दोस्तो, महिला आरक्षण के मुद्दे पर एक बार फिर सियासत गरमा गई है और इस बार सीधा निशाना साधा गया है देश की सर्वोच्च सत्ता पर।क्या महिला आरक्षण को लेकर वाकई गंभीरता दिखाई जा रही है या फिर यह मामला सिर्फ राजनीतिक बयानबाज़ी तक सीमित रह गया है?सुप्रिया श्रीनेत ने प्रधानमंत्री पर तीखे सवाल दागते हुए बड़ा आरोप लगाया है कि महिला आरक्षण को लागू करने की राह में सबसे बड़ी बाधाएं खुद सरकार की नीतियां बन रही हैं।अब सवाल ये उठता है कि—क्या महिला सशक्तिकरण के इस अहम मुद्दे पर सियासत हावी हो रही है?या फिर सच में कहीं न कहीं देरी और अड़चनें मौजूद हैं?महिला आरक्षण पर उठे इस सियासी तूफान ने नई बहस छेड़ दी है जिसके जवाब अब पूरे देश को जानने हैं। दोसतो हाल में संसद में पेश होने के बाद गिरा नारी शक्ति वंदन संशोधन अधिनियम को लेकर प्रधानमंत्री मोदी समेत भाजपा के तमाम नेता विपक्ष को दोषी करार दे रहे हैं। जगह-जगह विपक्ष के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। इधर विपक्ष ने के बड़े नेताओं ने भाजपा को महिला विरोधी बताते हुए सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है. इसी कड़ी में कांग्रेस सोशल मीडिया विभाग की अध्यक्ष और राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत देहरादून पहुंची. उन्होंने केंद्र सरकार पर जमकर हमला बोला है। कांग्रेस पहले से ही महिला आरक्षण की पक्षधर रही है, लेकिन महिलाओं के नाम पर देश को बांटने किसी साजिश को किसी भी सूरत में स्वीकार नहीं किया जा सकता है।
सुप्रिया ने प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधते हुए कहा कि यह महिला आरक्षण नहीं बल्कि देश के राजनीतिक नक्शे को बदलने और संविधान पर हमला करने की साजिश है। उन्होंने कहा उन्नाव, हाथरस या फिर महिला खिलाड़ियों का मामला हो, उत्तराखंड में अंकित भंडारी केस हो, जब देश की महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान का सवाल हो तब प्रधानमंत्री मोदी सदैव न्याय करने की बजाय चुप्पी साध लेते हैं। उनका कहना है कि सरकार का असली मकसद महिला आरक्षण नहीं बल्कि परिसीमन के जरिये राजनीतिक लाभ उठाना है। उन्होंने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री बातों को गोल-गोल घुमाकर महिला आरक्षण में सबसे बड़ा रोड़ा बन रहे हैं, अगर प्रधानमंत्री महिला आरक्षण पर गंभीर होते तो आज महिलाओं को आरक्षण मिल गया होता, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी महिला आरक्षण की आड़ में अलोकतांत्रिक तरीके से परिसीमन करना चाहते थे जिसका पर्दाफाश हो चुका है. इससे संघ की भी महिला विरोधी सोच उजागर हो गई है।
अगर वाकई सरकार महिला आरक्षण के प्रति गंभीर होती तो संसद की 543 में से 181 सीटों को महिलाओं के लिए आज ही रिजर्व कर देती, कल का इंतजार नहीं करती। इधर कांग्रेस एक एक बाद एक सवला दागे तो उधर बीजेपी कहती है कि गजब दोगला पंन कांग्रेस का चित भी मेरी, पट भी मेरी महिलाओं को दिया धोखा संसद में विरोध प्रेस में महिलाओं के मसीहा बनकर लीपापोती, क्या राहुल गांधी सुप्रिया श्री नेत के लिए अपनी सीट छोड़ेंगे,?? दोस्तो महिला आरक्षण को लेकर सियासत अब और तेज होती नजर आ रही है,एक तरफ कांग्रेस इसे महिलाओं के अधिकार और संविधान से जोड़कर सरकार पर सवाल उठा रही है तो वहीं बीजेपी इसे विपक्ष की राजनीति और विरोधाभास करार दे रही है। क्या महिला आरक्षण वास्तव में लागू होने की दिशा में आगे बढ़ रहा है?या फिर यह मुद्दा भी सिर्फ राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की भेंट चढ़ता रहेगा?संसद से सड़क तक फैली इस बहस ने साफ कर दिया है किमहिला सशक्तिकरण का मुद्दा जितना अहम है, उतना ही संवेदनशील भी अब देश की निगाहें इस पर टिकी हैं कि आगे सरकार क्या कदम उठाती है और क्या महिलाओं को उनका अधिकार समय पर मिल पाता है या नहीं।