दोस्तो भूमि बचाओ, धामी हटाओ,, लोकतंत्र बचाओ, नारा तो गजब गड़ा है। उत्तराखंड में 2027 के चुनाव से पहले जमीन को लेकर सियासत का सबसे बड़ा संग्राम छिड़ गया है! कांग्रेस ने आज से ‘भूमि बचाओ, धामी हटाओ’ अभियान का ऐलान कर दिया है, तो बीजेपी ने भी कांग्रेस के पुराने भूमि आवंटनों की फाइलें खोलकर पलटवार शुरू कर दिया है। नैनीसार से लेकर अलकनंदा होटल और जॉर्ज एवरेस्ट तक, आखिर जमीन के इन विवादों में किसकी सरकार घिर रही है? कांग्रेस के आरोपों में कितना दम है और बीजेपी के पलटवार के पीछे क्या सियासी रणनीति है? सवाल बड़ा है—क्या उत्तराखंड में जमीन की लड़ाई अब 2027 के चुनाव की सबसे बड़ी लड़ाई बनने जा रही है? दोस्तो उत्तराखंड में आगामी विधानसभा चुनावों का बिगुल अभी से बज चुका है, और इस बार लड़ाई किसी मामूली मुद्दे पर नहीं, बल्कि देवभूमि की बेशकीमती ‘जमीन’ पर आकर टिक गई है! उत्तराखंड प्रदेश कांग्रेस कमेटी पूरे सूबे में ‘भूमि बचाओ, धामी हटाओ’ आंदोलन शुरू करने जा रही है, जिसके लिए हरीश रावत से लेकर यशपाल आर्य तक, पार्टी के तमाम सूरमाओं को मैदान में उतार दिया गया है! लेकिन ठहरिए। बीजेपी शांत बैठने वालों में से नहीं है! भाजपा विधायक विनोद चमोली और खुद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने ‘लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ’ मार्च निकालकर कांग्रेस को ‘भ्रष्टाचार की जननी’ करार दिया है! आज हम खोलेंगे इस सियासी दंगल की पूरी कुंडली कि आखिर इस ‘जमीन के खेल’ में 2027 के रण में किसका नफा होने जा रहा है और किसे उठाना पड़ेगा भारी नुकसान! दोस्तो तो दोस्तो उत्तराखंड में जमीनों की कथित बंदरबांट और अतिक्रमण को लेकर कांग्रेस पूरी तरह आक्रामक मूड में आ चुकी है। पार्टी के दिग्गज नेताओं को अलग-अलग जिलों की कमान सौंपकर सीधे धामी सरकार को घेरने की रणनीति बनाई गई है।
हरिद्वार के अलकनंदा होटल की जमीन के मुद्दे पर पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत को मोर्चे पर लगाया गया है। नैनीताल में नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य और अलमोड़ा में विधायक मनोज तिवारी कमान संभालेंगे। देहरादून और ऋषिकेश की जमीनों के लिए चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष हरक सिंह रावत को जिम्मेदारी दी गई है। वहीं मसूरी के जॉर्ज एवरेस्ट एस्टेट की हाथीपांव भूमि को लेकर प्रदेश अध्यक्ष गणेश गोदियाल सीधे सरकार से दो-दो हाथ करेंगे। दोस्तो कांग्रेस का साफ आरोप है कि बीजेपी सरकार सरकारी जमीनों को अपने करीबियों में रेवड़ियों की तरह बांट रही है। दोस्तो इधर जैसे ही कांग्रेस ने इस अभियान का बिगुल फूंका, वैसे ही बीजेपी ने इतिहास के वो पन्ने खोल दिए जिन्हें कांग्रेस शायद दबाना चाहती थी। भाजपा विधायक और प्रदेश प्रवक्ता विनोद चमोली ने सीधे प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अल्मोड़ा के नैनीसार भूमि आवंटन का मुद्दा उठा दिया, जहां कांग्रेस शासनकाल में 7 हेक्टेयर से ज्यादा पंचायत भूमि को एक निजी सोसाइटी को 30 साल की लीज पर दे दिया गया था। बीजेपी ने गढ़वाल में 52 जगहों पर कौड़ियों के दाम करीबियों को जमीन बांटने और बहुचर्चित मुस्लिम यूनिवर्सिटी जमीन घोटाले का ठीकरा भी कांग्रेस के सिर फोड़ा है। यही नहीं, दोस्तो उधम सिंह नगर के रुद्रपुर में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने खुद मोर्चा संभालते हुए कांग्रेस को घेर डाला। धामी का कहना है कि उनकी सरकार सख्त भू-कानून लाकर जमीनों के दुरुपयोग को रोक रही है, जबकि कांग्रेस सिर्फ अपनी खिसकती हुई राजनीतिक जमीन को बचाने के लिए नकारात्मकता और अराजकता फैला रही है। दोस्तो अब सवाल यह उठता है कि जमीन के इस आर-पार के मुकाबले में चुनावी नफा-नुकसान किसका होगा? समझिए अगर कांग्रेस के फायदे की बात करूं तो कांग्रेस का नफा और नुकसान उत्तराखंड के स्थानीय लोगों में ‘भू-कानून’ और मूल निवास को लेकर एक भावनात्मक लगाव है।
अगर कांग्रेस यह साबित करने में सफल रही कि धामी सरकार बाहरी लोगों को जमीनें बांट रही है, तो उसे पहाड़ के स्थानीय वोट बैंक का सीधा फायदा मिल सकता है। और अगर नुक्सान की बात करूं तो, बीजेपी जिस तरह से हरीश रावत और पिछली कांग्रेस सरकारों के समय हुए भूमि आवंटनों और ‘मुस्लिम यूनिवर्सिटी’ जैसे विवादों को हवा दे रही है, उससे कांग्रेस के अपने ही पुराने दाग जनता के सामने फिर से ताजा हो रहे हैं, जिससे उसकी विश्वसनीयता पर चोट पहुंच सकती है। और दोस्तो यहां बीजेपी की बात करना भी बेहद जरूरी है, की आखिर बीजेपी कितना फायदा उठा पाएगी या नुकसान में रहेगी। बीजेपी का नफा और नुकसान, मुख्यमंत्री धामी द्वारा सख्त भू-कानून लागू करने की बात और कांग्रेस के शासनकाल को ‘अराजकता और भ्रष्टाचार का काल’ साबित करने की रणनीति से बीजेपी अपने राष्ट्रवादी और विकासवादी कोर वोट बैंक को एकजुट रख सकती है। वहीं नुकसान की बात करूं तो यदि पहाड़ों में सरकारी संपत्तियों या जमीनों के निजीकरण को लेकर जनता में थोड़ा भी असंतोष बढ़ा, तो सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) बीजेपी के मिशन २०२७ की राह मुश्किल कर सकती है। दोस्तो पहाड़ की जमीन को बचाना देवभूमि के अस्तित्व की लड़ाई है, लेकिन जब इस पर सियासत हावी हो जाए तो सच कहीं पीछे छूट जाता है। कांग्रेस आज से सड़कों पर उतर रही है, तो बीजेपी भी काउंटर मार्च निकाल चुकी है। अब देखना यह होगा कि उत्तराखंड की जनता किसके ‘जमीन बचाने’ के दावे पर भरोसा करती है और किसे सत्ता से बेदखल करती है। क्या आपको लगता है कि कांग्रेस का यह आंदोलन बीजेपी के किले में सेंध लगा पाएगा? अपनी राय हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।