BJP-Congress MLA पर गिरफ्तारी की तलवार?। Kashipur । Arvind Pandey। Adesh Chauhan । Uttarakhand News

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दोस्तो, उत्तराखंड की सियासत में 14 साल पुराने एक मामले ने फिर हलचल बढ़ा दी है!मामले में BJP और कांग्रेस से जुड़े विधायकों के नाम चर्चा में हैं और अब कोर्ट के रुख के बाद गिरफ्तारी को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।आखिर 14 साल पुराने इस मामले में अब ऐसा क्या हुआ कि सियासी गलियारों में हलचल मच गई?क्या वाकई विधायकों पर गिरफ्तारी की तलवार लटक रही है? दोस्तो देवभूमि उत्तराखंड की सियासत में इस वक्त वो सबसे बड़ा भूचाल आ चुका है, जिसकी गूंज सीधे देहरादून से लेकर दिल्ली तक सुनाई दे रही है! अमूमन विधानसभा के अंदर एक-दूसरे के खून के प्यासे दिखने वाले भाजपा और कांग्रेस के नेता, आज एक ही नाव पर सवार हैं! और वो नाव है—जेल जाने की नाव! जी हां, कोर्ट ने एक ऐसा फरमान सुनाया है कि माननीयों की सांसें अटक गई हैं। दो मौजूदा विधायकों समेत 24 रसूखदार नेताओं के खिलाफ गैर-जमानती वारंट (NBW) जारी हो चुका है। पुलिस फाइलें तैयार कर चुकी है और गिरफ्तारी कभी भी, किसी भी वक्त हो सकती है! लेकिन आखिर ऐसा क्या हुआ था कि आज सत्ता और विपक्ष, दोनों के बड़े चेहरे कानून के शिकंजे में हैं? क्या था वो मुस्लिम युवक और हिंदू युवती से जुड़ा पूरा मामला, जिसने 14 साल बाद यह दिन दिखाया है? चलिए खोलते हैं इस महा-विवाद की पूरी फाइल क्या कहती है।

दोस्तो कानून के हाथ लंबे होते हैं। यह कहावत तो आपने हजार बार सुनी होगी, लेकिन देवभूमि में कानून के इन हाथों ने ऐसा शिकंजा कसा है कि नेताओं के पसीने छूट रहे हैं। मामला कोई आज या कल का नहीं, बल्कि पूरे 14 साल पुराना है। 14 साल तक जो नेता खुद को कानून से ऊपर समझ रहे थे, आज उनके घर के बाहर पुलिस की गाड़ियां कभी भी दस्तक दे सकती हैं। कोर्ट ने साफ कह दिया है—वारंट गैर-जमानती है, यानी अब सीधे कोर्ट में पेशी होगी या फिर सलाखें! दोस्तो अब आपको टाइम मशीन में पीछे ले चलते हैं, साल 2012 में। देवभूमि के एक संवेदनशील इलाके में अचानक तब तनाव फैल गया था, जब एक मुस्लिम युवक द्वारा एक हिंदू युवती को भगाने की खबर सामने आई। देखते ही देखते इस मामले ने सांप्रदायिक रंग ले लिया। हिंदू संगठनों के साथ-साथ तब की सियासत के उभरते चेहरे सड़कों पर उतर आए। आरोप है कि 14 साल पहले क्या हुआ? इन नेताओं की अगुवाई में भारी हंगामा हुआ, उग्र नारेबाजी हुई, सरकारी काम में बाधा डाली गई और कानून व्यवस्था को ठेंगे पर रख दिया गया। पुलिस ने मुकदमों की फाइलें तो खोलीं, लेकिन सत्ता के गलियारों में बैठे इन रसूखदारों ने सालों तक इन फाइलों को दबाए रखा। लेकिन दोस्तो कोर्ट में न्याय की चक्की भले ही धीरे चलती है, पर पीसती बहुत बारीक है। मुकदमों की तारीखें बदलती रहीं, नेता अदालती समन को हल्के में लेते रहे। वे सोचते रहे कि विधायक बनने के बाद उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। लेकिन कोर्ट ने इस बार साफ कर दिया कि कानून सबके लिए बराबर है।

इस मामले में जिन 24 बड़े नेताओं के नाम शामिल हैं, उनमें से दो इस समय उत्तराखंड विधानसभा में जनता के प्रतिनिधि बनकर बैठे हैं—एक सत्ताधारी BJP से हैं, तो दूसरे मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस से! यानी इस बार कोई भी दल दूसरे पर उंगली उठाने की स्थिति में नहीं है। दोनों ही पार्टियां इस वक्त अपने नेताओं को बचाने के लिए कानूनी रास्ते ढूंढ रही हैं। दोस्तो गैर-जमानती वारंट जारी होने का मतलब साफ है कि पुलिस को इन्हें गिरफ्तार करके कोर्ट के सामने पेश करना ही होगा। सूत्रों की मानें तो पुलिस पर इस वक्त भारी राजनीतिक दबाव है, लेकिन कोर्ट के कड़े आदेश के सामने पुलिस के पास भी विकल्प बेहद सीमित हैं। उत्तराखंड की जनता इस वक्त स्तब्ध है। जो नेता जनता को कानून का पाठ पढ़ाते थे, आज वे खुद कानून से भागते नजर आ रहे हैं। इस कार्रवाई ने उत्तराखंड की पुलिस और सरकार की साख को भी दांव पर लगा दिया है। दोस्तो सियासत में रसूख और सत्ता की हनक चाहे जितनी बड़ी हो, लेकिन जब अदालत अपना हंटर चलाती है, तो बड़े-बड़े सूरमाओं के सिंहासन हिल जाते हैं। उत्तराखंड का यह मामला उन सभी नेताओं के लिए एक बड़ा सबक है जो भीड़ की आड़ में कानून हाथ में लेते हैं और सोचते हैं कि वक्त के साथ सब भूल जाएंगे। अब देखना यह है कि ये माननीय खुद को पुलिस के हवाले करते हैं, या फिर देवभूमि की पुलिस इनके घरों पर दबिश देकर इन्हें सलाखों के पीछे पहुंचाती है।