दोस्तो अपने उत्तराखंड में आखिर ये क्या हो रहा है? क्या अपने ही राज्य के युवा अब प्रतिस्पर्धा में पिछड़ते जा रहे हैं? पिथौरागढ़ की ग्रामीण डाक सेवक भर्ती ने एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने रख दी है—51 पदों में से हरियाणा के 30 युवा, और उत्तराखंड से सिर्फ 1 चयनित! क्या ये महज इत्तेफाक है या सिस्टम में कहीं बड़ी खामी छिपी है? क्या 100% अंक ही योग्यता का सही पैमाना हैं? या फिर क्या स्थानीय युवाओं के साथ कहीं न कहीं अन्याय हो रहा है? उत्तराखंड OUT हरियाणा IN?या फिर ये बदलते प्रतियोगी दौर की सच्चाई है? पूरी खबर मेरी इस रिपोर्ट में है। दोस्तो उत्तराखण्ड में डाक विभाग भर्ती एक बार फिर सुर्खियों का हिस्सा बन गई है। ताज़ा मामला सीमांत जनपद पिथौरागढ़ का है, जहां हाल ही में भर्ती हुए डाक सेवकों ने राज्य की शिक्षा व्यवस्था और प्रतियोगी तैयारी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मै उन सवालों का सिलसिला खबर के साथ शुरू करूं। उससे पहले मै आपको अपने उत्तराखंड में कर्मचारियों और हक मांगने वालों की दश बताने वाली तस्वीर दिखाना चाहता हूं। दोस्तो गौर कीजिएगा इस तस्वीर पर हालांकि इस तस्वीर का डाक सेवक वाली खबर से कोई नाता दूर दूर तक नहीं है, लेकिन जब बात रोजगार की होती है, इंसाफ की होती है तो फिर उत्तराखंड़ियों को मिलात क्या है।
दोस्तो ये तस्वीर चिंता को बढाने वाली है। हां हो सकता है कोई सियासी कनैक्शन भी, लेकिन ऐसा क्यों हो रहा है। हल्द्वानी के मोथरसन प्लांट में माहौल गरमाया हुआ है। सैकड़ों मजदूर सड़कों पर उतर आए हैं और कंपनी के खिलाफ बड़ा विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया मजदूरों का आरोप है—कम वेतन, ज्यादा काम और खराब कामकाजी हालात ₹20,000 न्यूनतम वेतन, 8 घंटे की शिफ्ट और निकाले गए कर्मचारियों की बहाली जैसी मांगों को लेकर ये प्रदर्शन तेज हो गया है तो पुलिस ने श्रमीकों को मनाने का ये तरीका ही चुना जो आपने देखा, खैर मै बात करने आया हूं पोस्ट मैन की डांक सेवकों की दोस्तो हाल के दिनों में आपने देखा होगा कि आपका डाकिया अचानक से बदला तो वो हरियाणा का निकला। इसको लेकर पहले से कई तरह के सवाल उठ रहे हैं, लेकिन इस बीत खबर और चौका देने वाली है। दरअसल दोस्तो ग्रामीण डाक सेवक (GDS) भर्ती में जहां पूरे प्रदेश से उम्मीदें थीं, वहीं आंकड़ों ने चौंकाने वाली तस्वीर पेश की है—उत्तराखंड से केवल एक अभ्यर्थी ही चयन सूची तक पहुंच सका, जबकि हरियाणा के 30 युवाओं ने बाजी मार ली. दोसतो डाक विभाग के आंकड़ों के अनुसार, सीमांत जिले में 51 पदों के लिए हुई प्रक्रिया में हरियाणा के करीब 30 अभ्यर्थियों ने काउंसिलिंग के लिए जगह बनाई। चयन पूरी तरह हाईस्कूल मेरिट पर आधारित था, जिसमें अधिकांश चयनित उम्मीदवारों ने 100 प्रतिशत अंक हासिल किए। दोस्तो यही वजह रही कि स्थानीय युवा इस प्रतिस्पर्धा में पीछे रह गए। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या सिर्फ अंक ही योग्यता का सही पैमाना हैं या सिस्टम में कहीं और भी खामी है।
