जिस पर एक आम नागरिक आंख मूंदकर भरोसा करता है। अगर नेता और मंत्री पहले ही तय करने लगेंगे कि अदालत क्या फैसला सुनाने वाली है, तो कोर्ट-कचहरी और तारीखों का यह तमाशा बंद कर देना चाहिए! धामी सरकार को जवाब देना होगा कि क्या उनके मंत्री कानून से ऊपर हैं? अब पूरे देश की नजरें हाई कोर्ट के उस फैसले पर टिकी हैं, जो अभी भी फाइलों में बंद है। देखते हैं कि क्या वाकई मंत्री जी की भविष्यवाणी सच होती है, या फिर कानून का डंडा सत्ता के अहंकार को चकनाचूर करता है!