Bageshwar Kapkot में सड़क के लिए हल्लाबोल! । Road Issue । Road Protest । Uttarakhad News

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दोस्तो पहाड़ की सुलगती जवानी, क्या इस बार आर-पार की जंग लड़ेंगे कपकोट के ग्रामीण? बैठकों का दौर खत्म, ज्ञापनों का नाटक बंद—अब सड़कों पर उतरा जनता का गुस्सा! फुलवाड़ी-खैधार सड़क का वो अधूरा वादा, जो दशकों बाद भी बना हुआ है एक छलावा! तो क्या बागेश्वर के इन सुदूर गांवों का हक दबाकर सोया हुआ है गूंगा-बहरा सिस्टम? दोस्तो लगता है अब हाथ जोड़ने और गुहार लगाने का वक्त खत्म हो चुका है! जब दशकों तक फाइलें सिर्फ दफ्तरों की धूल फांकती रहें, तो जनता का सब्र इसी तरह बारूद बनकर फटता है। दोस्तो बागेश्वर जिले के कपकोट से आई इन आक्रोशित तस्वीरों को देखिए, जहाँ फुलवाड़ी–खैधार सड़क की मांग को लेकर अब पूरा इलाका सड़कों पर उतर चुका है। बुजुर्गों की लाठी, युवाओं का गुस्सा और महिलाओं की हुंकार गवाही दे रही है कि नेताओं के झूठे आश्वासनों की मियाद अब खत्म हो चुकी है। ये सिर्फ एक प्रदर्शन नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व और बुनियादी हक के लिए लड़ा जा रहा वो जनआंदोलन है, जो बहरी सिस्टम के कानों के पर्दे फाड़ने के लिए काफी है! उत्तराखंड को अलग राज्य बने ढाई दशक होने को हैं, लेकिन आज भी पहाड़ के सीमांत गांवों की नियति सिर्फ और सिर्फ बुनियादी सुविधाओं के लिए तड़पना ही रह गई है। बागेश्वर जिले के कपकोट विधानसभा क्षेत्र से सुलगती हुई खबर सामने आई। फुलवाड़ी–खैधार सड़क निर्माण की मांग को लेकर लंबे समय से शांत बैठे ग्रामीणों का धैर्य आखिरकार जवाब दे गया है। अब तक बंद कमरों में होने वाली बैठकें और जिला प्रशासन को सौंपे जाने वाले सफेद कागजी ज्ञापनों का दौर बीती बात हो चुका है। अब ये मांग एक उग्र और विशाल जनआंदोलन का रूप ले चुकी है। दोस्तो तस्वीरें साफ बयां कर रही हैं कि ग्रामीणों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। सैकड़ों की तादाद में पुरुष, महिलाएं और युवा अपने हाथों में अपनी जायज मांगों की तख्तियां लेकर कपकोट की सड़कों पर प्रशासनिक तंत्र के खिलाफ हुंकार भर रहे हैं। “रोड नहीं तो वोट नहीं” और “हमारी मांगें पूरी करो” के नारों से पूरा पहाड़ी इलाका गूंज उठा।

दोस्तो आखिर क्यों उबला कपकोट की जनता का खून? इसके पीछे की जमीनी हकीकत को समझिए.. दशकों पुराना इंतजार। फुलवाड़ी से खैधार तक सड़क का निर्माण सिर्फ एक चुनावी लॉलीपॉप बनकर रह गया है। हर बार चुनाव आते हैं, नेता बड़े-बड़े वादे करते हैं और जीतने के बाद गायब हो जाते हैं। इलाज के अभाव में दम तोड़ती जिंदगी। सड़क न होने के कारण आज भी इस क्षेत्र में किसी बीमार, बुजुर्ग या गर्भवती महिला को मुख्य मार्ग तक पहुंचाने के लिए डोली या डंडे का सहारा लेना पड़ता है। कई बार अस्पताल पहुंचने से पहले ही मरीज दम तोड़ देते हैं। रोजमर्रा का कड़ा संघर्ष भी है। जैसे स्कूली बच्चों को जान जोखिम में डालकर मीलों पैदल चलना पड़ता है और राशन से लेकर हर बुनियादी सामान पीठ पर लादकर ले जाना पड़ता है। वहीं दोस्तो सड़कों पर उतरे आंदोलनकारियों ने सरकार और लोनिवि (PWD) विभाग को सीधे शब्दों में चेतावनी दे दी है। एक बुजुर्ग ग्रामीण का दर्द: हमारी आधी जिंदगी इस सड़क के इंतजार में कट गई। हमारे बच्चे पलायन करने को मजबूर हैं क्योंकि यहाँ कोई सुविधा नहीं है। अब हम झुकेंगे नहीं, जब तक सड़क का काम शुरू नहीं होता, हम सड़क से नहीं हटेंगे। ये जनआंदोलन देहरादून के वातानुकूलित कमरों में बैठकर नीतियां बनाने वाले हुक्मरानों के मुंह पर करारा तमाचा लगता है। एक तरफ जहां देश डिजिटल इंडिया और एक्सप्रेस-वे की बातें कर रहा है, वहीं देवभूमि के इन सुदूर गांवों के लोग आज भी सिर्फ एक अदद पक्की सड़क के लिए चिलचिलाती धूप और बारिश में आंदोलन करने को मजबूर हैं। कपकोट की जनता ने साफ संदेश दे दिया है—विकास का यह सौतेला व्यवहार अब और बर्दाश्त नहीं होगा। अब गेंद सरकार और स्थानीय प्रशासन के पाले में है; या तो वे तुरंत इस सड़क निर्माण को हरी झंडी दें, या फिर पहाड़ के इस उग्र होते जन-आक्रोश की तबाही झेलने के लिए तैयार रहें!