दोस्तो इस भर्ती ने एक पुरानी बहस को फिर से जिंदा कर दिया है-क्या उच्च अंक वास्तविक क्षमता को दर्शाते हैं? पिछले कुछ मामलों में ये सामने आया कि हरियाणा के चयनित अभ्यर्थियों को हिंदी लिखने तक में कठिनाई हुई, जबकि उनके अंक पूर्ण थे। इससे चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता और मूल्यांकन प्रणाली दोनों पर सवाल उठ रहे हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल नंबर आधारित चयन भविष्य में कार्यकुशलता पर असर डाल सकता है। इसके अलावा दोस्तो बीते साल पौड़ी और चमोली जिले से भी ऐसे ही कुछ मामले सामने आए थे जहां शत प्रतिशत अंक पाए हरियाणा के अभ्यर्थी शुद्ध हिन्दी तक नहीं लिख पाए थे। सीमांत जिले पिथौरागढ़ से ही हरियाणा के युवकों द्वारा गांवों की भोली भाली लड़कियों को प्रेमजाल में फंसाने, उन्हें गांव से भगाकर ले जाने के मामले भी हाल ही में सामने आए हैं…दोस्तो उत्तराखंड के युवाओं के लिए यह स्थिति चिंता का विषय बनती जा रही है। एक तरफ बेरोजगारी की चुनौती, दूसरी ओर बाहरी राज्यों के अभ्यर्थियों का बढ़ता दबदबा—यह संकेत देता है कि प्रतियोगी तैयारी के स्तर पर राज्य को गंभीर आत्ममंथन की जरूरत है। शिक्षा की गुणवत्ता, मार्गदर्शन और परीक्षा रणनीति जैसे मुद्दे अब केंद्र में आ गए हैं। दोस्तो डाक विभाग के अनुसार, फिलहाल वरीयता सूची जारी कर दी गई है और काउंसिलिंग की प्रक्रिया जारी है। औपचारिकताएं पूरी होने के बाद अंतिम चयन किया जाएगा। यदि पद रिक्त रहते हैं तो अगली सूची भी जारी हो सकती है। लेकिन मौजूदा स्थिति ने यह साफ कर दिया है कि आने वाले समय में प्रतिस्पर्धा और कठिन होने वाली है।
कुछ लोगों का यह भी कहना है कि कोरोना काल में मिले शत प्रतिशत अंक हरियाणा के युवाओं के लिए वरदान साबित हो रहे हैं, लेकिन ऐसा क्यो और कैसे हो रहा है बीच में ऐसे कई कांड ऐसे देखने को मिले जिसने उत्तराखंड सुरक्षा पर ही सवाल खड़ कर दिये थे। आपको याद होगा ना खबर आई थी मुनस्यारी क्षेत्र में उस समय अफरा-तफरी मच गई जब हरियाणा के तीन युवक गांव में एक युवती को अपने साथ ले जाने की कोशिश में पहुंचे… ग्रामीणों को जब इस बात की जानकारी मिली तो उन्होंने तुरंत हस्तक्षेप करते हुए तीनों युवकों को पकड़ लिया और पुलिस के हवाले कर दिया। घटना के बाद कुछ समय के लिए गांव में तनाव का माहौल बन गया..सवाल अब भी वहीं खड़े हैं—क्या भर्ती प्रक्रिया में सिर्फ 100% अंक ही सब कुछ तय करेंगे?क्या सिस्टम में पारदर्शिता की कमी है या फिर हमारे अपने युवा तैयारी में पीछे छूट रहे हैं?और सबसे बड़ा सवाल—क्या उत्तराखंड के युवाओं के हक और अवसर धीरे-धीरे सीमित होते जा रहे हैं?एक तरफ रोजगार की लड़ाई। दूसरी तरफ बाहर से बढ़ती प्रतिस्पर्धा। आखिर समाधान क्या है?क्या सरकार इस पर कोई ठोस कदम उठाएगी?क्या चयन प्रक्रिया में बदलाव की जरूरत है?और क्या हमारे युवा आने वाले समय में इस चुनौती का सामना कर पाएंगे?फिलहाल जवाब आने बाकी हैं,लेकिन सवाल बहुत बड़े हैं।